असली किताब: शब्द नहीं, दर्पण
तुम पढ़ते हो पन्ने हज़ारों, पर खुद को न पढ़ पाए,
अक्षरों के जंगल में खोकर, तुम घर को भूल आए।
किताब वो नहीं, जो तुम्हारी सूचनाओं का ढेर बढ़ा दे,
किताब तो वो है, जो तुम्हारे संशय की लपटें बुझा दे।
ज्ञान वही है सार्थक, जो मन की गंदगी को धो दे,
पढ़ते-पढ़ते जो पाठक, अपने झूठे 'मैं' को खो दे।
अगर शब्द पढ़कर भी, तुम्हारी बेहोशी न टूटी,
तो समझो वह विद्या नहीं, बस एक माया है झूठी।
उपनिषद हों या गीता, वो बस कागज़ की ढेरी हैं,
जब तक न जागे वो आग, जो भीतर अभी अंधेरी है।
आचार्य कहते हैं—किताब को मत बनाओ अपनी पहचान,
किताब तो बस इशारा है, ताकि तुम बन सको 'इंसान'।
असली ग्रंथ तो तुम्हारा जीवन है, उसे गौर से देखो,
शास्त्रों की रोशनी में, अपनी हर चाल को परखो।
पढ़ना तब सफल है, जब तुम पढ़ना छोड़ सको,
और शब्दों के पार जाकर, मौन से रिश्ता जोड़ सको।
(आचार्य प्रशांत से प्रेरित) -Shivraj Bhokare..✍️