My Dear Professor - Part 18 in Hindi Love Stories by Vartika reena books and stories PDF | माई डियर प्रोफेसर - भाग 18

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माई डियर प्रोफेसर - भाग 18











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अमर अभी राघव से बात कर ही.रहा था की डोर बेल बजी।.राघव को गोद मे लिए ही.वो दरवाजे की तरफ बड गया। 


उसने घर का दरवाजा खोला तो सामने एक महिला खडी थी जो इस समय लेट ट्वंटीज मे होगी। अमर एक तरफ हो गया तो महिला अंदर आ गई।  

महिला ने राघव को अमर.की गोद से.ले.लिया तो अमर ने झुक कर उसके पैर छू लिए। 

महिला मुस्कुरा दी।


" अम्मू...गर्म कपडे क्यो नही पहने है तुमने ? मौसम बहुत ठंडा हो गया है। " , महिला ने कहा।


अमर ने हां मे सर हिला दिया।


" मै भूल.गया था भाभी । "

महिला ने ना मे सर.हिला दिया। 

" राघव की .." , वो अभी बोल ही.रही थी की अमर.बोल पडा , " अन्वी.भाभी आप आराम कर.लिजिए।  राघव का डाइवर मैने चेंज कर दिया था और उसे दूध भी पिला दिया था। "


वो.महिला.यानी अन्वी भाभी होले से.मुस्कुरा दी।. उन्होने आगे बड कर अमर का सर सहला दिया।


" मेरा.बच्चा ! ", वो प्यार से.बोली।

अमर मुस्कुरा दिया।

" मै 25 साल का हूं ! "


" मेरे.लिए तो बच्चे ही हो। "


" बिगाड रही हो तुम इसे अन्वी । ", एक रौबदार मगर नर्म आवाज ने दोनो का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। 

दरवाजे से अमर का बडा भाई और अन्वी के पति विक्रांत अंदर आ रहे थे। 


अन्वी ने विक्रांत को देखा और आंखे गोल घुमा.दी। विक्रांत ने एक नजर उसपर डाली फिर तिरछा मुस्कुरा दिया। 


अमर दोनो का इंटरेक्शन देख मुस्कुरा दिया। उसने राघव को अन्वी की गोद से ले लिया।


" आप दोनो जाकर चेंज कर लो। मै खाना लगा देता हूं। ", कहकर अमर किचन की तरफ बड गया।


अमर के जाते ही विक्रांत ने अन्वी.की.कमर मे बांह डाल उसे अपनी तरफ खींच लिया।

अन्वी हडबढा गई।  उसके चेहरे के भाव देख विक्रांत हँस दिया। चिढ कर अन्वी उसकी बांह पर चपत लगा दी। मगर उसके होठो पर ठहरी वो छोटी सी मुस्कान साफ साफ उसकी चिढ को नाटक बता रही थी। विक्रांत ने प्यार से अन्वी  के टेम्पल पर किस कर लिया। 





दूसरी तरफ किचन मे खाना गर्म करता हुआ अमर आज के दिन के बारे मे.सोचने लगा। और एक शख्स उसकी याद मे मानो ठहर गया हो। चारू ! वो बार बार आज हुई घटना को याद करता और खीझ जाता । 


" पागल लडकी ! ", अमर बुदबुदाया। 


" कौन पागल ? ", किचन डोर से टिक कर खडे होते हुए अन्वी बोल पडी । 

अमर ने ने अपनी आंखे बंद कर ली। 

अब भाभी बिना पुरी बात जाने उसका पीछा नही छोडेगी। 


" बोलो..बोलो ! कौन पागल लडकी। हम्म? ", अन्वी आंखे मटका कर बोली।


अमर पलटा , और अपने हाथ कमर पर रख अन्वी को घूरने लगा। 


" ओए! घूर क्या रहा है मेरी पत्नी को । ", विक्रांत क्रिब मे राघव को झुलाते हुए बोला। 


