कर्मपथ पर जो बढ़ता है,
कर्मफल को भूल कर।
थाम लेता है,
उसका सारथी बनकर, मेरा कृष्णा।
स्त्रीत्व का रक्षक बनता,
कभी चीर बढ़ाकर।
आस्था का पोषक बनता,
विष का अमृत बनाकर।
सम्मान का सूचक बनता,
विधवाओं को अपना कर, मेरा कृष्णा।
राजसिंहासन पर बिठाता,
एक अकिंचन को।
करता है सेवन छिलकों का,
एक दासीपुत्र के घर।
अपना लेता है रसखान को,
सब भेदभाव मिटा कर, मेरा कृष्णा।
जीवन-आनंद सिखाता है।
कभी बंसी की धुन सुनाकर
कभी गीता के श्लोक बताकर,
हर हृदय में बसता है,
कभी रास रचा कर, मेरा कृष्णा।