Antarnihit 45 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 45

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अन्तर्निहित - 45

[45]

“कपिल महोदय, और कोई तर्क है क्या?” या इस बात को यहाँ सम्पन्न मानकर स्वीकार कर लें कि राधाजी का कोई साकार अस्तित्व नहीं था?”

कपिल निरुत्तर रहा। 

“यदि अन्य कोई इस विषय में अपना पक्ष रखना चाहता हो तो उसका स्वागत है।” न्यायाधीश के इस आह्वान पर उपस्थित जनसमूह में बातें होने लगी। कोई पक्ष रखने के लिए प्रस्तुत नहीं हुआ। 

“तो यह मान लिया जाता है कि इस विषय में अब किसी को कुछ नहीं कहना।”

“मैं कुछ कहना चाहती हूँ।” स्वयं न्यायाधीश की पत्नी ने कहा। उसकी तरफ देखकर न्यायाधीश भूपेन्द्र ने कहा, “वत्सर। यह स्त्री मेरी पत्नी भद्रा है। इस कांड में उसके द्वारा पक्ष रखना न्यायोचित नहीं है। आप चाहो तो उसे रोक सकते हो अथवा उसे पक्ष रखने की अनुमति देकर मेरे लिए NOT BEFORE ME 

कर सकते हो जिससे मैं इस कांड से पृथक हो जाऊंगा। कोई अन्य न्यायाधीश इस कांड का न्याय करेगा। आप कौन से विकल्प को पसंद करेंगे?”

“वत्सर, यह हमारा अधिकार है। आप चाहो तो हम न्यायाधीश बदल सकते हैं।” हरीश ने वत्सर को कहा। 

“वैसे तो मुझे इस विकल्प का थोड़ा ज्ञान है तथापि मैं NOT BEFORE ME  विकल्प का प्रयोग नहीं करना चाहता।”

“एक बार पुन: विचार कर लो, वत्सर।” हरिश ने कहा। 

“जी, मैं अपने निर्णय पर स्थिर हूँ। मुझे न्यायाधीश पत्नी के तर्क से कोई आपत्ति नहीं है।” वत्सर ने अनुमति दे दी। 

“ठीक है। आप अपना पक्ष रख सकती हो।” नयाधीश ने कहा। 

भद्रा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, “श्रीमद भागवत कथा श्री शूकदेवजी ने महाराज परीक्षित को सुनाई थी। यह सर्व विदित है। यह भी सर्व विदित है कि परीक्षित महाराज के पास केवल सात दिनों का समय था। इतने समय में श्री शूकदेवजी को पूरी भागवत कथा सुनाकर परीक्षित महाराज को मोक्ष प्राप्त हो ऐसा कार्य करना था। एक और बात, राधा रानी जी श्री शूकदेवजी की अध्यात्म गुरु थी। कहा जाता है कि जब भी शूकदेवजी अपनी गुरु राधा का स्मरण मात्र भी करते थे तब तब वह दीर्घ समाधि में चले जाते थे। इसलिए यदि परीक्षित महाराज को कथा सुनाते समय श्री शूकदेवजी द्वारा राधा रानी का स्मरण मात्र भी किया गया होता तो वे दीर्घ समाधि में चले जाते, सात दिनों का समय व्यर्थ ही व्यतीत हो जाता। परीक्षित मजाराज की मृत्यु साधारण मृत्यु बन जाती। उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता तब श्रीमद भागवत कथा का मूल हेतु ही सिद्ध न हो पाता। बस यही कारण है कि श्री शूकदेवजी ने भागवत करते हुए एक बार भी अपनी गुरु राधा रानी का स्मरण नहीं किया, न ही नाम का उल्लेख किया। इससे स्पष्ट है कि राधा का अस्तित्व था, श्री शूकदेवजी के गुरु के रूप में।” भद्रा ने अपनी बात पूर्ण करते हुए वत्सर के प्रति तीव्र कटाक्ष युक्त दृष्टिपात किया। वत्सर के मुख भाव स्थिर थे। प्रतीत होता था कि वह भद्रा के तर्क से लेश मात्र भी विचलित नहीं हुआ हो। 

“वत्सर, क्या तुम्हें उचित उत्तर मिल गया है?”

वत्सर ने सस्मित कहा, “सर्वप्रथम भद्राजी को मेरा प्रणाम।” वत्सर ने भद्रा को प्रणाम किया। 

“तर्क अत्यंत प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया गया है। मैं इस तर्क का सम्मान करता हूँ। किन्तु महाशय, यह तर्क सर्वथा मिथ्या है।”

“वह कैसे?” 

“माता जी, श्रीमद भागवत किसकी रचना है?”

