MTNL ki ghanti - 7 in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 7

The Author
Featured Books
Categories
Share

MTNL की घंटी - 7

शाम के चार बज चुके थे...

महक मुँह-हाथ धोकर आँगन में बैठी थी...
धीरे-धीरे ढलती धूप की सुनहरी किरणें आँगन के एक कोने में सिमटने लगी थीं...
महक की उंगलियाँ बार-बार उन्हीं किरणों को छूने की कोशिश कर रही थीं...
जैसे कोई मासूम सा सपना हथेलियों में समेट लेना चाहती हो...

तभी बाहर सड़क पर एक सफेद मारुति कार आकर रुकी...

महक ने दरवाजे की ओट से झाँककर देखा...
एक भारी-भरकम आदमी... हाथ में फाइलें थामे...
सीधा दरवाजे की घंटी पर उँगली रख दी...

महक का दिल जोर से धड़कने लगा...
"क्या बड़े बाबू आ गए?" उसने खुद से सवाल किया...
और जल्दी से दौड़कर अंदर चली गई...

दरवाजा उसकी सास ने खोला...
वो आदमी बिना कोई भूमिका के सीधे अंदर आकर टेबल पर फाइलें रखकर खड़ा हो गया...

महक थोड़ा झिझकती हुई... पानी की ट्रे लेकर सामने आई...
धीरे से बोली... "नमस्ते सर..."

आदमी ने बस एक हल्की सी मुस्कान दी...
पानी पिया... फाइलें सहेजी... और बिना कुछ बोले वापस चला गया...


---

उसी वक्त...
ताया जी सीढ़ियों से उतरते हुए बोले...
"अरे पगली... वो तो बड़े बाबू का ड्राइवर था..."

महक की आँखें फैल गईं...
"ड्राइवर...!" उसके मुँह से खुद-ब-खुद निकला...

तभी ताया जी ने बाहर झाँक कर कहा...
"लो... अब खुद बड़े बाबू आ गए..."

महक ने दरवाजे की तरफ देखा...

दरवाजे पर खड़ा इंसान...
सफेद कमीज..
काली पतलून, हाथ में काला कोट...
सलीके से संवारे हुए घने बाल...
हल्की सी मुस्कान...
आँखों पर फ्रेम वाला चश्मा...
और चाल में एक गज़ब की शालीनता...

ताया जी ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा...
"आओ... आ जाओ... बहुत दिन बाद मुलाकात हो रही है..."
और बड़े प्यार से उसे  गले लगा लिया...

                    -------------------

महक के कदम जैसे अपने आप ही ट्रे की ओर बढ़े...
थोड़ा हिचक... थोड़ा संकोच... और दिल में धड़कनों का शोर लिए...
वो पानी की ट्रे लेकर सामने आई...

"पानी..."
उसकी आवाज़ हल्की थी... जैसे खुद भी सुनना चाह रही हो कि उसने सच में कहा क्या...

बड़े बाबू ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा...
उनकी आँखें... जैसे किसी अनकही पहचान की कोशिश कर रही थीं...
फिर वो मुस्कुरा कर बोले...
"नो थैंक्स..."
और सीधे जाकर सोफे पर बैठ गए...
                            ----------

महक की नज़रें... चुपचाप... पर बहुत ध्यान से उन्हें देखती रहीं...

दुबली-पतली कद-काठी...
चेहरे पर गंभीरता...
आँखों में गहराई...
और वो चश्मा... जो उनके व्यक्तित्व में एक अजीब सी कशिश जोड़ रहा था...

महक के मन में हलचल मच गई...
"क्या पोस्ट ऑफिस के बड़े बाबू ऐसे होते हैं...?"
उसने खुद से सवाल किया...

वो जैसे खुद को रोक नहीं पा रही थी...
किचन में गई तो सही... लेकिन हाथ बस चल रहे थे...
मन... बार-बार दरवाजे की तरफ भाग रहा था...

गाजर का हलवा गैस पर चढ़ा था...
चम्मच उसकी उंगलियों के हिसाब से खुद ही हिल रहा था...
पर दिमाग... बस एक ही चेहरे में उलझा था...कैसा होगा वो चेहरा...कुछ मुरझाया होगा ...या कुछ खिला खिला सा होगा ...पर जैसा भी होगा पोस्ट ऑफिस वाले बाबू जैसा ना होगा...


---

थोड़ी देर बाद...
महक चाय और पकोड़े की ट्रे लेकर ड्राइंगरूम में आई...
बड़े बाबू कुछ नर्वस से दिखे...
जैसे कोई बात कहनी हो... पर शब्द गले में अटक गए हों...

