मिठास ज़िंदगी की
बीना के जाने के बाद आज मैं ख़ुद को बिलकुल तन्हा महसूस कर रहा हूँ | इतना लम्बा वक़्त साथ गुज़ारने के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे के इस कद्र आदी हो जाते हैं कि वे उनके बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं | हालाँकि हम दोनों को इस बात का एहसास था कि ज़िंदगी के इस पड़ाव पर हम दोनों में से किसी एक को अकेला ही रह जाना है लेकिन दिल इस हक़ीकत को आसानी से कुबूल करने के लिए तैयार नहीं है | अभी पिछले महीने ही हमने अपनी शादी के पचास बरस पूरे किए थे | आज के ज़माने में जब रिश्तों की उम्र हफ़्तों और महीनों तक सिमट कर रह गई, यह एक बड़ी उपलब्धि से कम नहीं थी |
एक बहुत ही लंबा और उतार-चढ़ाव भरा सफ़र था हमारा | उन दिनों लड़के-लड़की को शादी से पहले मिलना तो दूर, एक-दूसरे को देखने का मौका भी नसीब नहीं होता था | घर के बुज़ुर्ग ही घर-ख़ानदान देखकर रिश्ता तय कर देते थे | इसके लिए वे लड़का-लड़की की रजामंदी लेना भी ज़रुरी नहीं समझते थे | हमारी शादी भी ऐसे ही तय की गई थी | चूँकि बीना मेरे दादाजी के ख़ासम-ख़ास दोस्त की पोती थी इसलिए ज़्यादा तफ़तीश और सलाह-मशविरा की कोई गुंजाइश नहीं थी | दोनों तरफ़ के बुज़ुर्गों ने मिल-बैठकर फ़ैसला ले लिया और हो गई अपनी शादी | मुझे आज भी बखूबी याद है वह दिन जब बीना एक दुल्हन के रूप में हमारे परिवार में दाख़िल हुई थी | शादी के बाद जब मैंने पहली बार उसे देखा था तो दिल को बहुत ज़ोर का धक्का लगा था | मेरे सभी ख्व़ाब एक ही झटके में चकनाचूर हो गए थे | साँवले रंग और थोड़े भारी जिस्म की बीना किसी भी कोने से मेरी कल्पनाओं में बसी सपनों की रानी से मेल नहीं खाती थी | गाँव में पली-बढ़ी होने की वजह से वह ज़्यादातर भोजपुरी में ही बात करना पसंद करती थी | ऐसी औरत को पत्नी के रूप में यार-दोस्तों के बीच ले जाने में ही मुझे शर्म आती थी | उसके मुक़ाबले मैं एक गोरा-चिट्टा, ऊँचे कद का गठीला जवान था | मेरी ज़्यादातर ज़िंदगी शहरों में ही गुज़री थी और ऊपर से अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ा होने की वजह से मेरे ज़ेहन में गाँव के लोगों के बनिस्पत एक श्रेष्ठता का भाव था | ऊपर से मैं सरकारी महकमे में एक अच्छे-ख़ासे ओहदे पर काम कर रहा था | मुझे यह सोच-सोच कर अपने परिवारवालों पर गुस्सा आ रहा था कि इतना सब कुछ होने के बावजूद भी उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे मुझे ऐसी साँवली और मोटी लड़की के पल्ले बाँध दिया था | ऐसा फ़ैसला लेते वक़्त उन्होंने एक पल के लिए भी मेरी इच्छाओं और खुशियों के बारे में विचार नहीं किया था | जितना भी मैं ख़ुद को समझाने की कोशिश करता उतना ही ज़ेहन में निराशा भरती जाती थी | इस वजह से मैं मन ही मन बीना से चिढ़ने लगा था । जितना भी वह मेरे क़रीब आने की कोशिश करती उतना ही मैँ उससे खिंचा-खिंचा सा रहता | पिताजी के सामने तो मुँह खोलने की हिम्मत नहीं थी मेरी | हाँ, अम्मा के सामने मैंने खुल कर अपना गुस्सा ज़रूर ज़ाहिर किया था | मेरी बात सुनकर अम्मा प्यार से समझातीं “बेटा, क्या इंसान की पहचान सिर्फ़ उसके रंग-रूप से ही होती है ? क्या उसके और गुणों की तुम्हारी निगाह में कोई अहमियत नहीं