Yaado ki Sahelgaah - 25 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (25)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (25)


                  : :  प्रकरण  - 25 : :

         उस एडिटर का नाम जयेश सोनी था. उस की मददनिश तंत्री एक लड़की थी. जो जनरल विभाग देखती थी. वह मेगेजिन सेक्शन संभालना चाहती थी.

         लेकिन वह सेक्शन एक काबिल और सक्षम व्यकित मनोज ओझा संभालता था. वह बडे घर का लड़का था. वह पैसे के लिये नहीं बल्कि शोख के लिये जोब करता था. हर बार बार कुछ ना कुछ नया करता रहता था.

         जयेश सोनी और मिनाक्षी के बीच कोई खिचड़ी पक रही  थी. जयेश सोनी रोज शाम को उस के घर जाते समय उस के साथ जाता था. वैसे उसे आँख का प्रोब्लेम था, फिर क्यों वह जाता था? यह बहुत बड़ा सवाल था. ओफिस में उस की बड़ी चर्चा थी

      प्रूफ रीडिंग में मेरे साथ तीन लड़किया काम करती थी उस में एक लड़की उस पत्रकार की ममेरी बहन थी जिस से मेरा अच्छा ट्यूनिंग हो गया था..

       मेरे साथ सब तंत्री की हैसियत से राज हंस काम करता था जिसे एक साप्ताहिक सामायिक में तंत्री की पोस्ट के लिये नियुक्त किया गया था, उसे कोई मददनीश की जरुरत थी. और वह मेरी परिस्थिति से वाकिफ था . उस ने मुझे यह जोब ओफर किया था. और बिना सोचे उस के साथ चला गया था.

       शुरुआत तो ठीक रही लेकिन बाद में राज हंस का असला चेहरा सामने आ गया था..

        इस्यु  पूरा करने की मेरी पूर्ण जिम्मेदारी  मेरे सिर पर आ गई थी,  उसे डेड लाइन के पहले पूरा करने की जिम्मेदारी थी, उस के लिये मुझे अंतिम दिन भूखे प्यासे 15 से 20 घंटा लगातार काम करना पड़ता था.. उस की राजहंस को पड़ी नहीं थी. उसे मेरी कोई फ़िक्र चिंता नहीं थी. 

       ना तो मुझे ओवर दिलाया था ना तो कम्पन्सटोरी छूट..

        मैंने उसे एक कहानी प्रकाशित करने के लिये दी थी, जिसे उस ने रिजेक्ट कर दिया था. मुझे उस बात का रंज, अफ़सोस  हुआ था. फिर भी मैंने चूप रहना उचित नहीं समझा था.

        ज़ब उस ने मुझे कोई मदद नहीं की तो मैंने उसे साफ कह दिया था.

         " शनिवार को मेरी ड्यूटी 3-00 बजे तक थी, फिर भी मैं पांच बजे तक रुकूंगा. "

         उस का  राजहंस ने स्वीकार किया था.

         और दूसरे शनिवार मैंने पांच बजे छुट्टी मांगी थी.. उस वक़्त राजहंस ने पलटी मारी थी.

       " तुम्हारी मर्जी. फिर मुझे दोष मत देना! "

       उस की बात सुनकर मैंने उसे सवाल किया था.

        " क्या होगा? मुझे जोब खोना पड़ेगा ना? "

        यह सवाल कर के मैं ओफिस की सीढ़िया उतर गया था.

         नीचे कंपाउंड में मुझे अपना स्कूली यार अमित मिला था. जो दोपहर को प्रकाशित होने वाले दैनिक का तंत्री था. मैंने उसे सब कुछ बता दिया था, तब उस ने मुझे आश्वस्त किया : 

          " तुम फ़िक्र मत करो. उस के खिलाफ इन्क्वायरी हो रही हैं. उस के सामने बहुत कुछ शिकायत मिली हैं. बहुत ही जल्द उस की नैया डूबने वाली हैं. "

          मैं नचिंत होकर स्टेशन की ओर आगे बढ़ गया.

          वोह चैन स्मोकर था. मैं भी सिगरेट पीता था. लेकिन मैंने उसे छोड़ दिया था. उस बात से अचरज हुआ था. मेरी तारीफ भी की थी.

