दस दिन की बेचैनी, दुआओं, और देखभाल के बाद…
आज देव जी को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल रही थी।
महक के मन में एक अजीब-सी राहत थी — जैसे कोई अपना ठीक हो गया हो।
पिछले कई दिनों से वह हर दिन सूप, दलिया या खिचड़ी बनाकर अस्पताल भिजवा रही थी।
हर बर्तन में वो सिर्फ स्वाद नहीं, अपना मन, अपनी परवाह भी परोस देती थी।
उसे खुद भी नहीं पता था ये सब क्यों कर रही है… बस अच्छा लगता था।
देव जी के लिए कुछ करना, जैसे उसकी आत्मा को तसल्ली देता।
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उस रात नींद आँखों से कोसों दूर थी…
फरवरी की हल्की ठंडी हवा महक के गालों को छूती हुई कोई धुन बुन रही थी।
महक के भीतर कोई संगीत बज रहा था — धीमा, मधुर, लेकिन बेहद गहरा।
उस धुन पर उसका मन एक मोर की तरह थिरक रहा था।
छत पर चलते हुए उसने सिर उठा कर आसमान देखा —
पूर्णिमा का चाँद अपनी पूरी चमक के साथ साक्षी बन खड़ा था,
महक के उस पलो का, जो वो सिर्फ अपने भीतर महसूस कर रही थी।
बार-बार उसका मन वहीं लौट जाता…
वो कागज़ का पन्ना बार-बार खोल कर पढ़ती,
जो देव जी ने अस्पताल से भेजा था ताया जी के हाथ उसके लिए....
"महक जी, आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं।
जब भी खाया, माँ के हाथ का खाना याद आ गया।
थैंक्स।"
बस… इतना-सा लिखा था… पर महक के लिए यह कुछ कम नहीं था।
माँ के हाथ का खाना —
जिसमें स्वाद से कहीं ज़्यादा अपनापन, ममता, और एहसास होता है।
देव जी ने उसका खाना उस अपनेपन से जोड़ा —
महक के दिल में कुछ हलचल मच गई थी।
क्या सच में कोई रिश्ता ऐसा भी होता है
जिसका कोई नाम नहीं… उम्र की सीमाएं नहीं…
बस मन से जुड़ा होता है?
चाँदनी बिखरी थी, छत पर अकेली टहल रही थी महक…
कि तभी ताया जी ऊपर आ गए।
मुस्कुराते हुए बोले,
"ठंड लग जाएगी बेटा… नीचे चलो।
गौरव भी टूर से लौटेगा,तो कहेगा – मेरी बीवी का ध्यान नहीं रखा।"
महक चौंकी, फिर मुस्कुरा कर बोली,
"मैं ठीक हूँ ताया जी… आप भी रुकिए ना थोड़ी देर।"
"ठीक है..." कह कर ताया जी कुर्सी पर बैठ गए।
महक ने मुस्कुराते हुए कहा,
"ताया जी, आपको मेरा एक सीक्रेट तो पता है…
पर आज आपकी बारी है।
मुझे भी आपका एक सीक्रेट जानना है।"
ताया जी ने चौंक कर पूछा,
"कैसा सीक्रेट?"
महक थोड़ी हिचकिचाई, फिर धीरे से बोली,
"चिंटू… आपने बड़े बाबू को चिंटू क्यों कहा था उस दिन?
वो आपके कौन लगते हैं?"
ताया जी की आँखों में हलचल होने लगी।
चेहरे पर जैसे पुरानी चोटों का दर्द उभर आया।
आँखें बंद कर लीं और सिर कुर्सी की पीठ से टिका लिया।
महक को लगा कही वो ताया जी की नाजायज औलाद तो नही...नही नही क्या सोच रही हू मै भी ..सही कहा था देव जी ने की मै कहानियाँ बहुत बनाती हूं ।
महक घबरा गई,
"आप ठीक हैं न ताया जी?"