है ? यह सब सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि इंसान की सूरत ही सबसे पहले नज़र आती है, जबकि सीरत को देखने के लिए सब्र चाहिए | शादी जैसे लम्बे चलने वाले रिश्तों में इंसान की सीरत कहीं ज़्यादा असरदार होती है | सूरत तो वक़्त के साथ बदल जाती है, लेकिन सीरत वैसी की वैसी ही बनी रहती है | इसलिए बेटा थोड़ा धीरज रख | वक़्त के साथ सब नीक लागे | बहू एक भरे-पूरे परिवार से आई है | घर-गृहस्थी के कामों में माहिर है | मेहनती और ज़िम्मेदार है | मायके में घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ उठाती रही है | आहिस्ता-आहिस्ता वह तुझे ज़रूर अच्छी लगने लगेगी |” उस वक़्त अम्मा की समझाइश का मेरे ज़ेहन पर कुछ ख़ास असर नहीं हुआ था |
शादी के दस-पंद्रह दिनों बाद हम दोनों कानपुर चले गए थे, जहाँ मैं उस वक़्त कार्यरत था | नई जगह जाने के बावजूद भी बीना के प्रति मेरा बर्ताव जस का तस बना रहा | मुझे अपनी हालत उस खच्चर जैसी जान पड़ती थी जो न चाहते हुए भी मालिक द्वारा लादे गए बोझ को मजबूरन ढोए चले जाता है | ज़ेहन में जमा हो रही निराशा और कुंठा का असर हमारी शादी-शुदा ज़िंदगी पर पड़ना लाज़मी था | उन दिनों हमारे बीच बस ज़रूरी बातचीत ही होती थी | किसी न किसी छोटी सी बात पर मेरा गुस्सा अक्सर बीना पर फूट पड़ता था | हमेशा हँसती-मुस्कुराने रहने वाली बीना अब डरी-सहमी और ख़ामोश सी दिखाई पड़ती थी | शायद उसे भी हमेशा डर लगा रहता होगा कि न जाने कौन सी बात मुझे बुरी लग जाए |
करीब पाँच-छह महीने ऐसे ही तनातनी के माहौल में गुज़र गए | ऐसे ही माहौल में एक रात मैंने मन ही मन तय कर लिया कि शादी के इस मुर्दा रिश्ते को अब और नहीं ढोऊँगा | जल्द ही बीना से तलाक लेकर अपनी पसंद की किसी अच्छी लड़की के साथ एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करूँगा | उसी दिमाग़ी हालत में मैंने अम्मा को एक लंबा-चौड़ा ख़त लिख कर पोस्ट करने के लिए दफ़्तर के बैग में रख लिया | उस ख़त में मैंने अपने जज़्बातों को तल्ख़ ज़ुबान में तफ़सील से बयाँ करते हुए अपने फ़ैसले से अवगत कराया था |
रात में देर से सोने की वजह से दूसरे दिन काफ़ी देर से आँख खुली | किसी तरह जल्दी-जल्दी ज़रूरी काम निपटाकर समय पर दफ़्तर जाने के लिए तैयार हो गया | मेरी दिमाग़ी हालत से बेख़बर बीना अपनी रोज़ की आदत के मुताबिक़ मुझे खाने का डिब्बा थमाकर भीतर चली गई थी | दफ़्तर के लिए निकलते वक़्त मैंने ध्यान से रात को लिखा हुआ अपने ख़त साथ ले लिया था जिससे कि उसे रास्ते में पड़ने वाले डाकखाने से भेज सकूँ | लेकिन विधाता को शायद कुछ और ही मंज़ूर था और ज़िंदगी की एक बड़ी घटना आगे मेरा इंतज़ार कर रही थी | दफ़्तर के रास्ते स्कूटर से जाते वक़्त मैं अपने ही ख़्यालों में गुम था | दिमाग में घमासान अंतर्द्वंद चल रहा था | मेरा ख़त पाकर तो परिवार में कोहराम मच जाएगा | अभी छह महीने पहले ही सभी कितने चाव से नई बहू घर लेकर आए थे | अम्मा का तो रो-रोकर बुरा हाल हो जाएगा | हमारे परिवार में तलाक लेना तो दूर आज तक किसी ने पुलिस-थाने और कोर्ट-कचहरी के भीतर पाँव भी नहीं रखा है | आज उसी परिवार का लड़का शादी के महज़ छह महीने बाद ही अपनी बीवी को तलाक देने जा रहा है | अम्मा-बाबूजी