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Rinki Singh

Rinki Singh

@rinkisingh917128
(2.3k)

कल मैंने
भीड़ से लथपथ एक सड़क पर
एक आदमी को देखा..
सब्ज़ी बेचता हुआ...
आँखें उसकी
मानो रातों से उधार ली हुई हों...
जागती हुई नहीं,
पर बुझी हुई भी नहीं
नाक में नली थी,
जैसे जीवन को किसी अदृश्य मशीन से
घसीट-घसीट कर खींच रहा हो..

बीमार था...
शायद बहुत बीमार...
पर बीमारी से ज़्यादा
वह भूख से लड़ रहा था,
और भूख से ज़्यादा
जीवन से झगड़ रहा था
वह हार मानने आया नहीं था

वह तो
उन्हें हराने की पूरी तैयारी में बैठा था
मृत्यु को, दया को,
और उस व्यवस्था को
जो आदमी को पहले थकाती है
फिर उसे भीख का पात्र बनाती है
उसके आगे
न कोई चादर बिछी थी,
न कोई कटोरा रखा था
उसने न इंसान से याचना की थी,
न भगवान से सौदेबाज़ी..
वह सड़क पर बैठा मेहनत का सामान लेकर
स्वाभिमान लेकर


वह आदमी...
मुझे हौसला दे रहा था
कि ज़िंदगी से
थोड़ा और साहस से
आँखें मिलाई जा सकती हैं

मैंने महसूस किया..
क्रांति कभी
नारे लगाती नहीं,
कभी-कभी
नाक में नली लगाए
सब्ज़ी बेचती हुई
चुपचाप..
सड़क पर बैठी होती है

~रिंकी सिंह

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( बोझ )

वे अक्सर सुबह के उजाले के साथ आ जाते थे।
करीब सत्तर के होंगे,सिर पर टोकरी, कदमों में थकान, और आवाज़ में वही पुरानी पुकार जो गलियों को पहचान में रखती है।
मैं जब भी उन्हें देखती, कुछ न कुछ ले ही लेती..ज़रूरत हो या न हो। शायद सब्ज़ी से ज़्यादा, उस आदमी को ख़रीदती थी जो रोज़ अपने जीवन को तौल कर बेचता था।
कई दिनों तक वे नहीं आए।
गली कुछ सूनी लगी, जैसे सुबह का कोई ज़रूरी काम अधूरा रह गया हो।
फिर एक दिन दिखे।
सिर पर टोकरी नहीं थी।
कंधे पर एक भारी बोरी टाँगे, उसमें भरी हुई ताज़ी पालक—हरी, मगर खुद उनके चेहरे से हरियाली गायब थी।
मैंने पूछा,
“इतने दिन कहाँ थे, बाबा?”
वे रुके।
हल्की मुस्कान के साथ बोले,
“सर में दर्द था बेटा… पुरानी चोट है। डॉक्टर ने मना किया है वजन उठाने से।”
मैंने राहत की साँस ली..अच्छा है, अब सिर पर बोझ नहीं रखते।
लेकिन तभी देखा..बोरी कंधे पर थी, झुकी हुई रीढ़ पर टिकती हुई।
मैं कुछ कह पाती, उससे पहले ही वे बोले...
“ज़िंदगी का बोझ उठाना ही है बेटा…
सर पर उठाऊँ या कंधे पर, फर्क कहाँ पड़ता है।”
उनकी मुस्कान में शिकायत नहीं थी,
बस एक लंबा अभ्यास था...
हालात से हार न मानने का।
वे पालक तौलकर देने लगे।
मेरे हाथ में सब्ज़ी थी,
और दिल में एक भारी सा एहसास..
कि कुछ लोग डॉक्टर की सलाह नहीं,
हालात की मजबूरी सुनते हैं।
वे मुस्कुराते हुए चल दिए।
गली फिर वही थी,
पर मुझे लगा...
आज बोझ सिर्फ उनके कंधे पर नहीं था,
थोड़ा-सा मेरे भीतर भी रख गए थे।

~रिंकी सिंह
#दिल_की_बात
#matrubharti

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(नया साल और मैं)

काश कैलेंडर की पहली सुबह
मन पर बर्फ-सी जमी उदासी पिघला देती…
जैसे सूरज मिटा दे धुंध की परतें
और मन की छत पर फिर से रोशनी का बसेरा हो जाए |

काश तमाम दुख...
पुरानी डायरी के जैसे, आखिरी महिने
के साथ बंद हो जाते.. |
नए साल की कोरी सफ़ेदी पर,
केवल उम्मीदें लिखी रहतीं...
नीली स्याही की तरह साफ़, चमकीली, उजली |

टूटी हुई इच्छाएँ...
सूखे पत्तों की तरह इकट्ठा हो जाएँ
और एक झोंका
उन्हें पीछे कहीं दूर ले जाए…
फिर पलकों पर...
नववर्ष की पहली ओस-सी चमक उतर आए |

