My Dear Professor - 17 in Hindi Love Stories by Vartikareena books and stories PDF | माई डियर प्रोफेसर - भाग 17

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माई डियर प्रोफेसर - भाग 17












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चारू ने सर उठाकर देखा तो अमर होंठ भींच उसे ही देख रहा था। उसकी उंगलिया पेंट पर कसी हुई थी । आंखे हैरानी और चिढ के मिले जुले भाव से सिकुड गई थी।


चारू की सांसे तेज हो गई। वो अमर को ऐसे देख रही थी मानो यमराज सामने खडा हो । उसका दिल जोरो से धड़कने लगा। आँखे डर से और शर्म के मीले जुले भाव से फैल गई।  दिसंबर की सर्दी मे भी , चारू के पसीने छुट गए।  उसकी पुतलिया घूमी....और अगले ही पल—

धम्म!!!!!


अमर की आंखे फैल गई।  उस जगह पर मौजूद हर एक इंसान आश्चर्य से भर गया। चारू जमीन पर बेहोश होकर गिर गई थी।






कुछ समय बाद 


नव्या , शशांक,  अमोघ और नैना...चारो मेडिकल रूम मे बैठे थे। और लगातार अपने सामने बिस्तर पर लेटी चारू को घूर रहे थे।


चारू....जिसने इस समय अपना चेहरा तकिए मे घुसा रखा था। और बिस्तर पर रोल हो जा रही थी। 


" आप शांत  बैठ जाइए नही तो गिर जाएंगी ! " , अमोघ गहरी सांस छोडते हुए बोला।


तभी नैनी उठी , चारू के बेड के पास आकर खडी हो गई।.सब उसे देखने लगे । नैना ने चारू को घूरा और भंवे उचका दी।


" तुम अमर सर को पसंद करती हो ? "


जैसे ही नैना ने ये सवाल किया। कमरे मे सन्नाटा छा गया। सबके सब आंख बडी किए नैना को घूरने लगे। 


" आप ये..क्या बोल रही है नैना ! ", अमोघ असमंजस मे बोला।


नैना ने एक नजर उसे देखा तो वो शांत हो गया।


ये देखकर शशांक के होंठो पर तिरछी मुस्कान आ गई।  

बंदा पुरा गिर चुका है...प्यार मे ! 


नैना ने एक बार फिर चकरू से वही सवाल किया। चारू का पूरा चेहरा लाल पड गया और कान गर्म हो गए।  उसने अपनी बांह चेहरे पर रख चेहरा ढक लिया। 


नव्या की आंखे हैरानी से फैल गई।  वो चारू के पास आती हुई बोली , " मतलब तुम..सच मे ! "


नव्या ने हवा मे हाथ उचका दिए। 

" बस अब यही बाकी रह गया था। तुम्हारे अंदर दिमाग भी है कि नही । टीचर से कौन...यार चारू!!"


नव्या परेशानी और चिढ के मिले जुले भाव से बोली। चारू उठकर पालथी मार कर बैठ गई। 

उसने सर झुका लिया।

" मुझे..कभी समझ ही नही आया कि..ये कैसे..और कब हो गया । " 


नव्या ने ना मे सर हिला दिया।

" तुम्हे पता है इसके कितने हार्श कॉन्शीक्य्शिंश हो सकती है ! चारू अगर अमर सर को पता चल गया दैन ही कैन मेक यू लीव द युनिवर्सिटी । " 


" नव्या स्टाप स्केरिंग हर ! उसने कोई पाप नही किया है। ", शशांक हल्की अवाज मे बोला।

नव्या ने घूम कर उसे देखा ।


" ऐसे मत देखो ! उसने थोडी ना सोच कर सर से प्यार किया। प्यार कोई इच्छा से थोडी करता है। ये तो हो जाता है। इस मे चारू को डांटने का कोई मतलब नही। " , शशांक एक कदम नव्या की तरफ बडते हुए बोला।