किस तरह से बीना के माँ-पिताजी से नज़रें मिला पाएँगे । जब यह ख़बर बिरादरी और मोहल्ले में फैलेगी तो लोग तरह-तरह की बातें करेंगे | जितने मुँह उतनी बातें | परिवार वालों का तो घर से निकलना भी मुश्किल हो जाएगा । इंसान किसी तरह दुनिया से तो लड़ सकता है लेकिन ख़ुद की नज़रों से गिरकर जी नहीं सकता है । सारे परिवार के लिए यह ऐसी ही एक घड़ी होगी । बेख्याली की ऐसी दशा में मेरी आँखें तो ज़रूर सड़क पर थीं लेकिन दिमाग कहीं और उलझा हुआ था | कुछ देर के लिए मेरी आँखों और दिमाग का सम्बंध टूट गया था जबकि स्कूटर अपनी रफ़्तार से सीधे चला जा रहा था | अचानक गाड़ी के तेज़ हार्न की आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी | मेरा स्कूटर सामने से आ रही एक तेज़ रफ़्तार कार से टकराने के बहुत ही क़रीब था | घबराहट में मैंने ब्रेक लगाने की भरसक कोशिश की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और मेरा स्कूटर तेज़ रफ़्तार से जाकर कार से भिड़ गया जिसकी वजह से मैं उछल कर करीब के खम्भे से जाकर टकरा गया | टकराव के आघात और सदमे की वजह से मैं घटनास्थल पर ही बेहोश हो कर गिर गया था |
जब मेरी आँख खुली तो मैंने ख़ुद को अस्पताल के एक बिस्तर पर पड़ा पाया | आँखें खुलते ही मेरी नज़र सबसे पहले बीना पर पड़ी जो करीब ही रखे स्टूल पर बैठी हुई थी | वह काफ़ी फ़िक्रमंद नज़र आ रही थी | मुझे होश में आया देख उसने पूछा, “कैसे हैं आप ?” बेहद तकलीफ़ में होने की वजह से मैं बोल पाने की हालत में नहीं था | किसी तरह सिर्फ़ पलकें झपका कर इतना ही इशारा कर पाया कि ठीक हूँ । जवाब में बीना ने कहा, अभी आप आराम कीजिए । सब ठीक हो जाएगा ।“ बीना ने फ़ौरन नर्स को आवाज़ देकर मेरे होश में आने की इत्तिला दी | थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने आकर मेरा मुआयना किया और फिर बीना को कुछ समझाइश देकर चले गए | डॉक्टर के साथ आई नर्स ने बीना को ज़रूरी दवाओं लाने के लिए एक पर्ची थमा दी | बीना थोड़ी देर बाद आने का कहकर दवाएँ लेने चली गई | शायद वह अकेले ही सब कुछ सँभाल रही थी | उसका थका हुआ चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह रात भर सोई नहीं थी | थोड़ी देर बाद वह दवाएँ लेकर वापिस आई और स्टूल खींचकर पलंग के क़रीब ही बैठ गई | बीच-बीच में वह मेरा हाल-चाल पूछती जा रही थी | उसकी बातों से पता चला कि कुछ अंजान लोगों द्वारा मुझे बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया था | मेरे बैग से घर का पता लेकर कुछ भले लोगों ने घर पर ख़बर की थी | हादसे की ख़बर सुनते ही बीना दौड़ती-भागती हुई अस्पताल पहुँची थी | उस वक़्त मेरी हालत बहुत ही चिंताजनक थी | हादसे में हाथ, कंधे और पैर में फ्रैक्चर हुए थे | साथ ही काफ़ी खून भी बह गया था | कल रात भर मुझे खून चढ़ाया गया था | डॉक्टर ने कल सुबह ऑपरेशन के लिए कहा है | बीना ने मेरे और अपने घर वालों को भी हादसे की ख़बर कर दी थी | मुझे हैरत हो रही थी कि इतना सब कुछ वह अकेले कैसे सँभाल पा रही थी | ऊपर से अस्पताल के महँगे खर्च के लिए रुपयों का इंतज़ाम कैसे हो पाया था क्योंकि मैं तो बीना को रोज़ाना सुबह दिन के ज़रूरी खर्च के लिए थोड़े से रुपए ही देकर जाता था | उस वक़्त तो उसने कुछ नहीं बताया लेकिन बाद में जाकर राज़ खुला कि उस वक़्त बीना ने अपने ज़ेवर गिरवी रख कर इलाज के लिए ज़रूरी रकम का बंदोबस्त किया था |
