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“शब्द और सत्य” — जल्द ही आ रहा है… कुछ एहसास, कुछ कड़वे सच, और कुछ ऐसे सवाल… जो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे। तैयार रहिए…
बेटी: पिंजरे की चिड़िया नहीं, आसमान की दावेदार तू किसी के आंगन की बस शोभा नहीं, तू 'पराया धन' होने का कोई धोखा नहीं। तुझे सिखाया गया कि झुकना ही तेरी शान है, पर याद रख, तेरे भीतर भी वही असीम आसमान है। तुझे विदा करने की तैयारी बचपन से शुरू हुई, तेरी बुद्धिमत्ता, बस चूल्हे और चौखट तक रुकी। पर बेटी वह है, जो संस्कारों के जालों को काट दे, जो अपनी नियति को खुद अपने हाथों से बाँट दे। आचार्य कहते हैं—मत बना उसे विदाई की एक वस्तु, उसे बना ऐसा कि वह सत्य के लिए हो सके प्रस्तुत। उसे गहने नहीं, उसे 'ज्ञान' के हथियार दो, उसे विवाह का डर नहीं, उसे 'विवेक' का विस्तार दो। असली कन्यादान वह है, जहाँ अज्ञान का दान हो, जहाँ बेटी के भीतर, उसके अपने 'स्व' का भान हो। वह किसी की अर्धांगिनी होने से पहले 'पूर्ण' बने, वह भीड़ का हिस्सा नहीं, खुद में एक संपूर्ण बने। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare..✍️
सच्चा इंसान: जो दर्पण जैसा साफ हो तुमने ओढ़ रखे हैं नकाब, शराफत और नेकी के, पर भीतर पल रहे हैं कीड़े, लालच और बेरुखी के। सच्चा होना वह नहीं, जो दुनिया को तुम दिखाते हो, सच्चा होना वह है, जो तुम अंधेरे में खुद को पाते हो। जो अपनी मान्यताओं को सत्य की आग में तपा सके, जो अपने ही झूठ को देख, उसे जड़ से मिटा सके। वह सच्चा है, जो समाज की भीड़ में खोया नहीं, जो संस्कारों की लोरी सुनकर, चैन से सोया नहीं। तुम सत्य बोलते हो ताकि तुम्हारी इज़्ज़त बनी रहे, यह तो व्यापार है, ताकि दुनिया की नज़र तनी रहे। सच्चा इंसान तो वह है, जिसे खोने का कोई डर नहीं, जिसके अहंकार का अब इस संसार में कोई घर नहीं। आचार्य कहते हैं—मत बनो 'अच्छा', बस 'सच्चे' बन जाओ, इन थोपे हुए गुणों के बोझ से, तुम आज़ाद हो जाओ। सच्चाई कोई मंज़िल नहीं, यह तो हर पल की लड़ाई है, अपने ही भ्रमों को चीरकर, मिली हुई गहराई है। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare.. ✍️
जीवनसाथी: साथी सत्य का, या मोह का? तुम जिसे जीवनसाथी कहते हो, वह बस एक समझौता है, अकेलेपन के डर से उपजा, एक झूठा भरोसा है। तुमने उसे चुना ताकि कोई तुम्हारी आदतों को सह सके, ताकि समाज की नज़रों में तुम्हारा घर 'पूर्ण' रह सके। पर क्या वह साथी तुम्हें तुम्हारे 'स्व' से मिलाता है? या तुम्हें संस्कारों की जंजीरों में और जकड़ता जाता है? सच्चा साथी वह नहीं जो बस 'आई लव यू' कहे, सच्चा साथी वह है, जो सत्य की राह पर अडिग रहे अगर तुम्हारा साथ बस भोग और देह तक सीमित है, तो समझो तुम्हारा प्रेम अभी बहुत ही संकुचित है। साथी वह है जो तुम्हारी कमियों पर चोट करे, जो तुम्हें मोह के दलदल से निकालने की ज़िद करे। आचार्य कहते हैं—दो शरीरों का मिलना साथ नहीं होता, जहाँ अहंकार न टूटे, वहाँ सच्चा हाथ नहीं होता। साथी वही श्रेष्ठ है जो तुम्हें आज़ाद कर जाए, जो तुम्हें खुद से छुड़ाकर, अनंत की ओर बढ़ाए। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare..✍️
