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“दो दिन पूर्व मेरे कार्यालय में सपन और निहारिका के साथ कपिल महोदय भी आए थे। उन्होंने मुझे उनकी इच्छानुसार, वत्सर को दोषी सिद्ध करे ऐसे परिणामों को बनाने को कहा था। मैंने वैसे ही परिणाम बनाए, उन्हें दिखाए भी। पढ़कर वे तीनों संतुष्ट हो गए। तब मैंने उस पर हस्ताक्षर कर, आवरण में बंद कर उस पर हमारी मुद्रा अंकित कर दी। तीनों कार्यालय से विदा हो गए। ऐसा करने के लिए उन्होंने मुझे तथा मेरे साथियों को लोभ – लालच भी दिया। किन्तु मैंने और विकास ने वास्तविक परिणाम ही न्यायालय में प्रस्तुत किए। सभी परीक्षणों का जीवंत मुद्रण होता है और उनके आधार पर ही परिणाम बनते हैं इस बात को कपिल महोदय जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता भी भूल गए। हमने वही परिणाम प्रस्तुत किए हैं जो सत्य है, जो आपके समक्ष है। सारे परीक्षणों की प्रक्रिया का जीवंत मुद्रण भी उपलब्ध है। यदि न्यायालय चाहे तो प्रस्तुत किए जाएंगे।” विनय ने सभी कथा कह डाली।
सारी बातों को ध्यान से और धैर्य के साथ सुन रहे भूपेन्द्र सहसा क्रोधित हो गए, “कपिल महोदय, विनय ने जो कहा वह सत्य है?”
“जी।” लज्जित होकर कपिल ने कहा।
“सपन और निहारिका कहाँ है?” भूपेन्द्र ने उन्हे खोजा।
अपने नाम सुनकर दोनों भागने लगे। शैल और सारा ने उन्हें पकड़ लिया।
“दोनों को बंदी बनाने का पुलिस को आदेश देता हूँ।” सपन और निहारिका को पुलिस ने पकड़कर बंदी बना दिया। “न्यायालय से बाहर ले जाया जाए। सात दिनों तक कारावास में रखा जाए। उसके लिए कोई जमानत नहीं होगी।” उन्हें बाहर ले जाया गया।
“कपिल महोदय, आपकी सभी चेष्टाएं न्याय तंत्र के लिए कलंक हैं। आप ही कहें आप पर कौन सा दंड उचित रहेगा?”
कपिल मौन ही रहा।
“यह न्यायालय आदेश देता है कि वरिष्ठ एवं ज्ञानी अधिवक्ता कपिल महोदय को तीन मास कारावास में रखा जाए। यह दंड बिना जमानत पात्र है। कारावास समाप्त होने के पश्चात अगले तीन महिनों तक किसी भी कांड में वह किसी भी न्यायालय में उपस्थित होकर किसीका भी पक्ष नहीं रख सकेंगे। इसमें कुछ भी चूक हुई तो दंड दुगुना कर दिया जाएगा।”
दंड सुनकर कपिल ने कहा, “दया, महाशय दया। मैं मेरे अपराधों के लिए लज्जित हूं। आपसे दया की प्रार्थना करता हूँ।” कपिल ने हाथ जोड़ दिए।
“महोदय, एक व्यक्ति जिसने कोई अपराध नहीं किया है उसे दंड, मृत्यु दंड देने के लिए अभी तो आप कूद रहे थे। उस पर तो कोई दयाभाव नहीं रखा आपने। और आपने इतने सारे अपराध किए हैं और आप दंड से मुक्ति चाहते हैं? आपके अपराध क्षमा के योग्य है ही नहीं। किसी निर्दोष को दोषित सिद्ध करने का आपका प्रयास निंदनीय है। अत: इस दंड का सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लें। अब कोई प्रार्थना करोगे तो अधिक कठोर दंड दिया जाएगा। पुलिस को आदेश दिया जाता है कि अधिवक्ता कपिल को बंदी बना लिया जाए।”
कपिल को बंदी बनाकर बाहर ले जा रहे थे तभी कपिल ने कहा, “महाशय, मैं आपके इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती दूंगा। देख लेना।” कपिल को बाहर ले जाया गया।
जब तक यह हो रहा था, समग्र न्यायालय में पहाड़ों की कन्दराओं के समान शांति व्याप्त रही। कोई कुछ नहीं बोला, न कोई हिला।
“मैं अपना आदेश, निर्णय घोषित करूँ उससे पूर्व किसी को कुछ कहना हो तो स्वागत है।” भूपेन्द्र ने कहा।
“मैं कुछ कहना चाहता हूँ।” राहुल ने कहा।
“कहो महोदय।”
“महाशय, अभी भी मेरा यह मत है कि वत्सर ही इस हत्या का दोषी है।”
“इतनी सारी प्रक्रिया के उपरांत भी ऐसा क्यों लगता है? अभी भी कोई महत्वपूर्ण प्रमाण है आपके पास?”
