MTNL ki ghanti - 13 in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 13

The Author
Featured Books
Categories
Share

MTNL की घंटी - 13

दो मिनट बाद बहुत संयमीत लहजे मे बोले देव "आलोक ने मुझें तुम्हारा लिखा पत्र दिया था..तुम्हे फोन करने की हिम्मत जुटा रहा था की कान्हा की तबियत ज्यादा बिगड़ गयी और मुझें छोड़ कर चला गया...अब मेरी जिंदगी जीने का कोई मकसद नही था..पर तुम्हारे पत्र पर लिखी बात ने कुछ होने नही दिया मुझें ..तुम्हारी वजह से मेरे और मेरे कान्हा के चेहरे पर मुस्कुराहट आयी थी...इसलिए तुम्हे फोन किये बिना नही जा सकता था अपने बेटे के पास..  अब तो कोई जीने की वजह भी नही बची...थोड़े काम निपटाने थे...निपटा रहा हू..उसके बाद बेटे के पास जाऊंगा...मेरा इंतजार कर रहा होगा...नींद नही आती ना उसको मेरे बिना......."
महक ने देव की बात काटते हुए कहा" नही देव जी...आपको जीना होगा...कान्हा भी नही चाहता होगा की आप अपनी जिंदगी यू खतम कर दे..उसकी यादो को जिंदा रखे....आप उसके लिए जिंदा रहेंगे...आप देहरादून जाएगे"
"इन पलो मे गर खुद को संभाल लिया तो जरूर जाऊंगा...अभी तो आँखों के आगे सिर्फ अंधेरा है..मुझें नही पता वक़्त मेरी ज़िंदगी को किस ओर ले कर जाएगा"
देव ने कहा

एक अजीब सी चुप्पी छा गयी..शयद बाते खतम हों गयी थी पर महक के मन मे एक प्रशन घूम रहा था..जिसके उत्तर की उसने खुद ही कल्पना की थी और खुद को सजा भी दी थी ..आखिर उसने हिम्मत कर के पूछ ही लिया
"आप… हमारे घर मेरे लिए आए थे ना?"

देव ने हलकी सांस ली......
थोड़ी देर रुक कर बोले...
"महक, तुम उस दिन मायके से जल्दी लौट आई थीं…
मेरा मक़सद सिर्फ़ अंकल जी से मिलना था। वो मेरे पापा के दोस्त थे..बहुत लगाव था उनसे मेरा...मैने ही उनसे दूरी बना ली थी कही सोनिया उनकी बेइजती ना करे...और
उन्होंने ज़िंदगी में कभी छुट्टी नहीं ली थी… ऑपरेशन के बाद पहली बार छुट्टी पर थे…
मैं बस उनका हालचाल जानने गया था… तुमसे मिलने नहीं…
मुझे पता था तुम घर पर नहीं होगी…
लेकिन जब तुम सामने आईं… मैं खुद चौंक गया था।"

महक के गले में जैसे कुछ अटक गया हो।
उसकी आवाज़ कहीं भीतर दब गई…
फिर बमुश्किल निकली —" मुझें नही पता पर आपसे एक लगाव सा महसूस करती हूं ......
क्या… आपके दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं है?क्या आपको कभी मेरा ख्याल भी नही आता था"
सच बताइए… आपको कान्हा की कसम।.....आप हा या ना मे भी जवाब दे दीजिये"

कुछ पल के लिए देव चुप रहा। शायद उसके पास इस बात् का जवाब नही था...या वो देना नही चाहता था 
फिर बोला —
"हाँ बताऊँगा… बिल्कुल बताऊँगा…
वैसे भी ये हमारी आख़िरी कॉल है… पर तुम्हे एक वादा करना होगा...बोलो करोगी वादा?"

महक के शरीर से जैसे प्राण निकल गए हों —
'आख़िरी कॉल.'.. 
"जी कहिए…
मैं वादा करती हूँ… आप जो भी कहेंगे, निभाऊँगी।"
उसने कहा — काँपती आवाज़ में।
"तुम बहुत भावनात्मक लड़की हों..जो जज्बातो से बनी
है ...जो ख्वाबों की दुनिया ज्यादा पसंद करती है हकीकत से...अपने ख्वाबो को..अपनी कल्पना को 'कल्पिता' मे बदलना..उन्हे लफ्ज़ देना...तुम एक किताब लिखना..लिखना ना छोड़ना
"पहला वादा — तुम लिखना नहीं छोड़ोगी… एक किताब ज़रूर लिखोगी।
दूसरा — "परी को बहुत पढ़ाओगी..खूब मन लगा कर पढ़ाओगी..."
और तीसरा…"
देव की आवाज़ काँपने लगी —
"तुम्हारी कोख में जो बच्चा है… शायद… शायद मेरा कान्हा ही हो…
उसे जी भर के प्यार दोगी, माँ बन कर…जो माँ के प्यार के लिए तरसता रहा उसे जी भर कर ममता दोगी ना?"

