#kavyotsav
ग़ज़ल (ग़ुलाम)
अभी अभी तो एक टूटा है दिल,
अभी दिल लगाने का क्या फ़ायदा,
अभी बाक़ी हैं ठोकरें ज़िन्दगी मे बहोत,
अभी सम्भल जाने का क्या फ़ायदा,
बात सुनता नही कोईं किसी कि यहां,
अब वो दिखते नहीं जो थे अहल-ए-वफ़ा,
अहल-ए- दुनिया को अश्कों कि परवाह कहां,
तो फ़िर आंसू बहाने का क्या फ़ायदा,
बात ग़ैरों कि फ़िर भी यहां और है,
दिल दुखाने के उन्के कई तौर है,
जब सहे ना ज़माना जो मेरी ख़ुशी,
तो मेरे मुस्कराने का क्या फ़ायदा,
दिल गवारा नहीं करता,
कोई पुकारा नहीं करता,
हम बैठें हैं राहों मे तन्हा जहां,
वहां तेरे आने का क्या फ़ायदा,
दिल ग़म-ग़ीन है लोग कहते है क्या,
हम चुप-चाप बस यूं ही सहते यहां,
जो दिल ही न बाक़ी मेरा जब रहा,
तो मेरा दिल दुखाने का क्या फ़ायदा,
सांस आती नहीं पर जिए जा रहे हैं,
तुझसे पहले से ज़्यादा इश्क़ किये जा रहे हैं,
ज़ख़्म पुराने मेरे न भरें अब तलक,
ज़ख़्म तेरे नये दे जाने का क्या फ़ायदा,
ग़ुलाम तेरा है 'सादिक़' क़दर तुझको नहीं,
हक़ माना था तुझको हक़ मुझे ही नहीं,
जहां हक़ पे अपना कोई हक़ बाक़ी ना रहा,
वहां हक़ जताने का क्या फ़ायदा।
©Sadique