काश कि मै...
पढ़ पाता मैं उन आँखों को,
या फिर उतर के उनमे...
ढूंढ पाता जवाबों को..!
काश कि मै...
बुन पाता मैं उन सपनों को,
या फिर पिरो के क्रोशिये में...
भर पाता रंगो को...!!
काश कि मै...
बटोर पाता मैं उन लहरों को,
या फिर बांध के अंजुली में...
समेट पाता सागर को..!
काश कि मै...
छू पाता मैं उस चंदा को,
या फिर आँख के बुलबुल में...
देख पाता परछाई को..!!
--- मनीष ग़ोडे