#kavyotsav
ग़ज़ल (तुम)
मैं कहुं जो गर तुम से, तुम सुनोगी क्या?
फ़िर सुन कर मेरी बातें तुम कहोगी क्या?
ये दिल था जो कभी मेरा अब घर है तेरा,
साथ मेरे आशीयांने में तुम रहोगी क्या?
देखा है एक जहां दूर इस दुनिया से कहीं,
संग मेरे उस जहां में तुम चलोगी क्या??
जो बुलाऊं किसी शाम गर तुमको मिलने,
उस शाम हमसे मिलना तुम सकोगी क्या??
वो जाम ए राहत बा दस्ते यार,
हमने तो पीली तुम पियोगी क्या?
एक ग़ज़ल लिख रहा हूं अल्फ़ाज़ चाहिए,
ज़रा कहो! अल्फ़ाज़ तुम बनोगी क्या???
हूं तन्हा बहोत इस एक तरफ़ा सफ़र में,
किसी अंजाने मोड़ पर तुम मिलोगी क्या?
तेरी हर मुस्कूराहट जो मरहम है मेरे हर दर्द की,
ज़रा फ़िर एक दफ़ा मेरे ज़ख़्म तुम भरोगी क्या?
ना जाने कितनी रातें जागा हूं ख़्वाबों में तेरे,
अब मेरी नींदों में चैन से तुम सोओगी क्या??
वो दिन भी क़रीब है जब ना रहेगा 'सादिक़,
ज़रा बताओ! अकेले फ़िर तुम करोगी क्या?
©sadique