: : प्रकरण -35 : :
नानी मा के निर्दय मार से बडे भाई सुखेश का देहांत हुआ था.
यह बात मैं कभी भूला नहीं पाता था.
शादी को मुश्किल से पांच साल हुए थे. और मेरी मा चल बसी थी.
उस के बारे में किसी ने उसे कुछ खिला दिया था.
हमारे गाव में एक बुजर्ग रहते थे उस को एक बेटा और बेटी थी. उन की मा भी मेरी तरह चल बसी थी. इस स्थिति में लड़की का पालन पोषण मेरी नानी मा ने किया था.
बाप बेटे पान बीड़ी और सिगरेट की दुकान चलाते थे.
बुजुर्ग के लडके के साथ उस की बहू और बेटे बेटी रहते थे. बहू का नाम गाव में ख़राब था. वह हर किसी से लड़ती झगड़ती रहती थी. कोई उस का नाम नहीं लेता था. उस की संतान भी उस के नक्शे कदम पर चलते थे.
वह मेरी साथ भी झगड़ता रहता था. मैं उसे मूंह नहीं लगाता था.
उस के अलावा हमारी पड़ोस में एक बेवा का बंगला था. उस में भगवान की मूर्ति स्थापित कर के उसे मंदिर में तब्दील किया था.
मेरी नानी मा ने जिसे पाल पोष कर बड़ा किया था, उस का नाम नंदिनी था. उस ने मेरी नानी मा का उपकार सदा याद किया था और हमारा भी ख्याल रखा था.
मुझे तो मेरी मा का चेहरा याद नहीं था.
उस की याद आते हीं मेरी कान में गीत गूंजने लगता था
राम तेरे घर कौन कमी थी
छिन ली तूने हसीं क्यों किसी की
मासूमों को अनाथ,
क्यों मासूमों को अनाथ करे..
मा ना मरे बचपन में किसी की..
मेरी कहानी के साथ एक फ़िल्म की कहानी भी जुडी थी :
' जमीन के तारे '
इस फ़िल्म में मा दो बच्चों को छोड़कर स्वर्ग सीधा गई थी.
बच्चे छोटे थे. वह भला मौत को क्या समजे?
वह अपनी मा की खोज में निकल पड़ते हैं.
रास्ते में एक ट्रक वाला मिल जाता हैं. वह उन्हें गीत के माध्यम से सवाल करता हैं.
ओ मेरे प्यारो जमीन के तारों
जाना तुम्हे हैं कहाँ?
बच्चे उसे जवाब में कहते हैं
ओ गाड़ी वाले ले चल उड़ा के
मैया हमारी हैं जहाँ
ले चल हम को वहाँ
उन की मा तो भगवान के साथ चली गई थी. अब वहाँ जाना ना मुमकिन था. फिर भी वह उन्हें दिलासा देता हैं.
" ले जाऊंगा तुम को वहाँ "
मेरी भीतर एक लेखक छिपा था.
मैंने पहली बार दो लाईने लिखी थी.
जिगर में दर्द लेकर जा रहा हूं
कहना नहीं मैं अकेला जा रहा हूं
कहाँ जाता हैं आदमी अकेला जाता हैं. उस के पीछे घर वाले रोना रोते हैं. उस का मानो मैंने जवाब दिया था.
इस दुनिया के सभी दुःख दर्द अपने साथ ले जा रहा हूं.
अनन्या के मुआमले में पहली बार मेरी दिल को भारी चोट लगी थी
" I am not your lover. "
उस की यह बात मुझे शूल की तरह चुभ रही थी.
और मुझे ऐसा कहने की नौबत आई थी.
आंसू रो रो पीता हूं
मुस्कुरा कर जीता हूं
दोस्त नहीं यार कोई
जख़्मे दिल को सीता हूं
उस वक़्त मेरी स्कूली यार श्याम ने मेरी सराहना की थी. मेरी भीतर छिपे लेखक से परिचय करवाया था.
और मैंने उसे आगे बढ़ाया था.
ज़ब मैं चला पाने मंज़िल
मिली मुझे तबाही
मिलते हीं मंज़िल
हम सफर ने ली बिदाई
मैंने तो इश्क़ की आग में
अरमानो की होली जलाई
कोई फिर भी नहीं पूछता
मैं कहाँ कैसे जीता हूं?
गरिमा ना मिलने पर मुझे अपना गीत याद आया था.
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मैं फ़िल्म ' मेरा नाम जोकर ' के नामी अभिनेता राज कपूर की तरह तीन बार फेईल हुआ था. यह मेरी बदनसीबी थी.
मैं फिल्मों का बड़ा शौखिन था.
राज कुमार मेरी चहरीता अभिनेता था. उन की फ़िल्म ' वक़्त' ने मुझे कायल - दिवाना कर दिया था.
इस फ़िल्म में उन का रोल हिरो के समानतर था. दोनों जोगानुजोग एक हीं लड़की से प्यार करते हैं. लड़की हिरो सुनील दत्त से प्यार करती हैं. राज कुमार का प्यार एक तरफा होता हैं. फिर भी वह उसे पाने के लिये आमादा हो जाता हैं.
उस के लिये वह हिरो को मारने होटल में पहुंच जाता हैं, जहाँ वह कुछ प्रोब्लेम होने पर रहने को मजबूर हो जाता हैं.
वह ज़ब उसे मारने को जाता हैं तब तिपाय पर पड़ी एक छोटे बच्चे की छबि उस के सामने आती हैं. और वह चौंक जाता हैं. वह ओर कोई नहीं उस का बचपन में बिछड़ा हुआ भाई था.
दूसरे दिन उस लड़की की सगाई होती हैं. राज कुमार उस में शामिल होता हैं
लड़की का नाम मीना था. वह इस अवसर पर बेहद खुश थी.
यह देखकर राज कुमार उसे सवाल करता हैं.
" मीना! आज तुम बेहद खुश हो ना? "
मीना उसे सन्मान पूर्वक जवाब देती हैं.
उस ने राज कुमार को मर्जी के हिसाब से इनाम मांगने का वादा किया था. उसे याद कर के वह मीना को सवाल करता हैं.
" आज मैं तुम से इनाम मांग सकता हूं? "
उस के ऐसे सवाल से उसे संदेह होता हैं. उसे शायद पता चल गया था. वह भी उसे चाहता था. अगर उस ने ऐसा हीं कुछ मांगा तो?
उस ने हकारात्मक जवाब दिया तो, राज कुमार ने उसे कहां : ' बस रवि को इतना प्यार देना जो आज तक कोई बीवी अपने पति को ना दे पाई हो. "
यह कहकर उस ने मीना के सिर पर हाथ ऱख दिया.
और रवि को बताया : कल रात तुम मेरी सपने में आये थे, और भैया कहकर मुझे लिपट गये थे.
सुनकर रवि ने कहां था. वह तो एक सपना था. आओ हम सचमुच भाई बनकर लिपट जाते हैं.
यह देखकर मीना भी भावुक हो जाती हैं.
फ़िल्म के इस दृश्य ने मेरी जिंदगी में अहम भूमिका निभाई थी. मैंने शायद उसी का अनुकरण किया था.
श्याम ने उस ने मेरी फ़िल्म देखने की आदत को जिम्मेदार माना था. हकीकत में वह गलत नहीं था.
क्यों की फ़िल्म की अभिनेत्री उस में निमित्त बनी थी. उस का हुलिया ' मेरे मेहबूब ' की नायिका से हूबहू मिलता था. यह बात मैंने श्याम को बताई थी.
0000000000 ( क्रमशः )
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