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न जाने कैसा सफ़्हा है तहरीर-ए-ज़िंदगी का दर्दों ने दिल पे दस्तख़त ही कर दिए हों जैसे ~रिंकी सिंह #ख़याल #matrubharti
वे स्त्रियाँ... जो रह गईं बस इतनी-सी आकांक्षा में कि कभी रोटी की भाप के साथ उनकी मेहनत की भी कोई गर्म-सी प्रशंसा उठे.. उन्हें कोई प्रशस्ति-पत्र नहीं मिला | जो स्त्रियाँ... आजीवन सजाती-सँवारती रहीं घर के कोने, धूप की तरह फैलती रहीं आँगन-आँगन.. उनके लिए कभी कोई महफ़िल नहीं सजी | जिन स्त्रियों ने... सुबह की पहली किरण से शाम की बुझती लौ तक अपनों के पीछे भागते हुए अपने बदन को पसीने से चमकाया उनकी हथेलियों तक कभी तमगों की चमक नहीं पहुँची | जिनका अस्तित्व धीरे-धीरे डूब गया किसी और के नाम के पीछे जैसे नदी... समुद्र में अपना नाम खो देती है.. उनका नाम.. कभी किसी पोस्टर की शोभा नहीं बना | जिन्होंने... जरा सी अहमियत को ही उपलब्धि मान लिया वे रह गईं एक विकल्प की तरह, कभी किसी की अनिवार्य आवश्यकता नहीं बनीं क्योकि... उनके हिस्से नहीं आए कोई उपलब्धि, कोई तमगा, कोई महफ़िल, कोई किताब, कोई ख़िताब इसलिए उनके हिस्से नहीं आया कोई दिवस, कोई उत्सव वे बस कहलाती रहीं.. नाकारा, कामचोर, असफल स्त्रियाँ उनके हिस्से आए... कुछ तिरछे वाक्य... “तुमने किया ही क्या?” “तुम करती ही क्या हो?” “तुम कुछ नहीं जानती…” तो प्यारी स्त्री ..! अगर तुम नहीं कहलाई कामकाजी और सफल स्त्री एक दिन अपनों से ही हर जगह दुत्कार पाओगी | सच कहती हूँ, सखी! मरने से पहले ही मार दी जाओगी | ~रिंकी सिंह #poetry #matrubharti
लघुकथा : “सार्वजनिक” गाँव के मोड़ से रोज दो औरतें गुजरती थीं..। मैंने कई दिन देखा, वे सार्वजनिक शौचालय की तरफ जाती थीं। एक दिन पूछ ही लिया “आप लोग रोज उधर… शौच के लिए जाती हैं क्या?और अगर जाती हैं तो सिर्फ आप दोनों क्यों और लोग क्यों नहीं " वे दोनों हल्का-सा हँसीं... “नहीं दीदी, हम लोग तो साफ-सफाई करने जाते हैं… शौचालय की ।” मैं थोड़ी झेंपी, फिर सहज जिज्ञासा में पूछा... “अच्छा, तो शौच के लिए?” एक ने बिना मेरी ओर देखे कहा.. “खेतों में।” मैं चौंकी.. “अरे, यहाँ तो इतना बड़ा शौचालय बना है… कोई नहीं जाता?” दूसरी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा. “जाता है न… जिसने बनवाया है।” “किसने?” “प्रधान जी… और उनके घर के लोग।” इतना कहकर वे अंदर चली गईं। दरवाज़े पर बड़े अक्षरों में लिखा था.. “सार्वजनिक शौचालय - स्वच्छ गाँव, स्वस्थ गाँव।” ~रिंकी सिंह #लघुकथा #matrubharti
पतझड़ का दुःख पेड़ों से ज़्यादा इंसान को होता है पेड़ जानते हैं यह भी एक ऋतु है हम समझते हैं यह अंत है वृक्ष इतने धैर्यवान इंसान इतने अधीर क्यों? ~रिंकी सिंह #matrubharti #poetry
