कृष्ण: न रूप, न रंग, बस बोध
तुमने कृष्ण को बस बांसुरी और माखन में ढूँढा है,
अपनी कल्पनाओं के धागों से, उन्हें रंगीन बुना है।
पर कृष्ण तो वह आग है, जो तुम्हारे मोह को जला दे,
वह तीखा शब्द है, जो तुम्हारी नींद की जड़ें हिला दे।
वे न द्वारका के राजा हैं, न गोकुल के ग्वाले हैं,
वे तो उस चेतना का नाम हैं, जो भ्रम को मारने वाले हैं।
गीता उनकी बांसुरी नहीं, वह तो क्रांति का शंखनाद है,
जो सिखाती है कि धर्म वही है, जहाँ अहंकार की मौत का स्वाद है।
तुम रोते हो अपनों के लिए, तुम डरते हो खोने से,
कृष्ण हँसते हैं तुम्हारे इस बचकाने रोने से।
वे कहते हैं—'उठ पार्थ! यह देह तो बस एक चोला है',
सत्य वही है, जिसने संसार के झूठ को झकझोरा है।
आचार्य कहते हैं—कृष्ण को मूर्ति में मत सजाओ,
उनके विवेक को अपने आचरण में उतारते जाओ।
जिस दिन तुम स्वार्थ छोड़, सत्य के रथ पर सवार होगे,
उसी क्षण तुम भी कृष्ण की तरह, संसार के पार होगे।
(आचार्य प्रशांत से प्रेरित)- Shivraj Bhokare..✍️