Yaado ki Sahelgaah - 34 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (34)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (34)


.                  : :  प्रकरण -34 : :

          तिजोरी वाला स्नेहा के पीछे दिवाना, पागल हो गया था. उस ने कमला की मदद से उसे फ़ाँसने की कोशिश की थी, लेकिन उस की दाल नहीं गली थी.

          उस ने कई बार मुझे स्नेहा को लेकर ताने मारे थे.

         " स्नेहा तो आप की रखैल हैं. मुझे भी भागीदारी दे दो ना! "

         उस की ऐसी घिनौनी बात से मुझे बड़ा गुस्सा आया था. उसे ठपड़  मारने का ख्याल आया था. लेकिन वह नंगा था. उस को कोई शर्म नहीं थी

        फिर भी मैंने उसे चेतावनी दी थी.

        " स्नेहा की तरफ आंख उठाकर देखा तो तुम्हारी आंखे निकाल दूंगा. "

        और उस के बाद उस की हिम्मत नहीं हुई थी.

        कैसे हालात खडे हुए थे. तिजोरी वाले की वजह से मुझे यह काम मिला था. उस के लिये मुझे उस का एहसान जताना चाहिये लेकिन उस की घिनौनी हरकतों ने मेरे हाथ बांध दिये थे.

         मैं चाहते हुए भी उस का रुण चूका नहीं सका था. इस मुआमले में मैं नमक हराम साबित हुआ था.

         मैं सदैव भगवान पर विश्वास करता था. मैं जानता था उसे अपने किये कराये की किम्मत यहाँ हीं चुकानी हैं.

        और उसे कड़ी सजा मिली थी. उस की बीवी ना जाने कितनी बीमारियों की लपेट में आ गई थी. 

        उस की इकलौती लड़की भी हादसे का शिकार होकर अपनी दोनों टांगे खो बैठी थी. वह किसी चीज के लायक नहीं रही थी..

       अपनी खुद की बेटी होते हुए भी उस को दूसरों की बेटियों की इज्जत करना आता नहीं था. उस ने पराई लड़कियों के बारे में अच्छा सोचा नहीं था..

       उस के मा बाप कौन थे? वह क्या करते थे? उन्होंने अपने बेटे को क्या सिखाया था. यह एक चर्चा का विषय था. उस ने अच्छी पढ़ाई की थी, उस ने ग्रेजुएशन पूर्ण किया था, लेकिन उस का सही इस्तेमाल नहीं किया था. उस के बाप का दारू का बार था. उन्होंने बहुत कमाया था और अपने बेटे को दिया था, जिस का उस ने गलत इस्तेमाल किया था.

      बहुत हीं कम उम्र में उसे वेश्या के पास जाने का चस्का लग गया था, उतना हीं नहीं अड़ोश पड़ोश की लड़की को कुछ ना कुछ लालच देकर उस का शोषण करता था.

       उस ने अपने बडे भाई को बहू के साथ रति क्रिया करते हुए प्रत्यक्ष देखा था. उस ने अपनी बड़ी भाभी के साथ वही हरकते करने की कोशिश की तो उसे घर से बाहर निकाल दिया था.

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        मैंने जरूरत पड़ने पर अपना घर बेच दिया था. और दस लाख का मुनाफा कमाया था. मेरी उम्र हो चुकी थी. मैंने अपनी मर्जी से माधुरी की योजना का स्वीकार कर लिया था. उस से भी कुछ पैसे मिले थे. मैंने सभी पैसे की FD कराली थी. उस के व्याज से घर का खर्चा निकालना मुश्किल कार्य था.

       माधुरी में काम करते समय मैंने पोस्ट एक्सपोर्ट्स बेनिफिट की रिकवरी का काम शुरू किया था. वह अच्छा चल रहा था. मेरा एक भागीदार भी था. धंधा अच्छा चल रहा था. उस पर दयान देना अति आवश्यक था. दो घोड़े पर सवारी करना मुझे रास नहीं आता था. इस लिये मैंने निवृति योजना तले इस्तीफा दे दिया था.