दादी जब परेशान होती थीं, किसी बात से दुखी या किसी उलझन से चिढ़ी हुई, तो अक्सर ईश्वर से शिकायत करती थीं। कहती थीं कि मन ऊब गया है, अब जीने का मन नहीं करता, भगवान कब पूछेंगे और कब बुलाएँगे। तब उनकी बातों में हमें बस झुँझलाहट दिखती थी, थकान का मज़ाक उड़ाना आसान लगता था। जब वे खुश होतीं, तो हम जानबूझकर उन्हें चिढ़ाते थे कि आज भगवान से नहीं कहोगी क्या दादी कि बुला लें। तब दादी हँसकर कहती थीं कि अभी कहाँ, अभी तो सारे पोते-पोतियों की शादी देखनी है, इतनी जल्दी थोड़े ही मरना है। उस समय यह सब बहुत साधारण लगता था, जैसे बुज़ुर्गों की आदतें होती हैं। आज वही बातें भीतर उतरकर अर्थ बनाती हैं। अब जब मैं धीरे-धीरे दादी की उम्र की तरफ़ बढ़ रही हूँ, तो उनकी उलझनें, उनका दुःख और उनकी चुप पीड़ा समझ आने लगी है। अब पता चलता है कि वे शब्द शिकायत नहीं थे, थकान की स्वीकृति थे। कितनी ही बार मैं भी सब छोड़ देने का ख़याल लेकर बिस्तर तक पहुँची हूँ। लगता है कि अब और नहीं, अब बस थम जाना चाहिए। पर हर सुबह कुछ न कुछ मुझे वापस खींच लाता है- बच्चे की टिफ़िन, बड़ों की चाय, घर की ज़िम्मेदारियाँ, रसोई के तेल और मसालों में उलझा हुआ जीवन और उस क्षण मरने का ख़याल टल जाता है, स्थगित हो जाता है, जैसे किसी ने भीतर से कह दिया हो..आज नहीं। जीवन से ऊब जाना शायद मनुष्य के जीवन का एक निश्चित पड़ाव है। मरने का ख़याल भी शायद कभी न कभी सबके मन में दस्तक देता है । पर उससे भी पहले हर दिन थोड़ा-थोड़ा मरते चले जाना, ऊब में फँस जाना और वहाँ से बाहर निकलने की इच्छा खो देना..यह सबसे पीड़ादायक है। अब मैं समझती हूँ कि दादी क्यों हर दिन जीवन से समझौता करती थीं। उन्होंने जीना नहीं छोड़ा था, उन्होंने बस मरना टाल दिया था। आज मैं भी वही कर रही हूँ। न जीवन से प्रेम पूरी तरह बचा है, न उसे छोड़ने का साहस। बस रोज़मर्रा के छोटे-छोटे कारणों में उलझकर मरना स्थगित कर देती हूँ। शायद यही जीवन है जहाँ पूरी तरह जीना नहीं, पूरी तरह मरना भी नहीं, बल्कि हर दिन अपने ही मन से चुपचाप समझौता करते हुए आगे बढ़ते रहना। यह जीवन मोह पर टिका है,इस भरोसे पर कि सब अच्छा हो जाएगा। और शायद यही भरोसा है, जो बना रहना चाहिए। राजेश रेड्डी साहब ने कितनी सधी हुई बात कही है... अजब ये ज़िन्दगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसां रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है ~ रिंकी सिंह #matrubharti
कल मैंने भीड़ से लथपथ एक सड़क पर एक आदमी को देखा.. सब्ज़ी बेचता हुआ... आँखें उसकी मानो रातों से उधार ली हुई हों... जागती हुई नहीं, पर बुझी हुई भी नहीं नाक में नली थी, जैसे जीवन को किसी अदृश्य मशीन से घसीट-घसीट कर खींच रहा हो.. बीमार था... शायद बहुत बीमार... पर बीमारी से ज़्यादा वह भूख से लड़ रहा था, और भूख से ज़्यादा जीवन से झगड़ रहा था वह हार मानने आया नहीं था वह तो उन्हें हराने की पूरी तैयारी में बैठा था मृत्यु को, दया को, और उस व्यवस्था को जो आदमी को पहले थकाती है फिर उसे भीख का पात्र बनाती है उसके आगे न कोई चादर बिछी थी, न कोई कटोरा रखा था उसने न इंसान से याचना की थी, न भगवान से सौदेबाज़ी.. वह सड़क पर बैठा मेहनत का सामान लेकर स्वाभिमान लेकर वह आदमी... मुझे हौसला दे रहा था कि ज़िंदगी से थोड़ा और साहस से आँखें मिलाई जा सकती हैं मैंने महसूस किया.. क्रांति कभी नारे लगाती नहीं, कभी-कभी नाक में नली लगाए सब्ज़ी बेचती हुई चुपचाप.. सड़क पर बैठी होती है ~रिंकी सिंह
