Antarnihit - 40 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 40

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अन्तर्निहित - 40

[40]

अभीतक शांति से सब कुछ सुन रहे येला और वत्सर के अधिवक्ता श्री हरीश ने खड़े होकर कहा, “चलो, एक क्षण के लिए मेरे मित्र कपिलजी के कुतर्क को भी स्वीकार लेते हैं। तो ...”

“देखो महाशय, हरीशजी ने मेरी बात को स्वीकार लिया है। अर्थात वत्सर ने हत्या की है यह सिद्ध हो जाता है। इस अभियोग में अब और कुछ शेष रहा ही नहीं।” कपिल ने उत्साह और उत्तेजना प्रकट की। 

“श्रीमान कपिल जी, शब्दों को पूरा सुनने का अभ्यास छूट गया है आपका। होता है। इस बढ़ी हुई आयु में अनेकों के साथ ऐसा होता है। यह सहज है।” हरीश ने कहा। 

“तो क्या अब मैं बहरा हो गया हूँ? वृद्ध हो गया हूँ? महाशय, मेरे मित्र मेरी शारीरिक क्षमता पर प्रहार कर रहे हैं।”

“महोदय, शारीरिक नहीं मैं तो मानसिक क्षमता की बात कर रहा था।”

“वह कैसे?”

“क्यों कि आपने मेरी बात यदि पूरी सुनी होती तो आप ऐसा कुतर्क नहीं करते।”

“मैंने कौन सी बात नहीं सुनी?”

“मैंने कहा था कि चलो एक क्षण के लिए आपकी बात स्वीकार कर लेते हैं। इन शब्दों का अर्थ तो आप भली भांति जानते ही होंगे, महोदय?”

“ठीक है, ठीक है।”

“तो मैं अपनी बात रखूं, महोदय?” कपिल ने मुक सम्मति दी। 

“यदि मेरे मित्र का तर्क मान लेते हैं कि वत्सर ने हत्या की, येला ने उसकी सहायता की और इस के लिए वत्सर ने वह शिल्प येला को दे दिया। तो कपिल जी यह बता दो कि मीरा की हत्या कब हुई?”

“इसके विषय में निश्चित रूप से कुछ भी ज्ञात नहीं है।”

“यह तो बता सकते हो कि वह शिल्प कब रचा गया?”

“प्राय: आठ वर्ष पूर्व, ऐसा इन सबका कहना है। हो सकता है कि यह बात असत्य हो।”

“सत्य मैं बताता हु, अभी। पूरे प्रमाण के साथ।”

“हरीश महोदय, आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं? कैसे?” न्यायाधीश ने पूछा। 

“मैं शिल्पकार सपन से प्रश्न पूछना चाहता हूँ।”

“कौन है सपन? उसे प्रस्तुत किया जाए।”

सपन प्रस्तुत हुआ। 

“सपन जी आप एक शिल्पकार हैं?”

“जी, हाँ।”

“आप वत्सर को जानते हैं?”

“हाँ।”

“कब से?”

“प्राय: आठ वर्षों से।”

“कैसे जानते हो?”

“आठ वर्ष पूर्व शिल्प मेले में जब वत्सर ने वह शिल्प प्रस्तुत किया था। उस समय मेरी भेंट वत्सर से हुई थी।”

“अर्थात शिल्प की आयु आठ वर्ष ही है।”

“जी महोदय।”

“ठीक है। आप जा सकते हैं।” सपन अपने स्थान पर बैठ गया। 

“श्रीमान कपिल जी, यह तो आपके ही साक्षी हैं। क्या वह असत्य कह रहे हैं?”

“नहीं।”

“तो शिल्प आठ वर्ष प्राचीन है। मीरा की मृत्यु तिथि इतनी प्राचीन नहीं है। हैं न कपिल जी?”

कपिल ने कोई उत्तर नहीं दिया। 

“वत्सर वह शिल्प येला को आठ वर्ष पूर्व ही दे चुका है यह सिद्ध होता है।” 

“इस बात का इस अभियोग से क्या संबंध है, श्रीमान हरीश जी?”

“संबंध है, कपिल जी। महाशय, अब तो मुझे प्रतीत हो रहा है कि मेरे मित्र कपिल जी अपनी स्मरण शक्ति भी खो चुके हैं।”

“नहीं, मुझे सब स्मरण है।”

“तो यह भी स्मरण होगा कि अभी अभी आपने यह कहा था कि वत्सर ने येला को वह शिल्प मीरा की मृत्यु छिपाने के लिए दिया था। शिल्प येला के पास आठ वर्षों से अधिक समय से है। मीरा की मृत्यु तिथि इतनी प्राचीन नहीं है। अर्थात येला और वत्सर के मध्य ऐसा कोई अनुबंध नहीं हुआ था जैसा कपिल जी का तर्क है।”

“महोदय, हरीश जी के इस तर्क का कोई उत्तर देना चाहोगे?” न्यायाधीश ने कपिल से पूछा। 

“जी नहीं, महाशय।”

“तो यह सिद्ध होता है कि मीरा की हत्या वत्सर ने की है ऐसा कोई स्पष्ट और ठोस प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है। तो क्या इस अभियोग को सम्पन्न मान लें? या कुछ और तर्क देना चाहोंगे श्रीमान कपिल महोदय?”

“हम कुछ अन्य प्रमाण प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। हमें कुछ समय दिया जाए।”

“कितना समय?”

“एक सप्ताह का।”

“हरीश महोदय, विपक्षी अधिवक्ता को समय दिया जाए तो आपको कोई आपत्ति है क्या?”

“केवल इतनी आपत्ति है कि सात दिन का लंबा समय न दिया जाए।”

“सात दिनों के लिए क्यों आपत्ति है?”

“एक, इतने समय में निराधार प्रमाण उत्पन्न करने में यह सब सक्षम हैं। दूसरा, बिना कारण वत्सर को इतने दिनों तक मानसिक प्रताड़ना होगी। अत: शीघ्र से शीघ्र इसे सम्पन्न किया जाए।”

“हरीश जी, आप सरकारी तंत्र का उपहास एवं अपमान कर रहे हो।”

“मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, महाशय।”

“कुछ भी बोलने से पूर्व उन शब्दों के अर्थों को समझ लो पश्चात ही बोलो।”

“जी महाशय।” हरीश ने कहा। 

“तीन दिन का समय दिया जाता है। कपिल जी, स्मरण रहे कि जो भी प्रमाण प्रस्तुत हो वह वास्तविक हो।”

“जी पूरा प्रयास करेंगे।”

“तीन दिन के पश्चात पुन: इस पर कार्यवाही होगी।”