नवंबर की हल्की ठंड...
और मीठी-सी धूप में...
आँगन में बैठी महक अपने गीले बालों को सुखाते हुए कुछ गुनगुना रही थी।
तभी अंदर से फोन की आवाज़ आई...
📞 "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..."
"कोई चैन भी नहीं लेने देता आजकल..."
कहते हुए वो झल्ला कर कमरे की ओर बढ़ी।
📞 "हेलो... कौन?" – महक ने फोन उठाया।
"हेलो..."
एक अनजानी मर्दानी आवाज़ थी।
"रोंग नंबर!" – कह कर वो फोन रख कर मुड़ने ही वाली थी,
तभी फिर से घंटी बजी...
📞 "ट्रिन ट्रिन..."
इस बार, महक के 'हेलो' कहने से पहले ही सामने से आवाज़ आई...
"फोन मत रखिएगा... आपको कैसे पता कि रोंग नंबर है?"
महक थोड़ा चौंकी।
"आपकी आवाज़ किसी से मैच नहीं कर रही... इसलिए।"
"लेकिन... मैं तो देव..."
"यहाँ कोई देवी प्रसाद नहीं रहते!"
कहकर महक ने झट से फोन रख दिया।
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फिर वो वापस धूप में आकर बैठ गई।
थोड़ी चिड़चिड़ी सी...
सोचने लगी —
"ऊपर ताउ जी की तबियत ठीक नही हैं,
बेटी स्कूल गई है — आने वाली होगी,
पति गौरव सुबह-सुबह निकल जाते हैं शाम को आते हैं
सास कुछ घर के काम नहीं कर पातीं...पर सारा दिन घूमने की एनर्जी है उनमे
मैं...? सिर्फ 25 की हूं...
पर ज़िम्मेदारियाँ... जैसे उम्र से बहुत आगे निकल गई हूं।"
और इस MTNL फोन की तो बात ही मत पूछो...
दिन में 10 बार उठाना पड़ता है।
काश कोई ऐसा फोन होता,
जिसे साथ लेकर हर काम कर सकती…
तो शायद बोझ थोड़ा कम लगता।
सोचते-सोचते महक मुस्कुरा उठी...
शायद ऐसी ज़िंदगी की आदत सी हो गई है अब।
महक ख्यालो में खो गयी....
वक्त का पहिया बहुत तेजी से चलता है कहाँ तो दो चोटी बना कर बालो मे तेल लगा कर स्कूल जाया करती थी।अब बेटी की माँ बन चुकी थी और उसकी बेटी स्कूल जाने लगी है अब
अभी कॉलेज पास किया ही था की उसका रिश्ता पक्का कर दिया पापा ने...फिर उन्हे रिश्ता मना करने की कोई वजह भी नही दिख रही थी
छोटा सा परिवार था...पति ,सास पति के ताऊ जी ओर ताई जी जिनका कोई बच्चा नही था।
उस परिवार मे सुख सुविधा बहुत ज़्यादा नही थी तो बहुत कम भी नही थी।एक सिंपल सी मिडल क्लास फैमिली थी। अब महक भी इस परिवार का हिस्सा थी।
महक ने उस घर को धीरे-धीरे अपना बना लिया था। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, सबकी पसंद-नापसंद अब उसे रट चुकी थी। ताई जी की कमर में दर्द हो तो गरम पानी की थैली और ताऊ जी के लिए शाम को बिना चीनी की चाय—महक ने सब कुछ संभाल लिया था। ताया जी ताई जी फर्स्ट फ्लोर पर रहते थे पर अपनापन बहुत था उन दोनो मे।
पति थोड़ा कम बोलने वाले इंसान थे, पर गर्म मिजाज के थे ,उनकी आंखों में एक अपनापन था, जो महक को हमेशा सुकून देता। शादी को अब आठ साल हो गए थे। उनकी बेटी परी अब दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। परी के बालों में दो छोटी-छोटी चोटी बनाते हुए महक अक्सर खुद को याद करती—वही दो चोटियाँ, वही रिबन, वही स्कूल ड्रेस।
महक सोचती—"कैसे वक्त पंख लगा कर उड़ गया... कल ही की बात लगती है।"
कभी-कभी जब वो अकेली होती, तो अपने कमरे की खिड़की के पास बैठ जाती, बाहर के नीले आसमान को देखती और अपने पुराने ख्वाबों के टुकड़ों को समेटने लगती। उसे लिखना पसंद था, पर शादी और जिम्मेदारियों के बाद वो सब पीछे छूट गया था।
आज काम जल्दी-जल्दी खत्म करके…
महक आँगन में धूप सेंकने ही बैठी थी…
कि फिर वही आवाज़ गूंज गई —
📞 "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..."
