उस रात के बाद…
उस रात के बाद पहली बार देव को चैन की नींद आई।
कान्हा भी बिना किसी दौरे के गहरी नींद में सोया रहा।
देव हर थोड़ी देर में उठकर उसे देखता—
कभी उसके माथे पर हाथ फेरता,
कभी सीने पर हाथ रखकर उसकी साँसें महसूस करता…
और फिर खुद ही तसल्ली लेकर वापस लेट जाता।
जैसे उसे डर हो—
कहीं ये सुकून… बस एक सपना न हो।
दूसरी तरफ… महक की रात जागते हुए बीती।
देव की टूटी हुई आवाज़…
उसकी सिसकियाँ…
कान्हा की मासूमियत…
सब उसके भीतर कहीं गहरे उतर गया था।
फोन पर हुई वो बातचीत—
अब सिर्फ एक घटना नहीं रही थी…
वो उसकी आत्मा के किसी कोने में जगह बना चुकी थी।
महक के ख्याल अब उसके अपने नहीं रहे थे—
देव… कान्हा… सोनिया…
सब उसके चारों ओर घूम रहे थे।
और वो—
एक सूखे पत्ते की तरह…
उन भावनाओं के भंवर में बहती जा रही थी।
सुबह कुछ अलग थी।
रोज़ की तरह सब काम निपटाते हुए भी…
उसका मन कहीं और अटका हुआ था।
रसोई में खड़ी थी, तभी गौरव पीछे से आकर उसे बाहों में भर लेता है।
हर रोज़ की तरह गुडबाय किस देने ही वाला था कि महक एकदम चौंक जाती है।
“क्या हुआ? डर क्यों गई?”
गौरव ने उसके माथे को छूते हुए पूछा।
महक बिना कुछ कहे उससे लिपट जाती है।
जैसे खुद को संभालना मुश्किल हो रहा हो।
वो कुछ कहना चाहती थी…
कल रात की सारी बात बताना चाहती थी…
तभी—
📞 ट्रिन… ट्रिन…
दोनों की नज़र फोन की तरफ गई।
गौरव ने रिसीवर उठाया—
“हाँ… जी सर… अभी आता हूँ…”
“ऑफिस जाना है, बॉस का फोन था,” कहकर वो जल्दी से निकल गया।
दरवाज़ा बंद हुआ…
और घर फिर से शांत हो गया।
महक वहीं खड़ी रह गई।
उसके होंठों से धीमे से निकला—
“काश… देव जी का फोन होता…”
पूरा दिन जैसे रुक-रुक कर बीता।
हर बार फोन बजता—
दिल की धड़कनें ठहर जातीं।
हर बार उम्मीद…
और हर बार खालीपन।
उसे समझ नहीं आ रहा था—
वो देव के लिए परेशान थी… या कान्हा के लिए।
बस… एक बेचैनी थी…
जो हर घंटे गहरी होती जा रही थी।
आज…
दोपहर की हल्की धूप आँगन में बिखरी हुई थी।
गौरव और ताया जी डॉक्टर के पास गए थे।
महक धूप में खड़ी…
अपने ही ख्यालों में खोई थी।
तभी—
📞 ट्रिन… ट्रिन…
इस बार वो दौड़ी।
जैसे दिल को यकीन हो—
ये वही है।
“ह… हेलो?”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“हेलो… कैसी हो, महक?”
वही आवाज़।
वो ठहर गई।
“आप… आप कैसे हैं, देव जी?
और कान्हा?
इतने दिन से फोन क्यों नहीं किया… बहुत चिंता हो रही थी…”
शब्द जैसे उसके अंदर से फूट पड़े।
देव हल्का सा मुस्कुराया—
“मैं ठीक हूँ… और कान्हा भी अब बेहतर है।
जब भी बेचैन होता है… तुम्हारा वही भजन सुना देता हूँ।”
महक चुप हो गई…
फिर धीरे से बोली—
“मुझे… बहुत चिंता हो रही थी…”
देव ने नरमी से कहा—
“इतनी चिंता मत किया करो… महक…”
उस एक वाक्य में जो अपनापन था—
वो उसके दिल में उतर गया।
“एक बात पूछूँ?” देव ने कहा।
“जी… पूछिए…”
महक ने जल्दी से जवाब दिया,
“घर में अभी कोई नहीं है…”
देव कुछ पल चुप रहा… फिर बोला—
“मैं कॉलेज में सिंगर था…
कई इनाम जीते…
लेकिन ज़िंदगी ने सब छीन लिया…”
उसकी आवाज़ धीमी हो गई—
“पर उस दिन… तुम्हारा भजन सुनकर…
मैं फिर से गुनगुनाने लगा हूँ… कान्हा के साथ…”
रुककर उसने कहा—
“थैंक यू… महक…
तुम… बहुत खूबसूरत आत्मा हो…”
महक की आँखें झुक गईं।
“प्लीज़… ऐसा मत कहिए…”
उसने धीमे से कहा,
“जब भी ज़रूरत हो… फोन कर लीजिए…”
देव हल्का हँसा—
“कोशिश करूँगा… तुम्हें परेशान न करूँ…”
कुछ देर बाद—
“आपको देवी प्रसाद मिल गए?”
महक ने बात बदली।
देव कुछ पल चुप रहा…
फिर बोला—
“हाँ… मिल गए… और बहुत कुछ भी…”
महक समझ नहीं पाई…
पर कुछ अजीब जरूर लगा।
“आप जॉब करते हैं?”
उसने हल्के अंदाज़ में पूछा।
“हाँ… दिल्ली के दिल में…”
“मतलब कनॉट प्लेस?”
महक मुस्कुरा दी।
“इंटेलिजेंट भी हो…”
देव हँसा।
दोनों तरफ हल्की हँसी गूँज उठी।
कुछ पल बाद महक ने हिम्मत की—
“आप… अपना नंबर दे दीजिए…
कभी… कान्हा से बात कर लूँगी…”
देव ने तुरंत जवाब दिया—
“ज़रूरत नहीं… मैं खुद कॉल कर लूँगा…”
एक पल को महक चुप हो गई।
“फिर… आप कॉल ज़रूर करना…”
उसने धीमे से कहा।
“ज़रूर…”
और बिना रुके—
“बाय, महक।”
“बाय…”
फोन कट गया।
लेकिन इस बार…
महक के भीतर कुछ बदल चुका था।
चेहरे पर मुस्कान थी…
दिल की धड़कनें तेज़ थीं…
जैसे किसी ने उसकी ज़िंदगी में
एक नया रंग भर दिया हो।
एक अजनबी—
जो अब अजनबी नहीं रहा।
रात को…
महक बार-बार आईने में खुद को देख रही थी।
“मुझे इतना फर्क क्यों पड़ता है?”
“मैं क्यों इंतज़ार कर रही थी?”
“ये… सब क्या है?”
उसने खुद को समझाया—
“नहीं… ये गलत है…
मुझे ये सब भूल जाना चाहिए…”
पर दिल—
हर बार…
उसी आवाज़ की तरफ लौट जाता।
📞 फोन टेबल पर रखा था…
और महक उसे देख रही थी।
जैसे वो फिर बजेगा…
और कोई फिर कहेगा—
“हेलो… कैसी हो, महक…”
महक पर देव का असर क्या रंग लाएगा?
...to be continued