" यू आर नोट अंडर स्टेंडिंग इट! दिस इज इनफाक्चेशन।  और चारू तो है ही मुर्ख । पक्का गड़बड़ कर देगी । ", नैना बोली।


चारू ने नैना को ऐसे देखा मानो किसी सपाए मिशन के अंदर नैना ने अंतिम समय पर उसके साथ घात कर दिया हो।


" दुश्मन ना करे दोस्त ने वो काम किया है , बेज्जती मेरी दोस्त ने बडा घोर किया है । ", चारू ने मन ही मन सोचा।


तभी अमोघ नैना के हल्का सा करीब आया।


" आप ऐसे मत बोलिए उन्हे । " , वो बोला।


चारू के दिल ने एक चैन की सांस ली। 

चलो कोई तो उसके पक्ष मे बोल रहा है।


" तूझे तो मेने रावन सोचा था....पर तू तो..राम निकला रे अमोघवा!!!" , चारू भाव विभोर होकर मन मे सोची । 


तभी अमोघ बोल पडा , " माना की उनकी हरकते चप्पल से कुटे जाने वाली है लेकिन प्रेम पर किसका जोर । कोई बल पूर्वक थोडी प्रेम करता है। " 


चारू का दिल झटके से चूर हो गया।

वो अमोघ को घूरने लगी।


" राम नही...किडमाडा है तू..किडमाडा! मेघराज का किडमाडा।  गंदे दांत वाला, बदबूदार ! ", चारू मन ही मन अमोघ को गलियाने लगी। 


तभी उसके सर प चपत आकर लगी। 

" आऊं...!!!", चारू ने अपना सर सहलाते हुए नैना को देखा जो अब कमर पर हाथ रखे खडी थी। 


" मन ही मन सबको गाली देना बंद करो । और अब से अमर सर के सामने कोई पगलैठी मत करने लग जाना । नही तो तुमको छत से धक्का दे दुंगी। " , नैना ने आंखे नचाते हुए कहा।


चारू ने मुंह बना लिया।


" बडे ही हिंसक दोस्त है मेरे ! "


" हम तुम्हारे दोस्त नही है । ", तभी नव्या अचानक से बोली।


" होओओओओ.....!!!!!! "


चारू के रिएक्शन पर नव्या खिलखिला कर हँस पडी । नव्या अधिकतर हँसती नही थी। लेकिन जब भी हँसती तो उसकी नाक लाल हो जाती थी और आंखे बंद ! 


शशांक एक टक नव्या को निहारने लगा। एक अजीब सी गर्माहट उसे अपने सीने मे घर करती महसूस हो रही थी। धड़कने तेज हो गई थी। शशांक को ऐसा लगा कि इस खिलखिलाहट के लिए वो अपने प्राण तक दे सकता है। 


ये क्या हो.रहा था उसे ! 


उसके पास जवाब नही था । नव्या को देखना भी इस समय उसे पाप लग रहा था तो शशांक ने अपनी आंखे बंद कर ली । और उसकी हँसी को महसूस करने लगा। ये हँसी तक पूजनीय महसूस होती थी। और वो इसकी अराधना करना चाहता था। 



भाव नवीन थे इस साधक के हृदय के ,

तेरी खिलखिलाहट साधना बन सामने आ खडी हुई ।

अब तुझे देखना भी पाप लगता है ,

भला साधना को भी निहारा जाता है ! 

समझ से परे इस भावना को ये 

साधक प्रणाम करता है ।

और साधना से उसकी अराधना ,

करने का अधिकार मांगता है ! 





