Anternihit - 4 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अंतर्निहित - 4

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अंतर्निहित - 4

[4]

सिक्किम के किसी अज्ञात पर्वत पर स्थित शिल्प शाला- 

“येला, तुमने आज के समाचार देखे?”

“इतना समय ये पत्थर कहाँ देते हैं मुझे कि मैं समाचार देख सकूँ?” येला ने पत्थर को किसी अज्ञात शिल्प का रूप देते हुए उत्तर दिया। 

“किन्तु जब पत्थर ही समाचार बन जाए तो?”

“क्या? उर्मिला, क्या कह रही हो तुम?”

“मैं सत्य कह रही हूँ।”

“तो कहो। क्या समाचार है इन पत्थरों के?”

“इन पत्थरों के नहीं, उस पत्थर का समाचार है।” उर्मिला ने शिल्प शाला के प्रवेश द्वार पर स्थित एक विशिष्ट शिल्प की तरफ संकेत करते हुए कहा। 

“वह शिल्प? उसके विषय में कोई समाचार है क्या?”

“नहीं येला। समाचार तो भिन्न ही है किन्तु उसका सीधा संबंध उस शिल्प से ही है।” उर्मिला के अधरों पर व्यंग युक्त स्मित आ गया। 

“सीधे सीधे कहो कि क्या समाचार है?”

“तुम स्वयं आ कर देख लो।” उर्मिला चली गई। येला ने शिल्प में परिवर्तित हो रहे पत्थर को वहीं छोड़ दिया। अतिथि कक्ष में जा पहुंची। 

येला के सभी छात्र, सभी कर्मचारी आदि से अतिथि कक्ष भरा हुआ था। सभी का ध्यान प्रसारित हो रहे समाचार पर केंद्रित था। समाचार चल रहा था कि -

“भारत पाकिस्तान की सीमा पर एक अज्ञात मृतदेह मिला है जिसका धड़ पकिस्तान की सीमा में था तथा बाकी शरीर भारतीय सीमा में था। सतलज नदी के सशक्त प्रवाह में भी मृतदेह बिना बहे सीमा रेखा पर ही स्थिर हो गया था। मृतदेह किसका है? मृत्यु कैसे हुई? यहाँ यह कैसे आ गया? आदि विषय से भी अधिक महत्वपूर्ण कौतुक यह है कि मृतदेह पानी में उसी बिन्दु पर आकर कैसे रुक गया जिस बिन्दु पर दोनों देश विभाजित हो जाते हैं। उस बिन्दु को देखने तथा अपने कुतूहल का शमन करने के लिए मनुष्यों का सागर वहाँ उमड़ने लगा है। प्रशासन ने मनुष्यों के प्रवाह को नियंत्रित करने का विफल प्रयास करने के पश्चात उस स्थान को घेर लिया है। सेना का उस पर नियंत्रण हो गया है। अब वहाँ कोई भी नहीं जा सकता।”

समाचार के साथ साथ अनेक चित्र और चलचित्र प्रसारित हो रहे थे। अनेकों दृश्यों को दिखाया जा रहा था। कक्ष में उपस्थित सभी मनुष्य उन्हें देखकर विस्मय से एक दूसरे की तरफ देख रहे थे। एक दूसरे को प्रश्न कर रहे थे। येला को कक्ष में प्रविष्ट करते देख सभी शांत हो गए। 

येला भी सबके साथ समाचार देखने लगी। उसने भी उन चित्रों और चलचित्रों को देखा। वह भी विस्मय से बोल पड़ी, “यह कैसे हो सकता है? यह असंभव है।”

“यही प्रश्न हमें भी हो रहा है। येला, अब तुम ही कहो कि यह क्या है?” सभी ने एक साथ पूछा। 

“इस समय तो मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं है। किन्तु यह बात मुझे भी विचलित कर रही है।” येला ने उत्तर दिया और वहाँ से जाने लगी। 

“येला, चलो एक बार जाकर उस शिल्प को देखते हैं।” किसी ने कहा। 

येला रुकी, मुड़ी और बोली, “इस समय मुझ में इतना साहस नहीं कि मैं उस शिल्प को देख सकूँ। मैं कुछ समय एकांत चाहती हूँ।” येला अपने कक्ष में चली गई। 

येला ने कक्ष को भीतर से बंद कर लिया। वातायन के समीप जाकर खड़ी हो गई। गवाक्ष से दृष्टिमान हो रही उत्तुंग पहाड़ियों को देखा। कुछ क्षण देखते देखते अनायास ही वह उपत्यकाओं को देखने लगी। नीचे, अधिक नीचे देखने लगी। अंतत: उसकी दृष्टि तरहटी पर रुक गई।  वहाँ एक झरना बह रहा था। वह उसे देखने लगी। उस झरने में उसे पानी के साथ साथ बहता हुआ एक मृतदेह दिखाई दिया। पानी के तीव्र प्रवाह से बहते हुए सहसा देह एक बिन्दु पर रुक गया। प्रवाह अभी भी तीव्र था किन्तु वह उस मृतदेह को बहा नहीं पा रहा था। वह एक ही स्थान पर स्थिर था।  

“नहीं, नहीं।” वह बोल पड़ी। उसके शब्द वातायन से होते हुए कक्ष से बाहर चले गए। पहाड़ की कन्दराओं में प्रतिघोष बनकर व्याप्त हो गए। अपने ही शब्दों का प्रतिघोष येला सुन नहीं सकी। उसने पर्वत से अपना ध्यान हटा दिया। वातायन बंद कर दिया। 

कक्ष में वह अकेली रहना चाहती थी किन्तु उसके मन में चल रहे प्रश्न उसका साथ छोड़ना नहीं चाहते थे। इन्हीं विचारों में ही वह निद्राधिन हो गई। 

जब किसी ने उसके कक्ष के द्वार को खटखटाया तभी येला जागी। वह उठी। द्वार खोल दिया। 

“येला, भोजन का समय हो गया है। चलो।” आगंतुक ने कहा। 

“ओह, मुझे समय का ध्यान ही नहीं रहा। तुम चलो। मैं अभी आती हूँ।”

“भोजन कक्ष में हम तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे। शीघ्र आ जाना।” आगंतुक चला गया। 

येला ने स्वयं को स्वस्थ किया, कुछ विचार करती हुई भोजन कक्ष में चली गई। 

सभी ने आज मौन ही भोजन किया। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। कोई किसी से आँखें नहीं मिला रहा था। वास्तव में आँखें चुरा रहा था। सब के मन पर भारत पाकिस्तान सीमा पर मिले मृतदेह का भार था।

येला ने यह सब कुछ देखा, अनुभव किया। उसने भी मौन ही भोजन किया। भोजन के साथ वह अपने विचारों को भी पचाने का प्रयास कर रही थी। उसने एक निश्चय कर लिया। 

“भोजन के पश्चात आज प्रार्थना होगी?” किसी ने येला से पूछा। 

“क्यों?”

“आज सभी के मन कुछ ....।”

येला उसके मन की बात समज गई। उसने घोषणा करते हुए कहा, “प्रार्थना के समय से दस मिनट पूर्व ही सब प्रार्थना कक्ष में आ जाएं।” येला चली गई। सब के मुख पर जागे कुतूहल के साथ एक प्रश्न को भी छोड़ती गई। 

‘दस निमिष पूर्व? अवश्य ही कोई बात होगी जो येला कहना चाहती है। क्या होगी वह बात?’ इसी प्रश्न को लेकर सभी बिखर गए। अपने अपने कक्ष में चले गए। नियत समय की प्रतीक्षा करने लगे।