महक की आँखों से फिर सैलाब बह निकला —
"जी… वादा करती हूँ…हर वादा  निभाऊँगी… अब आप भी वादा निभाइए…
हां या ना में जवाब दीजिए — क्या आपके दिल में मेरे लिए कोई जगह है?"

कुछ पल चुप्पी रही।
फिर देव की आवाज़ आई —
"महक… जब तुमने भजन गाया था कान्हा के लिए…
उसे बहुत सुकून मिला था।
फोन पर वो तुम्हें ढूंढता था…
कुछ बोल नहीं पाता था, पर इशारे से कान पर रिसीवर लगवा लेता था।
तुम्हारी आवाज़ ना सुनकर बेचैन हो जाता था।
कई बार मन किया तुम्हें कॉल करूँ… पर हिम्मत नहीं हुई।
मैं ही उसे भजन सुनाता… वो मेरे साथ गुनगुनाता…मैं 
सोचता था — शायद हम दोनों ऐसे ही जी लेंगे…
उन दिनों मुझे भी बैरंग ज़िंदगी से प्यार होने लगा था
पर भगवान को कुछ और मंज़ूर था।"

फिर एक रुकावट… एक धीमी सी साँस —
"महक… एक बार फिर वही भजन सुना दो…
उस भजन ने मेरी जिंदगी को जीना सीखा 
मैं और कान्हा… दोनों सुनेंगे।"

महक कुछ ना कह सकी।
उसके आँसू, उसकी सांसें… सब थम से गए।
उसने भजन शुरू किया —

"यशोमती मैया से बोले नंदलाला...
राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला..."

भजन गाते-गाते… अचानक उसे रिंगटोन सुनाई दी…
फ़ोन डिसकनेक्ट हो गया।

अब ना वहाँ देव था,
ना उसका उत्तर…
बस रह गया था — एक इंतज़ार।
सिर्फ एक लफ्ज़ हां या ना का इंतज़ार 
अब वो अपने मन से कुछ भी नही सोचेगी
सिर्फ इंतज़ार करेंगी...

वो देर तक MTNL के फोन को अपने सीने से लगाए बैठी रही…
जैसे वो फिर बजेगा…
शायद एक बार और…

पर वो तो आख़िरी कॉल थी।

थक कर… फोन पकड़े-पकड़े वही सो गई।


---

देर  शाम आंख खुली जब किसी ने उसे जगाया —
"महक… यहाँ क्यों सोई हो? देखो तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ — एक सरप्राइज़ गिफ्ट!"
गौरव की आवाज थी।

महक उठ बैठी —
"क्या लाए हो?"

उसने गिफ्ट खोला — एक नया मोबाइल फोन।

महक की नज़र एक बार फिर MTNL के उस पुराने फोन पर चली गई…

गौरव मुस्कराते हुए बोला —
"कल कटवा देंगे ये फोन…
अब इसकी जरूरत नहीं… मोबाइल इस्तेमाल करेंगे।"

महक ने कुछ नहीं कहा।
बस एक लंबी नज़र उस फोन पर डाली —
जिससे देव की आख़िरी कॉल आई थी।
अब फिर कभी नहीं बजेगी…
"MTNL की घंटी…"
          ----------------

"दुनिया में कुछ मोहब्बतें ऐसी होती हैं,
जिन्हें निभाने वाला ख़ुद ही अपनी मोहब्बत का क़त्ल कर देता है।
कब्र भी वही खोदता है... और इल्ज़ाम भी ख़ुद पर ले लेता है।
फिर उम्रभर उस अधूरी मोहब्बत की सज़ा काटता है...
बिना किसी शिकायत, बिना किसी सैलाब के।..…जैसे देव

कुछ मोहब्बतें वक़्त से हार जाती हैं,
कुछ मोहब्बतें गलत वक़्त पर हों जाती हैं 
या शायद ग़लत इंसान से हो जाती हैं।
ऐसी मोहब्बतों को वहीं दफ़न कर देना बेहतर होता है,
वरना ये मोहब्बतें सिर्फ़ एक दिल नहीं, कई ज़िंदगियाँ तबाह कर देने का हुनर रखती  हैं..." जैसे महक
                          __________

.....to be continued