तुमने जो लफ्ज़ इश्क़ कहाँ था,
मुझे हर्फ़ हर्फ़ जीना है उसको,
आसमां में ये जो बादल गरजा था
मुझे बूंद बूंद पीना है उसको,
तेरी आँखों में आँसू का सैलाब जो आये
मुझे ज़र्रा ज़र्रा मिटाना है उसको,
तेरे होंठो पे हँसी का एक कतरा जो आ जाये
मुझे धीरे धीरे बढ़ाना है उसको
मेरे हाथों की महेंदी में जो तेरा नाम आ जाये
मुझे हर्फ़ बा हर्फ़ गुन्दना है उसको
तेरी सांसो में मेरे नाम का जो संगीत बज जाये
मुझे हर धक्-धक् मैं अपनी सुनना है उसको
मेरे होठों से तेरे होठों के अक्स जो मिल जाये,
आखरी बूंद तक उस जाम को पीना हे मुझको
तेरी आँखों से मेरी आँखों की एक मुलाकात जो हो जाये,
उस पल के ख़्वाबो में अब जगना है मुझको।
---शिवानी शाह