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उस दिन जो सवालों का सिलसिला शुरु हुआ तो वो कॉलेज के खत्म होने तक चला । अमर हर क्लास मे मुझ से सवाल करता और मै हर सवाल का सही सही जवाब दे देती । कभी कभी तो वो हैरान रह जाता था कि कैसे मै क्लास मे ध्यान ना देने के बावजूद भी सब सवालों के सही जवाब दे देती थी । अब तो मै क्लास मे पढाए जाने वाले टॉपिक को पहले से पढ कर जाती । सही से नोट्स भी बनाती जो मै कभी नही करती थी ।
मेरी दोस्त नेना...मेरी हर हरकत पर ध्यान देती थी इस वजह से उसे मेरे बिना बताए भी पता चल गया कि मै अमर सर से प्यार करने लगी हूं !
एक शाम हम दोनो यू ही सडक पर घूम रहे थे । हमारा रोज का था , शाम मे हॉस्टल के बाहर वॉक पर जाते थे । और जाए भी क्यो ना ! हॉस्टल कि लोकेशन ही कमाल कि थी । जंगल से लगते हुए था हमारा हॉस्टल ! बहुत मजा आता था हमे ।
" चल आजा जंगल मे चलते है । मेरा कुछ तस्वीरे लेने का मन हो रहा है! ", नेना अपना कैमरा सभांलते हुए बोली ।
मै जानती थी कि अगर मना करुंगी तो अकेली चली जाएगी । और उसे अकेले कही नही जाने दे सकती मै ! तो चल पडी ।
नेना हर तरफ कि तस्वीरे लेने लगी और मै ! मै नजारे को डायरी मे शब्दो के धागे मे पिरोकर सजाने लगी । यही तो करती आई हू मै ! एक सुकून बुनना सबके लिए....!
लेखन मेरा सुकून है और मेरी कहानिया दूसरो का । नेना के आलावा कोई नही जानता कि मै प्रतिलिपि नाम के एप पर कहानी लिखती हूं । मगर आज डायरी तर जज्बात कैद करना ज्यादा सही लगा ।
ये शाम जो अभी ढल रही है ...अगर इसे शब्दो मे ब्यान करना हो तो कहानियां कैसी रहेगी ? नही ! इन्हे तो कविताओं का साथ मिलना चाहिए। लड़कपन मे पडे इश्क कि तरह..!
उस इश्क कि तरह जो प्रेम बनना चाहता हो । मै भी तो यही चाहती हूं ना !
काफी देर तक हम वहां रहे । अब रात होने को आई थी तो मैने नैना से चलने को कहा तो दो तीन नजारे और कैद कर वो चल पड़ी ।
मै अपनी ही धुन मे थी जब किसी से टकरा गई। मैने अपने सर पर हाथ रख लिया क्योकि मेरा सर घूमने लगा था । ऐसा क्या पत्थर से टकरा गई मै जो इतना दर्द हो रहा है !
" कौन है ? देख के नही चल सकते ! ", मै सर झुकाए गुस्से से बोली ।
" मिस मै तो देख कर ही चल रहा हू लेकिन आप एक बार फिर आंखे खोल कर सो गई । और इस बार तो चलते हुए..
! "
सामने से जानी पहचानी मगर तीखे स्वर मे आवाज आई। मै चौंक गई। इस आवाज को तो पहचानती थी मै । ये अमर है !
मै झट से सर उठाकर देखा तो मेरी नजरे अमर कि नजरो से जा मिली । उसकी वो गहरी भूरी आंखे , मुझे सम्मोहित कर रही थी । मै डुबकी जा रही थी उन आंखो मे । तभी किसी ने मेरे सर पर हल्के से चपत लगाई । मेरा ध्यान टूटा तो देखा वो नैना थी । मैने नैना को घूरा तो उसने मुझे आंखे दिखा दी । जैसे बता रही हो कि अभी अभी मै क्या कर रही थी । मैने ना मे गर्दन हिला दी और अमर कि तरफ देखा ।
वो मुझे और नैना को ही बारी बारी से देख रहा था ।
" सॉरी ! ", मैने हडबडाकर कहा ।
" हम्म ! हॉस्टल मे क्यो नही हो तुम दोनो ? अंधेरा होने जा रहा है । " , अमर अपनी कडक आवाज मे बोला ।
हम दोनो हडबडा गई। नैना ने मुझे कोहनी मारी तो समझ आया कि जवाब मुझे ही देना होगा ।
" वो..हम वापस ही जा रहे है । शाम मे बाहर निकले थे सैर के लिए फिर बाद मे जंगल के अंदर चले गए। ज्यादा नही ! " , मै जल्दी से बोली क्योकि अमर मुझे घूरने लगा था ।
" ठीक है जाओ ! "
अमर ने कहा और हम दोनो वहा से नौ दो ग्यारह हो गई।
क्रमशः
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आप लोग कर सकते है व उंगलियो को जरा तकलीफ दे और अपने विचार कहानी को लेकर मुझे बताए। ये मुझे अपनी लेखनी मे सुधार करने मे सहायता करेगी। और मै ये भी जान पाउंगी की आप पाठक गण को मेरी कहानी पसंद आ भी रही है या नही ।