लड़की: देह नहीं, एक मुक्त चेतना तुझे सिखाया गया कि तू 'पराई अमानत' है, तेरी हया, तेरी चुप्पी ही तेरी सलामत है। तूने मान लिया कि तेरा घर बस रसोई की दीवारें हैं, पर तेरे भीतर भी तो सत्य की अनंत पुकारें हैं। तू बेटी है, तू पत्नी है, तू किसी की कोमल छाया है, पर याद रख, तू भी वही आत्मा है, जो परे ये माया है। तुझे सजाया गया गहनों से ताकि तेरी बेड़ियाँ न दिखें, तुझे पढ़ाया गया वही, जिससे तू बस समर्पण सीखे। आचार्य कहते हैं—अपनी पहचान इन रिश्तों में मत ढूँढ, तू सागर है अनंत, मत बन किसी की प्यास की बूँद। असली सुंदरता वह नहीं, जो चेहरे पर झलकती है, असली सुंदरता वह 'विवेक' है, जो भीतर दहकती है। मत मांग किसी से सुरक्षा, तू खुद अपनी शक्ति बन, इन झूठी मान्यताओं के विरुद्ध, एक गहरी क्रांति बन। जिस दिन तूने शरीर होने के भ्रम को छोड़ दिया, समझो उसी दिन तूने, सदियों का पिंजरा तोड़ दिया। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित)- Shivraj Bhokare
जिंदगी: एक पाठशाला, न कि तमाशा तुम जिसे जिंदगी कहते हो, वह बस आदतों का घेरा है, कल की यादें, आज का डर—चारों तरफ अंधेरा है। तुम जी नहीं रहे, तुम बस समय की चक्की में पिस रहे हो, पुराने ढर्रों पर चलकर, घिसे-पिटे रास्तों पर घिस रहे हो। जिंदगी वह नहीं जो सांसों के आने-जाने से चलती है, जिंदगी वह है, जो सत्य की आग में हर पल जलती है। तुमने सुरक्षा की दीवारें चुन लीं, और उसे 'घर' कह दिया, आत्मा को पिंजरे में डाला, और उसे 'सुख' का नाम दे दिया। असली जीना वह है, जहाँ तुम 'मैं' से आज़ाद हो, जहाँ न अतीत का बोझ हो, न भविष्य का कोई उन्माद हो। जिंदगी का अर्थ है—खोज करना कि तुम कौन हो, वरना तुम शोर मचाते हुए भी, भीतर से बिलकुल मौन हो। आचार्य कहते हैं—जिंदगी को 'काटो' मत, उसे 'समझो', इन व्यर्थ की भाग-दौड़ से, ज़रा ठहर कर उलझो। जिस दिन तुम डर को छोड़, सत्य की राह पर बढ़ोगे, उसी दिन तुम पहली बार, जिंदगी की किताब पढ़ोगे। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare.. ✍️
