जीवनसाथी: साथी सत्य का, या मोह का?
तुम जिसे जीवनसाथी कहते हो, वह बस एक समझौता है,
अकेलेपन के डर से उपजा, एक झूठा भरोसा है।
तुमने उसे चुना ताकि कोई तुम्हारी आदतों को सह सके,
ताकि समाज की नज़रों में तुम्हारा घर 'पूर्ण' रह सके।
पर क्या वह साथी तुम्हें तुम्हारे 'स्व' से मिलाता है?
या तुम्हें संस्कारों की जंजीरों में और जकड़ता जाता है?
सच्चा साथी वह नहीं जो बस 'आई लव यू' कहे,
सच्चा साथी वह है, जो सत्य की राह पर अडिग रहे
अगर तुम्हारा साथ बस भोग और देह तक सीमित है,
तो समझो तुम्हारा प्रेम अभी बहुत ही संकुचित है।
साथी वह है जो तुम्हारी कमियों पर चोट करे,
जो तुम्हें मोह के दलदल से निकालने की ज़िद करे।
आचार्य कहते हैं—दो शरीरों का मिलना साथ नहीं होता,
जहाँ अहंकार न टूटे, वहाँ सच्चा हाथ नहीं होता।
साथी वही श्रेष्ठ है जो तुम्हें आज़ाद कर जाए,
जो तुम्हें खुद से छुड़ाकर, अनंत की ओर बढ़ाए।
(आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare..✍️