Antarnihit 50 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 50

Featured Books
Categories
Share

अन्तर्निहित - 50

[50]

अपनी निर्दोषता सिद्ध होने पर वत्सर मन ही मन श्री कृष्ण का धन्यवाद करते हुए स्तुति करने लगा। न्यायालय के प्रांगण में स्थित एक पीपल वृक्ष के नीचे पद्मासन में आँखें बंद कर बैठे वत्सर को येला ने देखा। उसे इस अवस्था में देखकर वह रुकी, प्रतीक्षा करने लगी। जब वत्सर ने अपनी स्तुति सम्पन्न की तो आँखें खोली। उसने सम्मुख येला को पाया। 

“येला?” भाववश वह और कुछ बोल नहीं पाया। 

“वत्सर। मैं आज अत्यंत प्रसन्न हूँ किन्तु ग्लानि भी हो रही है कि मेरे कारण तुम्हें इतनी कष्ट से भरी यातना भुगतनी पड़ी। मैं इसके लिए क्षमा की प्रार्थना लेकर आई हूँ।”

“अरे ! नहीं, नहीं। ऐसी कोई बात नहीं है।”

“है, वत्सर है। यदि मैं उत्साह में आकर उस शिल्प के विषय में शैल को नहीं बताती तो तुम इस कांड से कभी नहीं जुडते और इतना कष्ट भोगना नहीं पड़ता।”

“यदि तुम न बताती तो उस शिल्प के विषय में हमारे मित्र सपन वह काम कर देते। तब भी यही होता। अत: स्वयं को दोष न दो। यह सारा चक्र नियति का है। उसे सहर्ष स्वीकार लेने में ही श्रेय है।”

“तुम्हारे स्तर पर मैं अभी नहीं पहुंची हूँ। अभी मेरी साधना इतनी परिपक्व नहीं हुई है। अत: मन में ग्लानि और दु:ख होना स्वाभाविक है।”

“चलो छोड़ो उसे। यह बताओ कि शिल्प शाला कैसे चल रही है? कैसे कैसे शिल्पों के तपस्वी वहाँ शिल्प रच रहे हैं?”

“उसका उत्तर तो यही है वत्सर कि शब्द से इसका वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ। क्यों न तुम स्वयं आकर देख लेते? चलो मेरे साथ।” येला ने उत्साह और प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा। 

“उसे देखने को मेरा भी मन कर रहा है किन्तु इस समय नहीं। पश्चात कभी आऊँगा।” 

“इस समय से श्रेष्ठ समय कौन सा हो सकता है, वत्सर?”

“यह समय ही श्रेष्ठ है। किन्तु इस समय मुझे मेरे श्रीकृष्ण के पास जाना है। इतने दिनों से मेरा कृष्ण मंदिर में बंद है। पूजा, अर्चना, आरती आदि से वह वंचित है। उसे बाँसुरी भी कौन सुनाता होगा? ऐसे में मेरा वहाँ जाना आवश्यक है।”

“वहाँ जाने से मैं नहीं रोकूँगी किन्तु पश्चात तो तुम आ सकते हो। बोलो कब आओगे?”

“जब कृष्ण का आदेश होगा चला आऊँगा।”

“जय श्री कृष्ण।”

“जय श्री कृष्ण।”

येला का अभिवादन कर वत्सर जाने लगा तब शैल ने वत्सर को पुकारा, “जय श्री कृष्ण।” वत्सर शैल को उत्तर दे उससे पूर्व सारा ने भी कहा, “जय श्री कृष्ण” वत्सर ने दोनों का ‘जय श्री कृष्ण’ से अभिवादन किया। 

“तुम जा रहे हो? कब?”

“शिघ्र ही जाना होगा मुझे शैल।”

“हम दोनों भी तुम्हारी क्षमा याचना करते हैं।” सारा शैल ने हाथ जोड़े। 

“आप दोनों ऐसा न करें। कृपा करके ऐसा न कहें। जो समय व्यतीत हो चुका है उसकी विस्मृति ही उत्तम होती है। आप सभी प्रसन्न होकर मुझे गमन की अनुमति दें। जय श्री कृष्ण।” 

येला, सारा और शैल को छोड़कर वत्सर ने प्रस्थान किया। सब उसे जाते हुए देखते रहे। कुछ क्षण तक कोई कुछ भी बोलने चालने की स्थिति में नहीं था। 

“मैं भी चलती हूँ।” येला ने स्वस्थ होकर कहा। 

“पुन: मिलेंगे।” सारा ने कहा। 

“पुलिस से पुन: भेंट न हो तो ही उचित है।” शैल ने कहा। 

येला ने स्मित से उत्तर दिया और अपने गंतव्य के लिए चल पड़ी। 

“हम भी चलें अब?” शैल ने कहा। 

“कहाँ?”

“हमारे कार्यालय में। कुछ औपचारिकताएं हमें सम्पन्न करनी होगी।”

“पश्चात मुझे भारत छोड़कर पाकिस्तान लौटना पड़ेगा, हैं न?” सारा ने एक लंबा श्वास छोड़ते हुए कहा। शैल सारा की पीड़ा समझते हुए भी मौन रहा। किन्तु उसके मन में सारा की व्यथा को लेकर चिंतन प्रारंभ हो गया।