अगले कुछ दिनों तक महक ने खुद को रोज़मर्रा के कामों में उलझाए रखा।
पर जितनी कोशिश करती, उतनी ही उस अनजानी आवाज़ की परछाईं और गहरी होती जाती।
रात को, जब पूरा घर नींद में डूब जाता, महक चुपचाप ड्रॉइंग रूम में आकर टेलीफोन को निहारने लगती…
मानो कोई खामोश साया उसे पुकार रहा हो।
अब उसे उस “रॉन्ग नंबर” वाले इंसान से एक अजीब-सी हमदर्दी होने लगी थी।
उसके मन में कई सवाल बार-बार सिर उठाते—
कौन है वो?
देवी प्रसाद कौन है?
क्या सचमुच कोई मुसीबत में है… या ये सब मेरे मन का वहम है?
या फिर… ये सब सिर्फ इत्तेफाक नहीं, कोई इशारा है?
इन सवालों ने महक को भीतर तक बेचैन कर दिया था।
ज़िन्दगी भी कितनी अजीब होती है—
भावनाओं का ऐसा दलदल, जहाँ जितना बाहर निकलने की कोशिश करो, उतना ही और गहराई में धँसते चले जाओ।
महक के भीतर एक अनकही घबराहट थी…
जैसे कोई अनदेखा खतरा उसके बहुत करीब आ रहा हो।
कुछ दिन उसने इन खयालों से लड़ने की कोशिश की,
मगर वक़्त की धूल धीरे-धीरे सब पर जमती चली गई…
90 के दशक का वो दौर भी अजीब था।
घर की औरतें अपना जीवन जीती कहाँ थीं?
उनका हर पल दूसरों के नाम होता था।
अगर कभी-कभार फुर्सत के कुछ लम्हे मिल भी जाते,
तो दिल चाहता—उन्हें जी भर के जी लिया जाए।
दिसंबर के पहले हफ्ते की एक ठंडी शाम…
कुछ ऐसे ही आई महक की ज़िंदगी में।
घर में सब अपने-अपने काम में लगे थे।
सास, ताई जी और परी किसी रिश्तेदार के यहाँ गए हुए थे।
ऊपर ताया जी को चाय और दवाई देकर महक ने सुला दिया था—
महक ने सोचा क्यों ना
आज थोड़ा वक्त खुद के लिए भी निकाल ही लिया जाए।
रसोई में जाकर उसने स्पाइसी मैगी और ठंडी कॉफी बनाई।
टीवी ऑन किया और रजाई में लिपटकर बैठ गई—
अपना पसंदीदा सीरियल “क्योंकि सास भी कभी बहू थी” देखने।
तभी फोन की घंटी बजी—
📞“ट्रिन… ट्रिन… ट्रिन…”
उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
“कहीं वो रॉन्ग नंबर वाला तो नहीं…?”
फिर खुद को समझाया—
“इतने दिन हो गए… शायद अब कभी फोन न आए।
और अगर वही है, तो आज उसे ठीक से सुना दूँगी…”
गौरव का गुस्सा… और ताया जी की बातें…
सब एक साथ उसके दिमाग में घूम गईं।
महक ने काँपते हाथों से रिसीवर उठाया—
“हैलो? कौन?” उसकी आवाज़ सख्त थी।
“हैलो… जी मैं…”
उधर से आवाज़ आई ही थी कि महक का गुस्सा फूट पड़ा—
“आप बार-बार फोन क्यों करते हैं? आपको क्या लगता है, मैं कुछ समझती नहीं?
आप किसी देवी प्रसाद को नहीं ढूंढ रहे… आप बस मुझे परेशान कर रहे हैं!”
वो बिना रुके बोलती चली गई—
“मैं आपकी मदद करना चाहती थी, लेकिन आप उसका गलत फायदा उठा रहे हैं।
दुबारा फोन मत कीजिए… वरना अच्छा नहीं होगा!”
"मेरे ताया जी अगर सो नहीं रहे होते तो तुम्हे बताते अच्छे से की फोन करके परेशान करने का अंजाम..."
उधर कुछ पल खामोशी रही…
फिर वही शांत आवाज़ आई—
“आपके ताया जी सो रहे हैं?
अगर नहीं सोए होते… तो क्या आप उनसे मेरी बात करवा देतीं?”
महक सन्न रह गई।
“कितने बेशर्म हैं आप…!”
वो फोन काटने ही वाली थी कि उधर से फिर आवाज़ आई—
“एक बात बताइए… क्या आप लेखिका हैं?”
महक जैसे जम सी गई।
उसका अतीत…
स्कूल, कॉलेज, डिबेट प्रतियोगिताएँ…
कॉपियों में भरी कविताएँ…
सब एक पल में आँखों के सामने से गुजर गया।
धीरे से उसने पूछा—
“आपको कैसे पता?”
“आप कहानियाँ बहुत अच्छी गढ़ती हैं…
और बातें? उनसे तो जादू टपकता है…”
“आप… कौन हैं?” अब उसकी आवाज़ नरम थी।
“अब क्या बताऊँ… आपने तो मुझे अपनी कहानी का खलनायक बना ही दिया है…”
उसने हल्की हँसी के साथ कहा।
“सॉरी… प्लीज बताइए, आप कौन हैं?”
“मेरा नाम… देव है।”
कुछ पल के लिए दोनों तरफ खामोशी छा गई।
तभी अचानक फोन में हलचल हुई—कुछ दर्द भरी चीखने की आवाज़ आयी...
“देव भइया… कान्हा दवाई नहीं खा रहा…”
एक बच्चे की दर्द भरी आवाज़…
जैसे किसी घर में अफरा-तफरी मची हो।
महक का दिल जोर से धड़कने लगा।
“भइया जल्दी आइए… उसे दौरा पड़ रहा है!”
अब यह कोई वहम नहीं था।
कुछ सच में गड़बड़ थी।
महक घबराकर बोली—
“हैलो?… आप सुन रहे हैं?
प्लीज… कान्हा के पास रिसीवर ले जाइए… प्लीज!”
उसकी आवाज़ काँप रही थी…
लेकिन उसमें एक अजीब-सी दृढ़ता भी थी।
उधर क्या हो रहा था…?
देव उसकी बात सुन भी पा रहा था या नहीं…?
कौन था वो इंसान?
और क्यों बार-बार उसकी ज़िंदगी में आ रहा था?
कान्हा कौन है…? और उसके साथ क्या हो रहा है…?
जानने के लिए पढ़िए अगला भाग—
“MTNL की घंटी”
To be continued…