“श्री शूकदेवजी ने कही है तो स्पष्ट है कि वह श्री शूकदेवजी की ही रचना है।”

“श्री शूकदेवजी ने परीक्षित महाराज को यह कथा सुनाई अवश्य ही है किन्तु वे इसके रचयिता नहीं है। इसकी रचना स्वयं महर्षि वेद व्यास जी ने की है। श्री शूकदेवजी ने तो केवल उसका कथा पान करवाया है, जैसे चेतन महाराज करते हैं। अत: यहाँ श्री शूकदेवजी की प्रत्यक्ष कोई भूमिका नहीं है। अत: राधाजी का नाम लेना, उनका दीर्घ समाधि में चले जाना, परीक्षित जी का मोक्ष से वंचित रह जाना आदि तर्क सिद्ध नहीं होते हैं।”

“किन्तु इससे राधा जी के न होने का प्रमाण तो नहीं मिलता।”

“होने का प्रमाण भी तो नहीं मिलता। न होने का तो स्वयं ही प्रमाण है। जो नहीं है उसका उल्लेख नहीं है। यदि राधाजी का अस्तित्व होता तो व्यासजी से इतनी बड़ी भूल कैसे हो गई कि वे इतने परम और महान पात्र का नाम तक लिखना भूल गए? क्या व्यास जी जैसे समर्थ रचयिता से यह भूल हो संभव है क्या?” 

“व्यास जी से ऐसी भूल की संभावना नहीं है। किन्तु राधा रानी एक महान गुरु थे यह बात तो वत्सर को माननी ही पड़ेगी।”

“चलो क्षणभर मान ली आपकी बात। तो जब भागवत काथा पूर्ण हो गई, परीक्षित महाराज का मोक्ष निश्चित हो गया तब तो शूकदेवजी अपने गुरु का नाम लेते, गुरु का धन्यवाद करते, अपने गुरु के प्रति आभार व्यक्त करते, पश्चात दीर्घ समाधि में चले जाते। किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ किया ही नहीं।” 

“किन्तु राधा जी उनकी गुरु थी यह बात सत्य है।”

“अर्थात राधा जी महान गुरु थी, प्राचीन विदुषी भी थी। हैं न भद्रा जी?”

“हाँ। नि:संदेह।”

“आप आस्तिक हैं या नास्तिक?”

“यह कैसा प्रश्न है? ऐसे प्रश्न का मेरे तर्क के उत्तर से क्या संबंध? ऐसा प्रश्न कर तुम मुझे भटकाना चाहते हो क्या?”

“जी नहीं मैया। भटकाना नहीं, मैं तो लक्ष्य तक ही ले जाना चाहता हूँ। अत: कृपया कर कहो कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक?”

“मैं कृष्ण भक्त हूँ तो आस्तिक ही हुई न?”

“आस्तिक की यह अवधारणा मिथ्या है।”

“वत्सर, ईश्वर में श्रद्धा रखने वाला आस्तिक ही होता है। तो यह मिथ्या कैसे है?” न्यायाधीश ने पूछा। 

“महाशय, आस्तिक और नास्तिक की परिभाषा के विषय में अनेक भ्रमणाएं व्याप्त है। यदि आप अनुमति दें तो इनकी सत्य परिभाषा प्रस्तुत करूँ।”

“अनुमति है।”

“आस्तिक वह है जो वेदों के ज्ञान को स्वीकार करता है। वेदों को ही प्रमाण मानता है। नास्तिक वह है जो वेदों का, वेदों के प्रमाणों का स्वीकार नहीं करता। इस प्रकार किसी भी बात को सिद्ध करना, उसका सत्य या असत्य होना आदि वेदों की कसौटी पर निर्भर होता है। ईश्वर को मानने या न मानने के साथ इसका कोई संबंध नहीं है।”

“स्वामीजी और महाराज जी। आप दोनों ज्ञानी हैं। तो कहिए की आस्तिक – नास्तिक विषय में वत्सर जो कह रहा है वह सत्य है या मिथ्या?”

“सत्य है।” दोनों ने एक साथ कहा। 

“तो कहो कि इस आधार पर आप आस्तिक हैं या नास्तिक, मैया?”

“मैं आस्तिक हूँ।”

“तो वेद के प्रमाणों को आप स्वीकार करोगी न?”

“अवश्य।”

“वेदों में अनेक विदुषियों के नाम और काम का वर्णन ऋषियों द्वारा किया गया है। उन विदुषियों के नाम बात सकती हैं आप?”

“गार्गी, अदिति, अरुंधती, घोषा आदि।”

“इतने ही नाम नहीं है। शची, शत्रुप, शाकल्य, संध्या, विश्वतारा, अपाला, तपती, लोपामुद्रा, मैत्रेयी, सिकता, रत्नावली, रोमशा, सुलभा, उशिज, प्रातिपेई, मदालसा, कामायनी, विलोमी, सावित्री, यमी, विश्वंभरा, देवयानी। इतनी सारी विदुषियाँ पूर्वकाल में हो गई। इनके विषय में वेदों में बातें लिखी हुई है। किन्तु कहीं भी राधारानी का उल्लेख नहीं है। क्या वेदों के ऋषियों से भी राधारानी के विषय में कोई चूक हो गई है? यदि राधारानी उत्तम गुरु होती, श्री शूकदेवजी की गुरु होती तो वेदों में तो उसका नाम अवश्य होता। वहाँ क्यों नहीं है?”

“मैं नहीं जानती।”