      मैंने ज्यादातर फार्मेसीटिकल, केमिकल कंपनी से ज्यादा काम किया था. कुछ काम पाने के लिये मुझे कंपनी के कुछ लोगो को कमीशन भी देना पड़ता था.

      मैं ड्यूटी ड्रॉ बेक, सेन्ट्रल एक्साइज रिफंड, ओक्ट्रॉई रिफंड, रीप्लेनिशमेंट लाइसेंस और कैश इंसेंटिव, एडवांस लाइसेंस का भी काम करता था.

        मेरी जिंदगी में मुसाफरी का योग था. सब से ज्यादा उस का मौका मुझे ' माधुरी' में मिला था.. मैंने लगेज के डिब्बे में, सेकंड क्लास में, फर्स्ट क्लास में, ए सी कम्पार्टमेंट में यात्रा की थी.

        मैंने फ्लाइट में भी यात्रा की थी. कुमार भाई ने मुझे पुरी सहूलियत दी थी. मैं फाइव स्टार होटल में भी ऱह सकता था. माधुरी के जोब के लिये मुझे बड़ोदा, आनंद,  नडियाद, अमदावाद, कंडला, भुज और दिल्ली इत्यादि जगह जाने का मौका मिला था.

         यह साब देखकर तिजोरी वाला जलन महसूस करता था, उस के चमचो का तो क्या कहना? 

         वह तिजोरी वाला की उंगली पकडकर चलते थे. उसी की भाषा बोलते थे. इस वजह से वह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाये थे.

          मैं दिनों तक घर से दूर रहता था. मुझे अपनी बीवी की कमी खलती थी. इस लिये सेक्स पूर्ति के लिये मैं ठिकाना  ढूंढ रहा था. लेकिन मुझे दिल्ली के लोगो पर कोई विश्वास नहीं था. वहाँ तो आठ बजे के बाद बाहर निकलना जोखिम था.

       एक बार बड़ोदा स्टेशन पर ख़डी धंदे वाली को देखा था. उस के साथ बातचीत की थी, वह खुद धंधेवाली नहीं थी, उस की दलाल थी.

       वह मुझे एक जगह ले गई थी.

       और एक लड़की से मिलाया था.

        पैसा लेने के बाद भी उस ने मुझे वह नहीं दिया था, जिस के लिये मैं आया था. मैं हताश होकर उस के आवास से बाहर निकला था और रिक्शा पकड़ा था. तब उस के ड्राइवर ने मुझे टोका था.

      " साब आप ऐसी जगह क्यों चले गये? "

      मेरे पास उस का जवाब नहीं था. वैसे तो उसे जवाब देने की कोई जरूरत नहीं थी. लेकिन मैं खुद उस का जवाब देने में नाकाम रहा था.

       बड़ोदा ओफिस में तिजोरी वाला का एक काउंटर पार्ट था जो कहो उस का हीं भाई था. उस का नाम नागेश था. उसी के कहने से मैंने गलत काममें उस का साथ दिया था और बेईमानी करते हुए कुछ पैसे कमाये थे. जिस के बारे में मुझे अफ़सोस हुआ था.

      यह बात कुमार भाई के कानो तक पहुंची थी. लेकिन उन्होंने इस बात पर भरोसा नहीं किया था, जिस से मेरा मोरल बूस्ट हुआ था.

     यह बात जानकर तिजोरी वाला को फिर से मुझे लेकर जलन हुई थी.

      मेरी ईमानदारी से मैनेजिंग डायरेक्टर भी बहुत ख़ुश थे..

      ओफिस में ऐसा कोई नहीं था जिस ने बेईमानी से अपनी जेब  ना  भरी हो.

       मेरी हाथ नीचे एक लड़का काम करता था. वह सीधा, सादा और नेकदिल था. वह मुझे मानता था. और बिना कोई अपेक्षा या स्वार्थ मेरा सब काम करता था. उस की शादी में मैंने उस की बीवी को रस्म के हिसाब से कुछ देने को चाहा था, जिस का उस ने इन्कार करते हुए इतना कहां था:

      " साब! हम दोनों के लिये आप के आशीर्वाद ही काफ़ी हैं. "

                   00000000000       (क्रमशः)