सच्चा इंसान: जो दर्पण जैसा साफ हो
तुमने ओढ़ रखे हैं नकाब, शराफत और नेकी के,
पर भीतर पल रहे हैं कीड़े, लालच और बेरुखी के।
सच्चा होना वह नहीं, जो दुनिया को तुम दिखाते हो,
सच्चा होना वह है, जो तुम अंधेरे में खुद को पाते हो।
जो अपनी मान्यताओं को सत्य की आग में तपा सके,
जो अपने ही झूठ को देख, उसे जड़ से मिटा सके।
वह सच्चा है, जो समाज की भीड़ में खोया नहीं,
जो संस्कारों की लोरी सुनकर, चैन से सोया नहीं।
तुम सत्य बोलते हो ताकि तुम्हारी इज़्ज़त बनी रहे,
यह तो व्यापार है, ताकि दुनिया की नज़र तनी रहे।
सच्चा इंसान तो वह है, जिसे खोने का कोई डर नहीं,
जिसके अहंकार का अब इस संसार में कोई घर नहीं।
आचार्य कहते हैं—मत बनो 'अच्छा', बस 'सच्चे' बन जाओ,
इन थोपे हुए गुणों के बोझ से, तुम आज़ाद हो जाओ।
सच्चाई कोई मंज़िल नहीं, यह तो हर पल की लड़ाई है,
अपने ही भ्रमों को चीरकर, मिली हुई गहराई है।
(आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare.. ✍️