महक ने सधे हुए स्वर में फोन उठाया —
📞 "हेलो?"
सामने से फिर वही आवाज़...
"हेलो... जी मैं देव..."
महक मुस्कुराई…
"जी, यहाँ कोई देवी प्रसाद नहीं रहते।
आप शायद रॉन्ग नंबर डायल कर रहे हैं।"
इस बार उसकी आवाज़ में झुंझलाहट नहीं थी…
बल्कि तहज़ीब और नरमी थी।
"मुझे कुछ ज़रूरी काम था… पैसों से जुड़ी बात है…"
— दूसरी तरफ से वही आदमी बोला।
"आप सिर्फ मेरा एक काम कर दे" अभी बात पूरी नहीं हुई थी पर
महक बोली:
"कोई बात नहीं,
अगर मैं आपकी मदद कर सकूं तो ज़रूर करूँगी।
आप परेशान मत होइए।"
बिना रुके एक सांस मे महक बोलती गयी
"मैं देवी प्रसाद का नंबर ढूंढकर रख लूंगी…
वैसे, कितने पैसे लेने हैं उनसे?"
सामने से धीमे स्वर में आया:
"आप समझ नहीं रहीं… ये ज़रूरी है…"
महक ने आवाज़ की गंभीरता को महसूस तो किया,
पर कहा:
"आप कल फिर फोन कीजिए,
कुछ ना कुछ हल जरूर निकालेंगे…
फिलहाल मेरी बेटी स्कूल से आ गई है।"
इतना कहते हुए महक ने
📞 फोन रख दिया गया…
महक शांत स्वभाव की थी...पर हर इंसान मे कोई ना कोई कमी होती है वैसे ही उसमे थी....वो थी बहुत ज्यादा बोलना। फिर भी उस लड़की ने ....
(या कहें अब लड़की नहीं — औरत बन चुकी थी।)
अपने चुलबुलेपन और दया ने
सबका दिल जीत लिया था।
वो उन लोगों में से थी…
जो रॉन्ग नंबर से आई आवाज़ में भी
किसी की परेशानी महसूस कर लेती है।
सोमवार का दिन था…
आँगन में धूप सुनहरी चादर सी बिछी थी।
महक वहीं बैठी थी…
सोच रही थी —
"दो दिन हो गए… फोन नहीं आया…
शायद रोंग नंबर वाले की परेशानी सुलझ गई होगी…"
तभी —
📞 "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..."
उसके मन में हल्की सी हलचल हुई —
"काश… उन्हीं का फोन हो…
तो शायद कुछ और मदद कर सकूं…"
📞 "हेल्लो?"
फिर वही जानी-पहचानी आवाज़…
महक ने हल्के मुस्कान के साथ पूछा —
"आपको मिले देवी प्रसाद?"
एक पल की चुप्पी…
फिर धीरे से जवाब आया —
"नहीं…"
फिर उस आदमी ने कुछ अलग ही पूछा —
"एक बात पूछूं... आप बुरा मत मानिएगा…
आप हमेशा इतनी ही जल्दी और ज्यादा बोलती हैं?
कभी किसी की बात सुनती नहीं?"
महक का चेहरा सन्न हो गया…
थोड़ा सा झिझकते हुए बोली —
"सॉरी...
आगे से कभी बात नहीं करूंगी…
और आप भी दोबारा फोन मत करना।"
📞 "क्लिक!" — फोन पटक दिया
उसका दिल भारी था…
पर गुस्से से नहीं,
शायद उस शर्मिंदगी से…
जो तब होती है जब हम किसी को सुन नहीं पाते।
📞 "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन— ट्रिन..."
इस बार महक की सास ने फोन उठाया —
"महक बेटा, ऊपर ताया जी को बुला दे…
उनके ऑफिस से फोन है।"
महक ने चैन की सांस ली —
"शुक्र है… वो आदमी नहीं था…" लगता है ताया जी का फोन फिर खराब हों गया ..तभी ऑफिस का फोन नीचे आया है
सोचते हुए वो ताया जी को बुलाने चल दी।
पर दिल के किसी कोने में
एक सवाल बैठा रह गया…
"क्या मैंने उसे सच में सुना था?" क्या मै सच मै ज्यादा बोलती हूं किसी की नहीं सुनती....वो होता कौन है मुझें सुनाने वाला...अब फोन आया तो चार बातें जरूर सुना दूंगी।
वो कौन है जिसका फोन था?
जानकार या इत्तेफाक़?
.........to be continued