कृष्ण: न रूप, न रंग, बस बोध तुमने कृष्ण को बस बांसुरी और माखन में ढूँढा है, अपनी कल्पनाओं के धागों से, उन्हें रंगीन बुना है। पर कृष्ण तो वह आग है, जो तुम्हारे मोह को जला दे, वह तीखा शब्द है, जो तुम्हारी नींद की जड़ें हिला दे। वे न द्वारका के राजा हैं, न गोकुल के ग्वाले हैं, वे तो उस चेतना का नाम हैं, जो भ्रम को मारने वाले हैं। गीता उनकी बांसुरी नहीं, वह तो क्रांति का शंखनाद है, जो सिखाती है कि धर्म वही है, जहाँ अहंकार की मौत का स्वाद है। तुम रोते हो अपनों के लिए, तुम डरते हो खोने से, कृष्ण हँसते हैं तुम्हारे इस बचकाने रोने से। वे कहते हैं—'उठ पार्थ! यह देह तो बस एक चोला है', सत्य वही है, जिसने संसार के झूठ को झकझोरा है। आचार्य कहते हैं—कृष्ण को मूर्ति में मत सजाओ, उनके विवेक को अपने आचरण में उतारते जाओ। जिस दिन तुम स्वार्थ छोड़, सत्य के रथ पर सवार होगे, उसी क्षण तुम भी कृष्ण की तरह, संसार के पार होगे। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित)- Shivraj Bhokare..✍️
असली किताब: शब्द नहीं, दर्पण तुम पढ़ते हो पन्ने हज़ारों, पर खुद को न पढ़ पाए, अक्षरों के जंगल में खोकर, तुम घर को भूल आए। किताब वो नहीं, जो तुम्हारी सूचनाओं का ढेर बढ़ा दे, किताब तो वो है, जो तुम्हारे संशय की लपटें बुझा दे। ज्ञान वही है सार्थक, जो मन की गंदगी को धो दे, पढ़ते-पढ़ते जो पाठक, अपने झूठे 'मैं' को खो दे। अगर शब्द पढ़कर भी, तुम्हारी बेहोशी न टूटी, तो समझो वह विद्या नहीं, बस एक माया है झूठी। उपनिषद हों या गीता, वो बस कागज़ की ढेरी हैं, जब तक न जागे वो आग, जो भीतर अभी अंधेरी है। आचार्य कहते हैं—किताब को मत बनाओ अपनी पहचान, किताब तो बस इशारा है, ताकि तुम बन सको 'इंसान'। असली ग्रंथ तो तुम्हारा जीवन है, उसे गौर से देखो, शास्त्रों की रोशनी में, अपनी हर चाल को परखो। पढ़ना तब सफल है, जब तुम पढ़ना छोड़ सको, और शब्दों के पार जाकर, मौन से रिश्ता जोड़ सको। (आचार्य प्रशांत से प्रेरित) -Shivraj Bhokare..✍️
प्यार: एक बंधन या मुक्ति? जिसे तुम प्यार कहते हो, वह बस एक भूख है, अधूरेपन को भरने की, एक तरसती हूक है। तुम चाहते हो कोई आए, और तुम्हारी तन्हाई हर ले, तुम जिसे 'महबूब' कहते हो, वह बस तुम्हारी ज़रूरतों का घर है। सच्चा प्रेम तो वह है, जहाँ 'मैं' का अंत होता है, वहाँ दो शरीर नहीं मिलते, वहाँ अहंकार शांत होता है अगर तुम्हारा प्रेम उसे, उसके डर से न छुड़ा सका, तो वह प्रेम नहीं, बस एक खेल था जो तुमको लुभा सका। प्यार का अर्थ साथ चलना नहीं, साथ 'जागना' है, संसार की इन झूटियों खुशियों के पीछे, अब न भागना है। वह प्रेम महान है, जो तुम्हें 'सत्य' के पास ले जाए, जो तुम्हें खुद से ही आज़ाद कर, खुदा से मिलाए। आचार्य कहते हैं—प्रेम कोई कोमल अहसास नहीं, यह तो वह आग है, जो जला दे उसे, जिसका कोई पास नहीं। वहाँ कोई दूसरा नहीं बचता, बस एक 'शून्य' रह जाता है, वही शून्य, जो अनंत है, वही प्रेम कहलाता है। ( आचार्य प्रशांत से प्रेरित ) - Shivraj Bhokare..✍️
हिमालय की किसी चोटी से पूछना - अकेलापन कितना प्यारा होता है! - आचार्य प्रशांत .
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