दूसरे दिन अम्मा-बाबूजी और बीना के माँ-पिताजी भी वहाँ आ गए थे । सभी करीबी रिश्तेदारों को वहाँ पाकर मुझे काफ़ी हिम्मत महसूस हो रही थी | अगले दिन सुबह मेरा एक लम्बा ऑपरेशन हुआ | कुछ दिनों बाद सेहत में सुधार होने पर मेरी अस्पताल से छुट्टी कर दी गई | डॉक्टर के मुताबिक़ मुझे अच्छे से चलने लायक होने में डेढ़ से दो महीने का वक़्त लगना था | वह मेरी ज़िंदगी का बहुत ही मुश्किल दौर था जिसके दौरान मैं ज़्यादातर वक़्त पलंग पर ही रहता था | उन दिनों अपने हर छोटे से छोटे काम के लिए मैं पूरी तरह से बीना पर निर्भर था | उन दो महीनों के दौरान घर-परिवार की सारी ज़िम्मेदारियाँ बीना के कंधों पर थी | मेरी देखभाल के अलावा उसके ज़िम्मे सैकड़ों अलग दूसरे काम रहते थे – अम्मा-बाबूजी की देख-भाल के साथ खाना बनाना, कपड़े धोना, झाड़ू-पोंछा, बाज़ार से खरीदी आदि | मेरी वजह से वह कई मर्तबा रात में भी ठीक से सो भी नहीं पाती थी लेकिन दूसरे दिन सुबह ठीक वक़्त पर उठकर फिर मशीन की तरह काम पर लग जाती थी | इतनी थकी होने के बावजूद भी उसके माथे पर कभी शिकन नहीं दिखाई देती थी | अम्मा तो उसकी तारीफें करते नहीं थकती थीं | उसकी अथक ख़िदमत की बदौलत ही मैं बहुत जल्द चलने लायक हो पाया था |
ऐसा कहा जाता है कि मुश्किल हालात इंसान को बहुत कुछ सिखाते हैं | इंसान की असली परख इसी वक़्त होती है | मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था | उस दुश्वारी भरे दौर का एक ख़ुशनुमा पहलू यह था कि इस दौरान मुझे अपने भीतर झाँककर देखने और ख़ुद से गुफ़्तगू करने का अच्छा मौक़ा मिला था | इस दौरान मैंने बीना का एक अलग ही रूप देखा था – एक ऐसी औरत का जो न केवल जज़्बाती, रहमदिल और मेहनती थी बल्कि भीतर से भी बहुत मज़बूत थी । अपनी इसी अंदरूनी ताक़त के बदौलत ही वह उन मुश्किल हालात का इतने आत्मविश्वास से मुक़ाबला कर सकी थी । उस वक़्त अगर उसकी जगह मैं होता तो शायद परिस्थितियों के आगे आत्म-समर्पण कर दिया होता | मामूली रंग और कद-काठी की बीना के भीतर छिपे हुए इस ग़ैरमामूली इंसान को मैंने पहले कभी देखने की कोशिश ही नहीं की थी | उस वक़्त मुझे अम्मा की कही बातें समझ में आ रही थीं कि इंसान की असली सुन्दरता उसकी सीरत में है न कि उसकी जिस्मानी खूबसूरती में जो वक़्त के साथ बदलती रहती है | बीना जैसे हमसफ़र का मिलना तो मेरे लिए एक खुशकिस्मती की बात थी लेकिन मैं ख़ुद को किसी भी सूरत में उसके लायक नहीं पाता था | उसकी शख्सियत के सामने मेरा झूठा गुरूर पिघल कर बह गया था और मैं खुद को उसके आगे बौना महसूस कर रहा था | मुझे ख़ुद पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि किस तरह से मैंने बीना के साथ न केवल बहुत ही बुरा बर्ताव किया था बल्कि उसके साथ रिश्ता तोड़ने की हद तक पहुँच गया था | यह तो उसका बड़प्पन है कि मेरे द्वारा इतनी प्रताड़ित होने के बावजूद भी वह मेरे और परिवार की इतनी शिद्दत से ख़िदमत कर रही थी | ज़िंदगी में पहली दफ़ा वह मुझे बेहद करीब जान पड़ रही थी |
