# Kavyostsav
नेह की बूँद
नेह तो है एक ऐसा सपना ,
जो शायद ही पूरा होता है
भावों की हलचल में !
इसीलिए
मैं नहीं मथती अब
अपने को ।
रीझती नहीं
रिश्तों को देखकर पनपते !
समझ गई हूँ -
नहीं है मनुष्य कोई धातु
जिसे लिया जाए ठोंक - बजाकर ।
हमारा भाग्य ही है कसौटी
और केल का पत्ता ,
जिसपर क्या करें ?
किसी के
नेह की बूँद
ठहरती नहीं ।