॥ अंतस मे ॥
तेरे अंतस, मेरे अंतस,
कुछ और नहीं ,
केवल छवि हैं ।
जो गुजरे वो दिन सुनहरे ,
उज्जवल गीत है तेरे ,मेरे ।
तुम नहीं -
हैं सिर्फ आत्माएं,
गुंचा-गुंचा व्याप्त कवि है ।
सुधियों के मिस पावन प्रंसग,
सत्य, निस्ठा रंजित हर अंग,
अजब मनोरम,
शान्ति तोरण,
मन्दिर प्रांगण, सुरभित छवि है ।
स्मृति अंकित युगों - युगांतर ,
नहि विकल्प है वट समान्तर ,
भ्रमर गाथा,
गत प्रणय धारा
इक समदर्शी गंगा पवि है ।
# काव्योत्सव