“प्रमाण तो कोई नहीं है किन्तु ...।”
“किन्तु क्या?”
“तर्क है मेरे पास जो वत्सर को दोषित सिद्ध कर देगा। अपना तर्क रखने की अनुमति चाहता हूँ।”
“प्रस्तुत करें।”
“धन्यवाद महाशय। वत्सर को ध्यान से देखें। वह कृष्ण के मंदिर का पुजारी है। माथे पर चोटी है। साधु से वस्त्र हैं। गले में और हाथ में रुद्राक्ष की माला है। माथे पर तिलक है। कलाई में कलावा है। है न?”
“हैं। तो?”
“ऊपर से ज्ञानी भी है, चतुर भी है। और सबसे बड़ी बात कि वह हिन्दू भी है।” सोनिया ने कहा।
“इन सबसे क्या तात्पर्य है?”
“यही कि ऐसा चरित्र वाला व्यक्ति ही वास्तव में अपने इस परिवेश में छिपकर किसी अवैध कार्य जैसे चोरी, लुंट, हत्या आदि कार्य करता है। वत्सर ने भी यही किया है।”
“ऐसा चरित्र तो उत्तम माना जाता है। वह हत्या कैसे कर सकता है?”
“ऐसा चरित्र ही हत्या कर सकता है।”
“किस आधार पर ऐसा कह रहे हो?”
“अधिकांश फिल्मों में, कथाओं में ऐसे ढोंगी व्यक्तियों द्वारा ही सभी अपराध किए जाते हैं ऐसा हमने देखा है। अत: वत्सर भी ...।”
“राहुल और सोनिया अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं यह स्पष्ट दिख रहा है। महाशय, यदि इन दोनों का तर्क स्वीकार कर लिया जाए तो फिल्मों में यह भी दिखाया जाता है कि अधिकांश पुलिसवाले भी सभी अवैध कार्यों में सहयोगी होते हैं, भ्रष्ट होते हैं, देश के शत्रु के साथ मिले होते हैं। इस आधार पर राहुल और सोनिया को ही मीरा हत्या के दोषी क्यों न माना जाए?” हरीश ने सशक्त प्रत्युत्तर दिया।
“हरीश महोदय के तर्क का कोई उत्तर है आपके पास, राहुल और सोनिया?”
“नहीं।” दोनों मौन हो गए।
“न्यायालय सदैव प्रमाणों के आधार पर निर्णय करता है। किसी फिल्म की कथाओं के आधार पर नहीं।”
“तथापि मीरा की हत्या हुई है तो प्रश्न यही है कि यदि वत्सर ने हत्या नहीं की है हत्या किसने की है, वत्सर?” सोनिया ने पूछा।
“आप मुझसे क्यों पुछ रही हो? हत्या किसने की यह खोजने का कार्य मेरा नहीं है, आपका है।”
“महाशय, पुलिस अपना कार्य सुचारु ढंग से नहीं कर रही है और वत्सर पर उसका दायित्व डालने का प्रयास कर रही है। यह निंदनीय है। वत्सर दोषित नहीं होते हुए भी इस न्यायालय में अभियोग सह रहा है। क्यों? पुलिस की त्रुटि के कारण ही।” हरीश ने कहा।
“महोदय, पुलिस की अक्षमता के कारण ही वत्सर जैसे निर्दोष पर अभियोग चल रहा है। पुलिस तर्कहीन बातों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रही है। न्यायलय का समय व्यर्थ नष्ट कर रही है। शैल जैसे निष्ठावान पुलिस कर्मी को निलंबित किया जाता है। निष्ठापूर्वक चल रहे अन्वेषण से शैल को हटाया जाता है। हमारे अतिथि समान सारा उलफ़त को भी इस कांड से हटाकर हमने न केवल अपरिपक्वता अपितु स्त्री दाक्षिण्य के अभाव का परिचय समग्र विश्व को दिया है। यह सब अक्षम्य है। अत: यह न्यायालय आदेश करता है कि राहुल और सोनिया को पने दायित्व से त्वरित प्रभाव से निलंबित किया जाए। मीरा कांड को अनसुलझे रहस्य के रूप में स्वीकार करते हुए सम्पन्न मानकर बंद किया जाए। शैल का निलंबन निरस्त किया जाए। सारा उलफ़त को ससम्मान पाकिस्तान भेजने का प्रबंध किया जाए। वत्सर को निर्दोष मुक्त किया जाए। नदीम का स्थानांतरण किया जाए। न्यायालय के इस आदेश का त्वरित पालन किया जाए।” भूपेन्द्र ने निर्णय सुनाया और विदा हो गए।
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