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रात का समय था। बाथरूम से बाल झाड़ते हुए अमर बाहर आया । उसने एक नजर बिस्तर पर सो रहे उसके एक साल के भतीजे पर डाली , जोकि अपने छोटे छोटे हाथ पैर बिस्तर पर फैलाए , मुंह खोल कर सो रहा था। अमर के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान आ गई।  उसने अपने गले मे तोलिया डाला । और भतीजे को अच्छे से चादर ओढ़ा दी। इसके बाद वो बाल्कनी मे आकर खडा हो गया। 


उसने एक नीली टी शर्ट और ब्लेक ट्राउजर पहन रखा था। ठंड के कारण ओंस पडने लगी थी। अमर ने एक नजर सामने खडे जंगल पर डाली। 


मेघराज के फेफड़े थे ये जंगल और काफी कम रह गए थे। उसकी भूरी आंखे जंगल को तरसी निगाह से देख रही थी। मानो वो क्षमा मांग रही हो जंगल से उसके ऊपर होने वाले खनन के लिए।  


अभी वो सोच ही रहा था कि कमरे से उसके भतीजे की कुनमूनाने की आवाज आई । उसने तोलिया रेलिंग पर डाला और तेजी से कमरे मे चला गया। 


उसने अपने भतीजे को गोद मे उठा लिया। वो.अपनी छोटी आंखो को बडा किए अमर को देख रहा था। उसका मुंह खुला था और वो अपनी जीभ अंदर घूमा रहा था। उसने अपने हाथ ऊपर उठाए और खिलखिला कर हँस दिया। 

मानो अपने चाचा को देख खुश हो रहा हो ।.


अमर भी उसके साथ हँस दिया।


" मेरे राघव..उठ गए नन्हे धनुष धारी। ", अमर अपने भतीजे यानी राघव का सर चूमते हुए बोला। 


वो उसे लिए एक बार फिर बाल्कनी मे आ गया।


" अन्वी भाभा यानी आपकी मम्मी इस समय एन जी ओ मे है। और उनकी एक मिटिंग है आज जोकि भाभी और आपके पापा ..हमारे भाई विक्रम के साथ अटेंड करने वाली है। "


अमर ने राघव को देखा जोकि पूरे ध्यान से उसे सुन रहा था।

अमर ने जंगल को देखा और अब उसके चेहरे पर गंभीर भाव आ गए थे।

" ये जो जंगल है ना राघव...इनका उपकार है मानवजाति पर। अगर ये खत्म हो गए तो धरती का नाश.हो जाएगा । और ये विनाश मानव स्वंय कर रहा है। मेघराज के ये जंगल हमारे पूर्वज की विरासत है। और इस विरासत को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य।  जो मै पुरी तरह से निभाउंगा। और मेरे और भाई के बाद..आप निभाएंगे। "


" ये जो मिटिंग है ना आपके मम्मी पापा की वो मेघराज के राजा और अंदर प्राइवेट इंडस्ट्रीज के ओनर्स के बीच है। राज परिवार खनन पर , जंगल की कटाई पर कोई रोक नही लगा रहा और प्राइवेट कम्पनीज इसका लाभ उठा रही है। और इसे रोकना हमारा काम है। "


तभी अमर को अपने जबडे को पास राघव की उंगलिया हल्के से महसूस हुई।  उसने सर झुकाया तो राघव मुस्कुराते हुए उसका चेहरा पकडने की कोशिश कर.रहा था। अमर.मुस्कुरा दिया।


" डोंट वरी ! चाचू सब ठीक कर देंगे । " 





क्रमशः


बहुत दिनो से सोच रही थी लेकिन अब कहना पड रहा है। आप लोग कमेंट नही करते , रेटिंग नही करते । ये कोई तरीका नही है। फ्री मे सब पढ रहे हो कम से कम कमेंट तो कर दिया करो। आप लोगो को जरा भी नही ध्यान आता की लेखक को उहकी महनत का फल मिलना चाहिए।  पैसे तो मिलते नही...कम से कम कमेंट सी कर दो। स्टोरी पर असर पढता है। इतना क्या आलस करते हो पाठको ! 

मुझे इस भाग पर रेटिंग और कमेंट चाहिए।  कम से कम बीस कमेंट । पढने वाले बहुत है तो इतने कमेंट कम ही मांग रही हूं ।