#emotions #kavyotsav
Title : Katputli
इंसान सा आकार है
अनेक रूप है
उठना चाहा , पर जान नही थी
नही पता था मुझे
में किसी की डोर से बँधी एक कट्पुतली हूँ
हर बंधन को तोड़ ,
आज़ाद होना चाहती हूँ
कभी उछला , कभी बदला
तो कभी अपनी
शब्दों तले मुझे नचाया
ना है मुझे बॉल्नी का अधिकार
ना मुझमें हिलने की ताकत
किसी के इशारों पर चलती हूँ
में किसी की डोर से बँधी एक कट्पुतली हूँ
गाती , गुनगुनाती
कभी दर्द में है मुस्कुराइ
पर कुछ बयान ना कारपाई
पाया नही खुद का दिमाग़ है
फिर भी सब को अपनाया है
में किसी की डोर से बँधी एक कट्पुतली हूँ
अब हर बंधन को तोड़ ,
आज़ाद होना चाहती हूँ