जिंदगी: एक पाठशाला, न कि तमाशा
तुम जिसे जिंदगी कहते हो, वह बस आदतों का घेरा है,
कल की यादें, आज का डर—चारों तरफ अंधेरा है।
तुम जी नहीं रहे, तुम बस समय की चक्की में पिस रहे हो,
पुराने ढर्रों पर चलकर, घिसे-पिटे रास्तों पर घिस रहे हो।
जिंदगी वह नहीं जो सांसों के आने-जाने से चलती है,
जिंदगी वह है, जो सत्य की आग में हर पल जलती है।
तुमने सुरक्षा की दीवारें चुन लीं, और उसे 'घर' कह दिया,
आत्मा को पिंजरे में डाला, और उसे 'सुख' का नाम दे दिया।
असली जीना वह है, जहाँ तुम 'मैं' से आज़ाद हो,
जहाँ न अतीत का बोझ हो, न भविष्य का कोई उन्माद हो।
जिंदगी का अर्थ है—खोज करना कि तुम कौन हो,
वरना तुम शोर मचाते हुए भी, भीतर से बिलकुल मौन हो।
आचार्य कहते हैं—जिंदगी को 'काटो' मत, उसे 'समझो',
इन व्यर्थ की भाग-दौड़ से, ज़रा ठहर कर उलझो।
जिस दिन तुम डर को छोड़, सत्य की राह पर बढ़ोगे,
उसी दिन तुम पहली बार, जिंदगी की किताब पढ़ोगे।
(आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare.. ✍️