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न्यायालय से ही येला को वीडियो कॉल किया गया। येला ने उसे लिया।
“येला जी, फिरोजपुर न्यायालय के न्यायाधीश आपसे बात करना चाहते हैं।”
“जी, किस विषय में?”
“वह स्वयं न्यायाधीश ही बताएंगे।”
“येला, मैं न्यायाधीश भूपेन्द्र बात कर रहा हूँ।”
“नमस्ते महाशय। मैं क्या कर सकती हूँ?”
“हमें बताया गया है कि वत्सर नाम के किसी शिल्पी ने एक शिल्प बनाया है जिसके संदर्भ में आप से सारा और शैल मिले थे।”
“जी, वह नदी और मृतदेह वाला शिल्प?”
“हाँ, वही। क्या उस शिल्प का हमें दर्शन करा सकती हो?”
“जी। मैं उस स्थान पर जाती हूँ। बस एक मिनट।” येला शिल्प के प्रति चलने लगी। न्यायालय ने उस मार्ग पर शिल्प शाला के कुछ शिल्पों को देखा। एक स्थान पर येला रुकी। उसने वत्सर का शिल्प न्यायालय को दिखाया।
“अद्भुत! अद्भुत!” न्यायालय में उपस्थित सभी के मुख से स्वत: यह उद्गार निकल पड़े। न्यायाधीश भूपेन्द्र भी मंत्र मुग्ध होकर उस शिल्प को देखते रहे। समय का एक टुकड़ा बह गया तब अधिवक्ता कपिल ने बात आगे चलाई, “महाशय, अब आप पूर्ण रूप से संतुष्ट हो गए होंगे कि यह शिल्प कोई कल्पना नहीं, वास्तविकता है।”
“मैं संतुष्ट ही नहीं, अभिभूत हूँ, मंत्र मुग्ध हूँ।”
“महाशय, क्या मैं येला से कुछ प्रश्न पुछ सकता हूँ?”
“नहीं महोदय। इसकी अनुमति नहीं है। येला, आपका धन्यवाद। कॉल समाप्त किया जाए।”
न्यायाधीश के आदेश पर फोन समाप्त हो गया।
“महाशय, येला से मेरा प्रश्न पूछना आवश्यक है। उसे न्यायालय में बुलाए जाने की अनुमति दीजिए।”
“महोदय, क्या यह अति आवश्यक है?”
“जी महाशय।” न्यायाधीश ने येला को न्यायालय में बुलाने का आदेश दिया। “और कोई प्रमाण, कोई तर्क करना चाहोगे श्रीमान?”
“जी। वत्सर को पुलिस कारावास में रखा जाए ऐसा मेरा निवेदन है।”
“क्यों? इसकी क्या आवश्यकता है?”
“कुछ पूछताछ करनी है।”
“वह आप यहीं न्यायालय में ही कर सकते हैं।”
“किन्तु न्यायालय का ...?”
“यही उचित होगा कि आप यहीं जो कुछ पूछना – कहना हो करें।”
“महाशय, वत्सर हत्यारा है। वह भाग सकता है।”
“हत्यारा नहीं, अभियुक्त कहो, महोदय। वत्सर से आपको किस बात का भय है?”
“वह प्रमाणों के साथ ...।”
“प्रमाण है ही कहाँ?”
“वह शिल्प?”
“वत्सर, तुम उस शिल्प के साथ कुछ नहीं करोगे।”
“जी। मैं उस स्थान पर जाऊंगा ही नहीं। यदि न्यायालय का आदेश होगा तो मैं फिरोजपुर से अन्यत्र किसी स्थान पर यात्रा भी नहीं करूंगा।”
“तुम्हारे इस वचन पर विश्वास रखकर तुम्हें पुलिस कारावास में रखने की मांग अस्वीकृत की जाती है। अपेक्षा है कि तुम इसका पालन करोगे।” वत्सर ने सम्मति दी।
“कपिल महोदय, और कुछ?”
“नहीं, आज नहीं।”
“अगली सुनवाई पंद्रह दिन बाद होगी। तब तक कुछ ठोस प्रमाण जमा करके ही न्यायालय में प्रस्तुत होना, महोदय।”
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नियत तिथि पर सब न्यायालय में उपस्थित हो गए। येला भी। न्यायालय का कार्य प्रारंभ करते हुए न्यायाधीश ने कपिल सिंघवी को अपना पक्ष रखने को कहा।
“महाशय, मैं येला से कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ।”
“अनुमति है।” येला न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत हो गई।
“येला, आप क्या काम करती हैं?”
“मैं शिल्प शाला चलाती हूँ।”
“शिल्पशाला आपकी है या अन्य किसी की?”
“मैं ही स्वामिनी हूँ।”
“शिल्पशाला में कितने विद्यार्थी हैं?”
“एक साथ पेंतीस से चालीस।”
“क्या आप वत्सर को जानती हैं?”
“हाँ।”
“कब से?”
“प्राय: आठ से अधिक वर्षों से।”
“कैसे जानती हैं?”
“जैसे एक शिल्पकार दूसरे शिल्पकार को जानता है वैसे ही।”
“क्या वत्सर आपका शिष्य था?”
“नहीं, कभी नहीं। वास्तव में शिल्पकला के कुछ गुण मैंने वत्सर से सीखे हैं।”
“तो आप वत्सर की शिष्या हैं?”
“कला क्षेत्र में प्रत्येक कलाकार अन्य कलाकारों से कुछ न कुछ सीखता रहता है। यह बात सामान्य है।”
“वत्सर का वह शिल्प आपके पास कैसे आया?”
“स्वयं वत्सर ने मुझे दिया था।”
“वास्तव में गुरुदक्षिणा के रूप में आपको वत्सर को कुछ देना चाहिए था किन्तु आपने उल्टा वत्सर से ही उसका वह शिल्प ले लिया?”
“ऐसी कोई बात नहीं है।”
“तो क्या बात है? वत्सर ने वह शिल्प आपको ही क्यों दिया? किस मूल्य पर दिया?”
“दो कलाकारों के मध्य कला के आदान प्रदान का कोई मूल्य नहीं होता है।”
“तो क्या वत्सर ने आपको यूं ही इतना अद्भुत शिल्प दे दिया?”
“नहीं ऐसे नहीं दिया।”
“तो क्या मूल्य चुकाया है आपने? न्यायाधीश महाशय, यदि कोई व्यक्ति बिना मूल्य के कोई वस्तु किसी को देता है तो हमें उस लेन देन पर अधिक ध्यान देना होगा।”
“कपिल महोदय, ऐसा क्या हो सकता है? आपका संकेत किस ओर है?”
“सरल एवं स्पष्ट शब्दों से कहता हूँ। वत्सर ने मीरा की हत्या की। येला ने उसे छिपाया। समय आने पर मीरा के मृतदेह को नदी में बहा दिया। येला के उस कार्य का मूल्य वत्सर ने अपने उस अद्वितीय शिल्प को देकर चुकाया।”