MTNL ki ghanti - 14 in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 14

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MTNL की घंटी - 14

11 साल बाद ....

सुबह के सात बज चुके थे।
महक ने धीरे से करवट ली और बिस्तर से उठकर जैसे ही खिड़की खोली, एक ठंडी हवा का झोंका उसके गालों को चूम गया।
धूप की एक मासूम सी किरण उसके चेहरे पर आकर ठहर गई —
मानो कह रही हो, "मैं तुझसे प्यार करती हूँ..."

महक ने अपनी दोनों हथेलियों से चेहरे को हल्के-हल्के रगड़ा, पर जिद्दी धूप वहीं बनी रही...
शायद उसे सच में महक से प्यार हो गया था...

प्यार होता भी क्यों न?
36 की उम्र में भी महक किसी गुड़िया सी लगती थी —
मासूम, सुंदर और हर जिम्मेदारी को मुस्कान से संभालने वाली।

11 साल बीत चुके थे, वक़्त सच मे बहुत तेज भागता है
दिल्ली अब पूरी तरह बदल चुकी थी।
रोहिणी की तीसरी मंजिल पर बने फ्लैट की खिड़की से नीचे झांकती हुई महक ने शहर की धड़कनों को महसूस किया —

सड़कें पहले से कहीं ज़्यादा व्यस्त थीं।
लोग बस भाग रहे थे — कहीं पहुँचने के लिए, किसी को खो देने के डर से, या फिर खुद से दूर जाने के लिए।
दिल्ली की मेट्रो अब लोगों से तेज़ भागने लगी थी।यू लगता था की दिल्ली की रक्तवाहिनी  है मेट्रो  ट्रेक और उनपर मेट्रो ऐसे चलती है जैसे रक्त बह रहा हों उनमे

हर किसी के हाथ में मोबाइल था,
लेकिन दिल और रिश्ते अब वाई-फाई सिग्नल पर टिके थे।
कभी जो बातें चाय पर होती थीं, अब वो सिर्फ "स्टेटस अपडेट" बनकर रह गई थीं।

महक ने उन विचारों को सिर झटक कर दूर किया,
और खिड़की पर पर्दा डाल दिया —
ताकि धूप उसके दोनों सोते हुए बच्चों तक न पहुँचे।

वैसे भी आज रविवार था… और दो दिन बाद दिवाली।

दीवार पर लगी घड़ी ने उसे चौंका दिया —
"अरे! ताया जी की दवा का समय हो गया है!"

वो झटपट नहाकर निकली।
रसोई में जाकर पोहा बनाया, चाय चढ़ाई,
और सब कुछ ट्रे में रखकर नीचे ताया जी के पास आ गई।

"ताया जी, पोहा खा लीजिए। मैं चाय कप में डाल देती हूँ… फिर दवा  खा लीजिएगा।" —
उसने स्नेह से कहा।
ताया जी भी अपने मोबाइल फोन पर स्टेटस अपडेट कर रहे थे,...जिन्हे देख कर महक हंसती हुई बोली 
" आपको भी इस शहर की हवा लग गयी है"
" जवानी भी वापिस आ गयी है इस बूढ़े आदमी की...हर वक़्त फोन की किताब पर(फेसबुक) पर बातें करते रहते है दोस्तों से...मुझ बुढ़िया से तो दो बातें नही की जाती इनसे" ताई जी शिकायत वाले लहजे मे बोली
" अभी मै  बूढ़ा कहाँ  हुआ हूं. .सिर्फ 70 साल का तो हूं. .अभी तो मेरी खाने पीने. .की उम्र है...क्यों महक बेटा" ताया जी हंसते हुए बोले
" अच्छा जी...अब फोन रखिये और कुछ खा लीजिये " महक बहुत हंसते हुए बोली
"तुम्हारी हंसी की आवाज सुन कर मन खुश हों जाता है" फोन को एक तरफ रखते हुए ताया जी बोले

ताया जी ने पोहे की तरफ देखा, फिर महक की तरफ मुस्कुरा कर बोले —
"महक बेटा… तुम कभी भूलती ही नहीं हो।
जिस दिन से इस घर में बहू बनकर आई हो,
उसी दिन से आज तक, कभी नहीं बदली।"

महक ने सिर झुका लिया।
उसकी आँखों में भावनाएँ छलकने लगीं।
उसने धीमे से कहा —
"जब घर को घर बनाना होता है,
तो अपने आप सब याद रहता है ताया जी..."

चाय की प्याली से उठती भाप में उस सुबह की खुशबू, ममता, रिश्तों की गर्माहट और दिवाली की रौनक — सब घुलते जा रहे थे।

महक जानती थी —
हर साल दिवाली कितनी यादे ले कर आती है इस बार की दिवाली कैसी होगी...पता नही 

"आज खाने में क्या पकाऊं, ताई जी?" महक ने किचन से झाँकते हुए पूछा।
"आज आपकी पसंद का खाना बनेगा।"

ताई जी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा,
"ठीक है बेटा... आज सरसों का साग और मक्की की रोटी बना लो। बहुत दिन हो गए।"

"नहीं नहीं!"
तभी ताया जी अंदर से बोले,
"बच्चे नहीं खाते साग-वाग। महक बेटा, आज गरमा गरम छोले भठूरे बना दो... मेरा भी मन वही खाने का है। तेरी ताई भी खा लेगी वही।"

ताई जी ने चुपचाप मुँह फुला लिया,
"तुम ससुर-बहू मिलकर किसी की चलने ही कहाँ देते हो।
मेरा क्या है, मैं तो अचार और रोटी से भी खा लूंगी।"

महक मुस्कुरा कर उनके पास आई।
ताई जी के गले में बाहें डाल कर बोली —
"ऐसे कैसे मैं अपनी ताई जी को नाराज़ होने दूं?
कल पक्का साग बनाएंगे, मक्की की रोटी के साथ, और ऊपर से गुड़ का टुकड़ा भी।
आज छोले भठूरे, कल ताई जी की पसंद।
अब ताई जी खुश?"

ताई जी ने नज़रें चुराते हुए हल्के से सिर हिलाया,
"अच्छा ठीक है बेटा...
तू सदा मुस्कुराती रह... यूँ ही खुश रह...
पूरे घर को संभालना आता है तुझे।"

महक ने ताई जी के माथे पर हल्का सा चुम लिया और मुस्कुराते हुए कहा —
"आप लोगों से ही तो सीखा है सब। आप लोग है तभी तो मै और मेरे दोनो बच्चे है नही तो जाने क्या होता"
"बस बस ...जल्दी बनायो फिर मैने दोस्तों को फोन पर फोटो भी भेजनी है"  ताया जी बोले

                            __________
6 साल पहले एक हादसे ने महक की जिंदगी को बिल्कुल बदल दिया था...कभी कभी हलात ऐसे बन जाते है की इंसान ना तो जी पाता है ना मर पाता है...बहुत  बोलने वाली महक अब चुप हों गयी थी ..उसके लफ्ज़ अब कागज पर बोलते थे...अपने आप मे सिमट कर कुछ ना कुछ लिखती रहती थी ....
पड़ी लिखी तो पहले से थी अब पास ही एक छोटे से स्कूल में पढ़ाना शुरु कर दिया था...
अपने बारे मे तो सोचना ही भूल गयी थी बस स्कूल , घर ,दोनो बच्चे और दोनो बूढ़े लोग यानी ताया जी और ताई जी इनके लिए ही जी रही है अब ....
महक की ज़िंदगी क्या मोड लेगी अब?
.....to be continued