महक धीरे-धीरे प्लेट में पकोड़े डाल रही थी...
तभी...थोड़ी देर बाद...
महक चाय और पकोड़े की ट्रे लेकर ड्राइंगरूम में आई...
बड़े बाबू कुछ नर्वस से दिखे...
जैसे कोई बात कहनी हो... पर शब्द गले में अटक गए हों...

महक धीरे-धीरे प्लेट में पकोड़े डाल रही थी...
तभी...

📞 "ट्रिन ट्रिन... ट्रिन ट्रिन..."

फोन की घंटी बजी...

महक ने बिना एक पल गंवाए...
चाय वहीं रख दी और दौड़कर फोन उठा लिया...
"हेलो... हेलो... कौन?"
उसकी आवाज़ में अजीब सी उतावली थी...

"मम्मी... मैं आपको थोड़ी देर बाद फोन करती हूं..."
कहकर महक ने जल्दी से फोन रख दिया...पर चेहरे पर अजीब सी उदासी आ गयी

उसकी आँखें... बस उस MTNL फोन को ही देख रही थीं...
जैसे उसकी घंटी... उसी का इंतज़ार हो...
चेहरे पर गहरा इंतज़ार...
जैसे कोई बहुत पुराना सपना... इस घंटी के जरिए पूरा होने वाला हो...


---

बड़े बाबू... चुपचाप... उसे ही देख रहे थे...
बाकी सबने... महक की इस उतावली को...
उसके चुलबुले स्वभाव का हिस्सा समझ लिया...

महक ने दोबारा चाय का कप उठाया...
काँपते हाथों से... बड़े बाबू की तरफ बढ़ाया...

लेकिन... उसकी नजरें... उन आँखों से टकराईं...
उन चश्मे के पीछे से झाँकती... गहरी... और कुछ कहती सी आँखें...

महक के हाथ काँप गए...
चाय... अचानक... बड़े बाबू के कोट पर छलक गई...

"ओह... सॉरी... सॉरी... गलती से गिर गई... मैं साफ कर देती हूं..."
महक घबरा गई...

बड़े बाबू ने मुस्कुराकर कहा...
"कोई बात नहीं... मैं खुद साफ कर लूँगा... बस बाथरूम बता दीजिए..."

महक ने खुद को सँभालते हुए कहा.
"चलिए... मैं आपको ले चलती हूं..."
महक ने धीरे से कहा...
बाथरूम घर के पिछली तरफ था...

हाथ में कप और गिलास की ट्रे लेकर... वो आगे-आगे चलने लगी...
दिल की धड़कन... अब तक सामान्य नहीं हो पाई थी...
अंदर कहीं एक अनजाना कंपन... हर कदम के साथ और तेज हो रहा था...

तभी... पीछे से एक आवाज़ आई...
धीमी... पर साफ...
गंभीर... लेकिन उसमें एक परिचित अपनापन छिपा था...

"महक जी... MTNL की घंटी सुनकर... रोग नंबर के लिए इतनी बेचैनी... अब तो छोड़ दीजिए...अब तो देवी प्रसाद  भी मिल चुके है"

महक के कदम अचानक रुक गए...
साँसें जैसे थम गईं...

वो घबरा कर पीछे मुड़ने लगी...
पर घबराहट में उसका पाँव मुड़ गया...
हाथ से ट्रे छूट गई...
कप और गिलास ज़मीन पर गिरकर छनाक से टूट गए...

और खुद...
महक... गिरने ही वाली थी...

पर अगले ही पल...
किसी की मजबूत बाहों ने उसे थाम लिया...

वो उन्हीं बाहों में झूल गई...
जैसे वक्त ने उसे एक पल के लिए रोक लिया हो...

उनके हाथों का स्पर्श...
वो स्पर्श... जिसकी कल्पना में...
महक न जाने कितनी बार खुद को
रगड़-रगड़ कर...
साफ करने की कोशिश कर चुकी थी...

आज...
वो स्पर्श...
हकीकत बनकर उसकी साँसों के इतने करीब था...

महक की आँखें... हल्की बंद थीं...
होंठ... कांप रहे थे...
साँसे... बेतरतीब...

अधखुले होंठों से बस इतना ही निकल पाया...
"आप... आप... आप तो...?"

उनके होंठ... महक के कानों के बेहद करीब आए...
धीमी... मगर गहराई भरी आवाज़...

"संभल कर... संभाल लो खुद को... संभाल लो... महक..."

क्या महक अपने आप को संभाल पायेगी....?.
  खुद को जमीन पर गिरने से या देव से...?????
पर कैसे...?
......to be continued
MTNL की घंटी