( बोझ ) वे अक्सर सुबह के उजाले के साथ आ जाते थे। करीब सत्तर के होंगे,सिर पर टोकरी, कदमों में थकान, और आवाज़ में वही पुरानी पुकार जो गलियों को पहचान में रखती है। मैं जब भी उन्हें देखती, कुछ न कुछ ले ही लेती..ज़रूरत हो या न हो। शायद सब्ज़ी से ज़्यादा, उस आदमी को ख़रीदती थी जो रोज़ अपने जीवन को तौल कर बेचता था। कई दिनों तक वे नहीं आए। गली कुछ सूनी लगी, जैसे सुबह का कोई ज़रूरी काम अधूरा रह गया हो। फिर एक दिन दिखे। सिर पर टोकरी नहीं थी। कंधे पर एक भारी बोरी टाँगे, उसमें भरी हुई ताज़ी पालक—हरी, मगर खुद उनके चेहरे से हरियाली गायब थी। मैंने पूछा, “इतने दिन कहाँ थे, बाबा?” वे रुके। हल्की मुस्कान के साथ बोले, “सर में दर्द था बेटा… पुरानी चोट है। डॉक्टर ने मना किया है वजन उठाने से।” मैंने राहत की साँस ली..अच्छा है, अब सिर पर बोझ नहीं रखते। लेकिन तभी देखा..बोरी कंधे पर थी, झुकी हुई रीढ़ पर टिकती हुई। मैं कुछ कह पाती, उससे पहले ही वे बोले... “ज़िंदगी का बोझ उठाना ही है बेटा… सर पर उठाऊँ या कंधे पर, फर्क कहाँ पड़ता है।” उनकी मुस्कान में शिकायत नहीं थी, बस एक लंबा अभ्यास था... हालात से हार न मानने का। वे पालक तौलकर देने लगे। मेरे हाथ में सब्ज़ी थी, और दिल में एक भारी सा एहसास.. कि कुछ लोग डॉक्टर की सलाह नहीं, हालात की मजबूरी सुनते हैं। वे मुस्कुराते हुए चल दिए। गली फिर वही थी, पर मुझे लगा... आज बोझ सिर्फ उनके कंधे पर नहीं था, थोड़ा-सा मेरे भीतर भी रख गए थे। ~रिंकी सिंह #दिल_की_बात #matrubharti
(नया साल और मैं) काश कैलेंडर की पहली सुबह मन पर बर्फ-सी जमी उदासी पिघला देती… जैसे सूरज मिटा दे धुंध की परतें और मन की छत पर फिर से रोशनी का बसेरा हो जाए | काश तमाम दुख... पुरानी डायरी के जैसे, आखिरी महिने के साथ बंद हो जाते.. | नए साल की कोरी सफ़ेदी पर, केवल उम्मीदें लिखी रहतीं... नीली स्याही की तरह साफ़, चमकीली, उजली | टूटी हुई इच्छाएँ... सूखे पत्तों की तरह इकट्ठा हो जाएँ और एक झोंका उन्हें पीछे कहीं दूर ले जाए… फिर पलकों पर... नववर्ष की पहली ओस-सी चमक उतर आए | हर रोज़ खुद को शुभकामनाएँ देती हूँ, जैसे बीज डालूँ सूखी मिट्टी में.. अबकी बार सोचती हूँ शायद एक अंकुर फूट पड़े, शायद इस बार दुआ रंग ले आए आज भी वही उम्मीद उठा कर नए दिन की दहलीज़ पर रखी.. शायद इस शुभकामना का आज असर हो जाए… शायद इस बार साल मुझे थोड़ा-सा मुस्कुरा कर अपनाए | ~रिंकी सिंह ✍️ #matrubharti #poetry #feelings
सांता महज लाल टोपी वाला चेहरा नहीं है, हमारे आसपास कई चेहरों में मिलता है | कभी कंधे पर हाथ रखकर, कभी बिना कुछ कहे साथ बैठकर, कभी बस "कैसी हो?" पूछकर, दिल तक उपहार पहुँचा जाता है | जीवन का हर वो इंसान जो टूटे मन के तार जोड़ दे, जो उदास रूह में उम्मीद की बत्ती जला दे, जिसकी मौजूदगी से दिन थोड़ा हल्का, और दुनिया थोड़ी प्यारी लगे.. वो ही असली सांता क्लॉज़ है | क्योंकि प्रेम ही सबसे सच्चा उपहार है, और दिल ही सबसे खूबसूरत थैला जिसमें ये उपहार बाँटे जाते हैं | 🎄✨ ~रिंकी सिंह #poetry #lovetowrite . #matrubharti
कितना तुझे संवारा जीवन, सब कुछ तुझ पर हारा जीवन। फिर भी रूठा रहा तू मुझसे, तिल-तिल मुझको मारा जीवन। ~रिंकी सिंह ✍️ #matrubharti #poetry #thought #sadness
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