मेरे ज़ेहन में पश्चात्ताप का लावा बढ़ता जा रहा था | एक दिन फ़ुर्सत के लम्हों में जब हम दोनों सुबह आँगन में बैठे चाय पी रहे तो कई दिनों से जमा यह लावा अचानक आँसुओं की शक्ल में फूट पड़ा | मुझे इस तरह से रोते देख बीना हैरान रह गई थी | आँसुओं की वजह से मेरे अल्फाज़ हलक से बाहर नहीं निकल पा रहे थे | थोड़ी देर बाद मैंने बीना का हाथ पकड़ कर किसी तरह रूँधे गले से कहा, ”आज मैं सच्चे दिल से तुमसे माफ़ी माँगता हूँ | मैंने तुम्हारे साथ बहुत ही बुरा बर्ताव किया है | मैं इंसान भी कहलाने लायक नहीं हूँ | इसीलिए भगवान ने मुझे इतनी बड़ी सज़ा दी है | तुम जो भी सज़ा दोगी वह मुझे मंज़ूर होगी |” जवाब में बीना बोली, “रमेश बाबू, सज़ा तो ख़ैर आपको मिलेगी ही लेकिन पहले यह बताइये कि मुझसे तलाक लेने के बारे में आपका फ़ैसला अभी भी कायम है कि नहीं ? बीना की बात सुनकर मैं अवाक् रह गया था | मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे किसी ने भरे बाज़ार मेरे कपड़े उतार दिए हों | समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ जाकर अपना मुँह छुपाऊँ | ज़ाहिर था अम्मा को लिखा गया मेरा ख़त जो मैंने दफ़्तर के बैग में रखा था वह बीना तक पहुँच गया था | यह तो उसका बड़प्पन था कि इतना सब कुछ जानने के बावजूद भी उसने इस बात की किसी को हवा भी नहीं लगने दी और वह पिछले दो महीनों से सामान्य भाव से मेरी शिद्दत से ख़िदमत किए जा रही थी | यह सब सोचकर मैं आत्म-ग्लानि से गड़े जा रहा था | अब मुझमें बीना से नज़रें मिलाने की भी हिम्मत नहीं बची थी | किसी तरह साहस बटोरकर बस इतना ही कह पाया, “मैं सच्चे दिल से कुबूल करता हूँ कि यह मेरी बहुत बड़ी गलती थी | उस वक़्त मैं बहुत बड़ी गलतफ़हमी में जी रहा था | मैंने कभी भी तुम्हारे भीतर छुपी हुई खूबसूरत बीना को देखने की कोशिश नहीं की । आज मुझे एहसास हो गया है कि इंसान की असल पहचान केवल उसकी शक्लो-सूरत से नहीं की जा सकती है । मेरी गलतियाँ किसी भी माफ़ी के काबिल नहीं हैं | अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम मुझे अपने लायक समझती हो या नहीं |” मेरी बात सुनकर बीना ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह सच है कि आपकी गलतियाँ माफ़ी के काबिल नहीं हैं और आपकी सख्त सज़ा तो बनती है जिसे देखकर दूसरे भी सबक लें | आपकी जो सज़ा मुकर्रर हुई है उसके मुताबिक़ आपकी तलाक की अर्ज़ी ख़ारिज की जाती है और आपको ताउम्र जेल में इसी काली और मोटी औरत के साथ ही सड़ना पड़ेगा | खबरदार, जो कभी जेल तोड़ कर भागने की कोशिश की हो |” बीना के नाटकीय ढंग से बोले गए इस डायलॉग से अचानक हम दोनों की हँसी फूट गई और हम गले लगकर हँसते रहे | यह हँसी कब आँसुओं में तब्दील हो गई एहसास ही नहीं हुआ | हमारे दिल में पनपी ख़ामोश मुहब्बत अब आँसुओं की शक्ल में ज़ाहिर हो रही थी |
हमारे बीच की यही ख़ामोश मुहब्बत ही पचास-बरस लम्बे ख़ुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी की नींव थी | आज भले ही वह जिस्मानी तौर पर मेरे साथ नहीं है लेकिन उसके साथ गुज़ारे गए खूबसूरत दिनों की महक आज भी ज़ेहन में ताज़ा है | ज़िंदगी के अपने तजुर्बे की बुनियाद पर आज मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ “All that is gold does not glitter.”