हर रोज़ खुद को शुभकामनाएँ देती हूँ,
जैसे बीज डालूँ सूखी मिट्टी में..
अबकी बार सोचती हूँ
शायद एक अंकुर फूट पड़े,
शायद इस बार दुआ रंग ले आए

आज भी वही उम्मीद उठा कर
नए दिन की दहलीज़ पर रखी..
शायद इस शुभकामना का
आज असर हो जाए…
शायद इस बार साल मुझे
थोड़ा-सा मुस्कुरा कर अपनाए |

~रिंकी सिंह ✍️
#matrubharti
#poetry
#feelings

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सांता महज लाल टोपी वाला चेहरा नहीं है,
हमारे आसपास कई चेहरों में मिलता है |
कभी कंधे पर हाथ रखकर,
कभी बिना कुछ कहे साथ बैठकर,
कभी बस "कैसी हो?" पूछकर,
दिल तक उपहार पहुँचा जाता है |

जीवन का हर वो इंसान
जो टूटे मन के तार जोड़ दे,
जो उदास रूह में उम्मीद की बत्ती जला दे,
जिसकी मौजूदगी से दिन थोड़ा हल्का,
और दुनिया थोड़ी प्यारी लगे..
वो ही असली सांता क्लॉज़ है |

क्योंकि प्रेम ही सबसे सच्चा उपहार है,
और दिल ही सबसे खूबसूरत थैला
जिसमें ये उपहार बाँटे जाते हैं | 🎄✨

~रिंकी सिंह

#poetry
#lovetowrite .
#matrubharti

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कितना तुझे संवारा जीवन,
सब कुछ तुझ पर हारा जीवन।
फिर भी रूठा रहा तू मुझसे,
तिल-तिल मुझको मारा जीवन।

~रिंकी सिंह ✍️

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#poetry
#thought
#sadness

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कैलेंडर पर
उँगली रखते ही
यह बोध हुआ..
समय स्पर्श से
न रुकता है,
न लौटता है

मास दर मास
जीवन बहता रहा,
हम चलते रहे
पर ठहरकर
स्वयं को
न परखा

जो अभिलाषाएँ थीं
वे प्रतीक्षा में
क्षीण होती गईं,
और जो विवशताएँ थीं
वे स्वभाव बन गईं

चेहरा वही रहा,
पर अनुभवों ने
मौन हस्ताक्षर
उस पर अंकित कर दिए

अंततः
न कोई उद्घोष,
न कोई विदाई
एक वर्ष
निःशब्द
जीवन से
विलीन हो गया

~रिंकी सिंह ✍️

#poetry
#matrubharti

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वो उठती है...
सुबह की पहली रोशनी से पहले,
जब नींद ने आँखों को ठीक से छोड़ा भी नहीं होता,
और चिड़ियों ने गाना शुरू किया ही होता है |

बालों को खूँटी में बाँधती है,
कपड़ों में दिन भर की थकान पहले से सिलती है |
गैस जलाकर रोटियाँ बेलती है
और इसी बीच...
मन के किसी कोने से एक पंक्ति टपकती है,
कोमल, कच्ची, अधूरी...

"क्या अब?"
वो पूछती है खुद से,
और जवाब में
दूध उबाल की तरफ़ भागने लगता है |

बच्चों की जुराबें,
पति की फाइल,
डिब्बे, छाते, स्कार्फ और शिकायतें...
हर चीज़ में उलझती हुई,
वो भूल जाती है उस पंक्ति को
जो उसके भीतर कविता बनना चाहती थी |

वो कनअँखियों से देखती है अपने ही भावों को,
जैसे कोई माँ चुपचाप देखती है
खिड़की से बाहर खेलते अपने..
बच्चों को..

उसे आता है सब संभालना,
सिवाय खुद को संवारने के |

कभी सब्जियां काटते हुए
उसकी अंगुलियों से बहता है एक शेर,
कभी पोंछा लगाते हुए
धूल में लिपटा एक गीत |

लेकिन समय?
वो तो सिर्फ़ दीवार पर
घड़ी की तरह टंगा है..
सामने है, पर कभी उसका नहीं |

वो सोचती है....
आज भी एक कविता
चाय के उबाल में बह गई,
आज फिर....
एक कविता अधूरी रह गई,
जैसे वो खुद...
अधूरी ख्वाहिशों, टुकड़े-टुकड़े ख्वाबों
और नज़्मों से भरे दिल की
पूरक पंक्ति खोजती रही |

उसकी ज़िन्दगी में सबसे अधूरी चीज़
वो खुद है... एक ऐसी नज़्म,
जो अब भी लिखे जाने के इंतज़ार में है |

~रिंकी सिंह

#matrubharti
#poetry
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(माँ सी स्त्रियां)