         ओफिस में एक दो लड़की से मेरा अच्छा परिचय था.. वह भी उस को पसंद नहीं था. मराठी विभाग की एक लड़की और मेरा स्टेशन पर उतरना एक ही समय था, हम लोग एक ही गाड़ी में आते थे और अक्सर मिल जाते थे और साथ ही आते थे. उस ने मुझे सवाल किया था.

        " आप रोज साथ आते हो? "

        उस के सवाल का जवाब देना जरूरी था. दूसरी एक लड़की थी, वह मराठी थी. मैं उसे बेटी मानता था. उस के बारे में ही उस ने मराठी विभाग के एडिटर के कान भर दिये थे. 

        उन्ही दिनों मेरी एक लघु नवल कथा उसी प्रेस से पब्लिश हुई थी. यह मेरी पहली बड़ी सिद्धि थी. उस की खुशी में मैंने एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था, जिस में मैंने उस लड़की और मददनीश तंत्री को आमंत्रित किया था, लेकिन राज हंस को पूछा नहीं था. उस के हिसाब से मैं लेखक नहीं था. 

      मैंने उसे आमंत्रित ना कर के उस का खुल्ला अपमान किया था.

       इस पार्टी में 'कीसी' और शेठ ब्रदर्स में काम करने वाले कलीग को और उस की बीवी को भी आमंत्रित किया था.

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        मैं शनिवार को जल्दी चला गया था. उस का क्या नतीजा होने वाला था, मैं उस बात से अवगत था, और मैं उस के लिये पुरी तरह से तैयार था.

         उस को जो कुछ डैमेज करना था उस की शुरुआत उस ने शनिवार को ही कर दी थी.

         सोमवार को क्या होगा? मैं जानता था.

         ओफिस में दाखिल होते ही प्यून ने मुझे बताया था.

          " आप को बडे साब ने बुलाया हैं. "

        और मैं तुरंत पानी पीकर उन की केबिन तक पहुंच गया था. आधा दरवाजा खोलकर मैंने अनुमति मांगी थी. 

        " May I come in sir? "

        " Yes do come! "

        और मैं केबिन में दाखिल हुआ था.

         उन्होंने मुझे सामने रखी खुर्शी पर बिठाया था.

         और सवाल किया था?

          " राज हंस से तुम्हे क्या प्रोब्लेम हैं? उस का कहना हैं, उस ने तुम्हारी कहानी प्रकाशित करने से मना किया इस लिये ऐसा कर रहे हो  "

          " साब! उस में कोई तथ्य नहीं हैं. यह तो दुखे पेट  और कूटे सर वाली बात हैं. बाकी मैंने अब तक बीस से ज्यादा कहानी पब्लिश हुई हैं, जिस में कितनी कहानिया  साभार परत हुई हैं जिस को दोबारा लिखकर मैंने बेहतर सामायिक में भेजी हैं जो आसानी  से पब्लिश हो गई हैं. उस ने जो कहानी रिजेक्ट की थी वह कल के प्रतिष्ठित दैनिक पेपर की साप्ताहिक पूर्ति के पहले पेज पर प्रकाशित हुई हैं. "

       " उस ने मेरी कहानी को पब्लिश नहीं की थी. उस की वजह एक ही थी. मैंने उस के कारनामें शब्दश कहानी में शामिल किये है. "

        " सर! वह पगार आप से लेता हैं और दूसरे नाम से लेख लिखकर दुगुना पैसा कमाता हैं.. वह कभी ओफिस में एक घंटे से ज्यादा बैठा नहीं हैं. उस के लिये पार्टी, समारोह, कांफेरन्स नाच गाना क्लब ऐयासी के सिवा कुछ नहीं हैं. शराब और ललना उस का शौख बन गया हैं.

        मिस्टर संभव तुमने हमारी आंखे खोल दी हैं. हमने लोगो से बहुत कुछ सुना था लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया था.

        कल तुम्हारी कहानी हमने पढ़ी हैं. हम उसे आज ही जोब से बर्खास्त कर रहे हैं.

        " और सर मैं भी यह जोब छोड़ रहा हूं. अजब इत्तेफ़ाक़ हैं हम दोनों ने साथ में ही ज्वाइन किया था और दोनों बाहर हो रहे हैं लेकिन दोनों में बड़ा अंतर हैं.. "

                           0000000000  (क्रमशः)