धीरे से बोले,
"मैं तो ठीक हूं बेटा… बस, काश चिंटू ठीक हो…"
कुछ देर चुप रहने के बाद, उनकी आवाज़ गहराई से आई —
"आज से करीब 35 साल पहले की बात है…"
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तीन दोस्त थे — मैं, कुणाल और विशाल भारद्वाज।
कुणाल ने अपनी बचपन की मित्र से शादी की, और उनका एक बेटा हुआ —
‘चिंटू’, जिसे सब बहुत प्यार करते थे।
विशाल ने अपनी मॉडर्न सेक्रेटरी से शादी की — बेटी हुई ,'सोनिया।'
और मेरी शादी… तुम्हारी ताई जी से, घरवालों की मर्जी से।
पोस्ट ऑफिस की सरकारी नौकरी लगने के बाद घरवालों ने रिश्ता तय कर दिया।
पर एक कसक रह गई — संतान ना होने की।
हमने इलाज भी कराया… पर शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था।
सब कुछ धीरे-धीरे ठीक ही चल रहा था…
फिर अचानक — एक हादसे ने सब बदल दिया।
कुणाल और उसकी पत्नी की कार दुर्घटना में मौत हो गई।
चार साल का चिंटू अनाथ हो गया।
विशाल उसे अपने घर ले गया…
पर वहाँ बस विशाल का प्यार था… अपनापन नहीं।
सोनिया और उसकी माँ ने कभी उसे स्वीकार नहीं किया।
विशाल ने जरूर उसे बेटा जैसा माना, लेकिन उसकी पत्नी के लिए वो बस एक बोझ था।
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चिंटू बड़ा हुआ — समझदार, संवेदनशील और खुद्दार।
वहीं सोनिया… बेकाबू, बिगड़ी हुई… शराब की लत तक लग गई थी।
विशाल ने उसे बाहर पढ़ने भेज दिया।
चिंटू ने यही दिल्ली के रामजस कॉलेज में दाख़िला लिया।
वहीं उसकी मुलाकात हुई मीरा से…
शांत, समझदार… उसके जज़्बातों को समझने वाली।
बहुत प्यारी जोड़ी थी ..मीरा गीत लिखती ओर चिंटू गाता
कॉलेज में दोनो एक साथ होते ..लगता था एक दूसरे के लिए ही बने है ..वह खुश रहता...बेहद खुश
हर पल कुछ ना कुछ गुनगुनाता रहता था।
वो दोनों अक्सर मेरे पास आते —
मीरा सच में बहुत प्यारी लड़की थी…
बिल्कुल चिंटू जैसी — सलीके और संवेदना की मूरत।
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चिंटू का सपना था — स्वावलंबी बनना।
सरकारी ब्रांच मैनेजर की पोस्ट निकली, उसने मेहनत से परीक्षा पास की और पद पा लिया।
पर यही बात…
विशाल को पसंद नहीं आई।
उसने कहा —
"बिजनेस संभालो… नौकरी छोड़ो… मेरी बेटी के साथ घर बसाओ।"
चिंटू ने respectfully मना कर दिया।
वादा किया कि नौकरी के बाद समय निकाल कर सोनिया की मदद करेगा —
पर शादी? नहीं…
विशाल ने भावनात्मक दबाव डाला —
"बिजनेसमैन होने के कारण घाटा नहीं खाना चाहता था उसने चिंटू से अपनी परवरिश की कीमत मांग ली"
बस फिर उसे मजबूरन हां कहना पड़ा ...
और कर दी गई सोनिया और चिंटू की शादी।
चिंटू उलझ गया —
मीरा को समझाना चाहा… पर वो टूट गई।
आखिर कितना ओर कब तक समझती वो
और… चली गई।
उस दिन चिंटू मेरी गोद में सिर रख कर बहुत रोया था।
मैंने पहली बार उसकी आँखों में इतना गहरा दर्द देखा।
अपने माँ बाप के जाने का दर्द महसूस नही कर पाया था बहुत छोटा सा था तब ..पर मीरा के जाने का दर्द उसके बर्दास्त से बाहर था।
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"फिर क्या हुआ ताया जी?"
महक की आवाज़ टूटी सी थी।
ताया जी बोले —
"उस दिन मेरी विशाल से बहुत बड़ी लड़ाई हुई।
दोस्ती… जो वर्षों पुरानी थी… अजनबीपन में बदल गई।
"बेटा एक गिलास पानी पीला दो" ताया जी आवाज मे दर्द और आँखों मे आंसू थे
" जी" कहती हुई महक नीचे रसोई घर की ओर चल पड़ी
अब समझ आ रहा है चिंटू ओर ताया जी का रिश्ता क्या है पर कहानी अभी तक अधूरी थी..
चिंटू को ताया जी ने क्यों नही पाला?
उनका तो अपना कोई बच्चा भी नही था?
चिंटू बिजनेस क्यों नही करना चाहता था ?
और भी बहुत कुछ...
जल्दी से पानी ले कर छत की ओर गयी कही ताया जी बात अधूरी छोड़ कर नीचे ना आ जाए
चांद कि ओर ताकते हुए ताया जी के गालो पर आंसू मोती जैसे चमक रहे थे...
चार महीने पहले MTNL की घंटी से बने रिश्ते को लेकर महक के दिल मे दर्द है तो ताया जी के दिल मे दर्द होना तो स्वाभाविक है ।
.....to be continued