" आपकी पत्नी को पंचायती का बहुत शौक है । ", अमर चीढ कर बोला।


विक्रांत हँस दिया तो अन्वी उसे घूरने लगी। 

" बना लो मजाक मेरा । जब मै नही रहुंगी ना तब याद करोगे । ", अन्वी मुंह बना कर जाने लगी।


तभी विक्रांत आगे आया और उसने अन्वी को गले लगा लिया। अमर ने भी आकर अपना सर अन्वी के कंधे पर रख दिया।

" ऐसी बात ना करा करो भाभी ! आपके अलावा हम लोगो का कौन ही है । "


" तुम ऐसी बात करती हो तब ही गुस्सा आता है। क्यो नही रहोगी तुम...! " , विक्रांत हल्की तल्खी से बोला।


दोनो भाईयो के भाव देख अन्वी का दिल पसीज गया। वो मुस्कुरा दी।

" मै बस नखरा कर रही थी नालायकों। अब हटो! मेरा रघु मेरा इंतजार कर रहा है। "


दोनो को परे हटा अन्वी क्रिब के पास बैठ गई और वही राघव के साथ खेलने लगी। 




" अन्वी खाना कौन.." 

" वो तुम दोनो भाई देख लो। नाश्ता और दोपहर का मै बना चुकी हूं। अब रात का तुम दोनो देखो। ", विक्रांत का बात बीच मे ही काटती अन्वी बोली।


दोनो भाई एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे। 


" चल भाई..आज हम फिर बावर्ची है । तेरी भाभी तो नन्हे शैतान के साथ व्यस्त हो गई है। ", विक्रांत आंखे गोल घुमाकर फ्रिज से सामान निकालने लगा। 


अमर सोच मे पड गया।


" भाईया ! "

" हम्म! "

" क्या कभी मै भी आपके जैसे खुश रह पाउंगा ? " 


अमर के सवाल पर विक्रांत ने हैरत से उसे देखा। अन्वी तक चौंक गई। 

अमर फिकी हँसी हँस दिया।


" जो मैने किया उसके बाद तो मुझे जीने का ही अधिकार नही है। खुशियां तो दूर की बात है। "


" अम्मू ये क्या बोले जा रहा है। अभी एक थप्पड पडेगा...सारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी। " , अन्वी गुस्से से बोली।

" भाभी मै तो...."

" क्या भाभी ! " 


अमर चुप हो गया। 


विक्रांत से गहरी सांस भरी और आगे बडकर अमर का सर सहला दिया। 

" छोटा था तू । गलती सबसे होती है। बडी बात ये है कि अपनी गलती से सीख कौन सुधार करता है। और तूने तो स्वंय को संपूर्ण ही बदल दिया है। अब भी अगर तू निराशा से भरा रहेगा तो ये ठीक नही....!! "


अमर सर झुकाकर विक्रांत को सुनता रहा।



वो कहते है ना जलने की तडप असहनीय है संसार मे। किंतु यदि अग्नि मन मे लगी हो और वो भी पश्चाताप की तो उसमे जल रहा व्यक्ति सदा दया , करूणा के लिए तत्पर रहता है। किंतु करुणा के लिए स्वंय को योग्य नही मानता । वही हाल अमर का था । वो ऐसी आग मे जल रहा था जिसका निवारण केवल प्रेम की शांती थी । प्रेम भरी करुणा थी। किंतु इसके लिए व्यक्ति को स्वंय को प्रेम के योग्य और उसके लिए ह्रदय को तैयार भी तो रखना था। 






क्रमशः


जब तक हर भाग पर लगभग बीस रिव्यू नही आ जाते, मै ऐसे ही कहानी देर से दुंगी। पढने वाले हजार है और कमेंट बीस भी नही किए जाते। ऐसा ही चलता रहा तो सारी कहानिया हटाकर चली जाउंगी , फिर करना आलस! ये ठीक व्यवहार नही है आप पाठको का। 


अगला भाग = 20 रिव्यू