बेटी: पिंजरे की चिड़िया नहीं, आसमान की दावेदार
तू किसी के आंगन की बस शोभा नहीं,
तू 'पराया धन' होने का कोई धोखा नहीं।
तुझे सिखाया गया कि झुकना ही तेरी शान है,
पर याद रख, तेरे भीतर भी वही असीम आसमान है।
तुझे विदा करने की तैयारी बचपन से शुरू हुई,
तेरी बुद्धिमत्ता, बस चूल्हे और चौखट तक रुकी।
पर बेटी वह है, जो संस्कारों के जालों को काट दे,
जो अपनी नियति को खुद अपने हाथों से बाँट दे।
आचार्य कहते हैं—मत बना उसे विदाई की एक वस्तु,
उसे बना ऐसा कि वह सत्य के लिए हो सके प्रस्तुत।
उसे गहने नहीं, उसे 'ज्ञान' के हथियार दो,
उसे विवाह का डर नहीं, उसे 'विवेक' का विस्तार दो।
असली कन्यादान वह है, जहाँ अज्ञान का दान हो,
जहाँ बेटी के भीतर, उसके अपने 'स्व' का भान हो।
वह किसी की अर्धांगिनी होने से पहले 'पूर्ण' बने,
वह भीड़ का हिस्सा नहीं, खुद में एक संपूर्ण बने।
(आचार्य प्रशांत से प्रेरित)-Shivraj Bhokare..✍️