नहीं… माँ तो एक ही होती है,
पर जीवन के मोड़ों पर
कई स्त्रियाँ माँ की परछाईं बनकर खड़ी मिलती हैं

वे दादी..
जो चूल्हे की आँच में
हमारी सर्द होती मासूमियत को गरमाती रहतीं

वे चाची..
जो डाँट में भी अपना ही अधिकार डालकर
रोज़ की टेढ़ी चोटियाँ सीधी कर जातीं

वे बुआ..
जो बिना कहे समझ लेती थीं
कब मन रूठा है, कब हौसला टूटा है

वे भाभी..
जो आधी रात की थकान में भी
हमारे कपड़ों की फटी सिलाई में
अपनी ममता की डोरी तुरप देतीं

वे पड़ोसिनें..
जिन्हें हम किसी नाम से पुकारते थे,
पर वे हर बार
माँ जैसी ही गोद,
माँ जैसी ही छाँव बनकर
दरवाज़े पर खड़ी मिलती थीं

कभी दवा की पुड़िया में चिंता बांध देतीं,
कभी हँसी की पोटली में दिन हल्का कर देतीं,
कभी कंधे पर हाथ रखकर
अनदेखे भारी बोझ कम कर देतीं

मायके लौटने पर
सबसे पहले यही औरतें दौड़ी आतीं..
कलेजे से लगातीं, बलाएं उतारतीं
हमारे बच्चों पर प्यार लुटातीं
हमारे बचपन के किस्से उन्हें सुनातीं


इन स्त्रियों ने ही तो सिखाया..
रिश्ते निभाना भी एक कला है,
और प्यार बाँटना
एक निःस्वार्थ पूजा

मुझे तो हमेशा
ये सारी औरतें
शीतल सी पुरवाई
ममता की परछाईं,
और जीवन की गुप्त देवियाँ लगीं
जो बिना नाम के, बिना मांग के
हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी
आसान कर देती हैं

मैंने देखा है..
शायद सबने देखा होगा..
ऐसी स्त्रियों को..
जो हमारी माँ न होकर भी
हमारी रगों में ममता घोल जाती हैं
दूर रहने पर वे भी,
माँ जितनी ही याद आती हैं

~रिंकी सिंह ✍️


#मन_के_भाव
#poetry
#matrubharti

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गीत मुझसे ही मेरे रूठे हुए हैं,
मूक हो बैठे हुए हैं छंद सारे |
स्वयं हूँ अनभिज्ञ मन यूँ खिन्न क्यों है,
है तिरस्कृत कर रहा अनुबंध सारे |
नित नए आयाम पाने की ललक में,
जो था मेरे पास खोती जा रही हूँ |
स्वयं से है प्रेम, ये दावा कभी था,
स्वयं से ही दूर होती जा रही हूँ |

~रिंकी सिंह

#geet
#poetry
#hindipanktiyaan

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बचपन में
मैं एक खुला खिड़की-घर थी…
जिसमें हवा खामोशी बनकर आती,
और ख्यालों की नीली पतंगें
छत पर अकेली नाचतीं

बाहर की दुनिया
मानो दूर कहीं धुंध की नदी के उस पार थी..
आवाज़ें आती थीं, पर
मेरे कानों तक पहुँचते पहुँचते
खो जाती थीं धूप की तरह
लोग कहते..“कम सुनती है शायद…”
और मैं हँस देती,
क्योंकि मेरे भीतर
अपनी ही दुनिया का सुबह-सुबह बजता संगीत था

फिर अचानक
समय ने मेरे सपनों की रेत की हवेली
दोनों हाथों से उठाकर
हक़ीक़त की पत्थर की सड़क पर दे मारी
धड़ाम...
उस एक झटके में
मेरे कानों की खिड़कियाँ
पूरा शहर सुनने लगीं

अब हर आवाज़
तलवार बनकर भीतर उतरती है..
अपेक्षाओं की खनक,
ज़रूरतों के ताले,
ज़िम्मेदारियों की घंटियाँ…
और मैं देखती हूँ..
अपने ही भीतर एक धीमी साँस बुझती हुई

कभी-कभी जी चाहता है
फिर से मौन की ऊन से बुनी टोपी पहन लूँ,
जो हर शोर को
बर्फ़ की तरह सोख ले

फिर से खो जाऊँ
उन बादलों में
जिनमें मेरा नाम लिखा था

कहीं ऐसी भी
एक जगह हो
जहाँ दुनिया की कोई ध्वनि न पहुँचे,
और मैं
अपनी ही धड़कन को
दुबारा पहचान सकूँ

पर अफ़सोस..
कानों तक हर आवाज़..
न चाहते हुए पहुँच जाती है...
और मैं
सब सुनते-सुनते
अपने ही भीतर की आवाज़
धीरे-धीरे
खो रही हूँ

~रिंकी सिंह ✍️

#poetry
#thought
#memories

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