Antarnihit 44 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 44

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अन्तर्निहित - 44

[44]

न्यायालय का समय होते ही न्यायाधीश ने प्रवेश किया। उपस्थित जन समुदाय पर विहंगम दृष्टिपात किया। भागवत कथाकार चेतन महाराज, इस्कॉन के स्वामी जी सम्पूर्ण गोविंददासजी, अन्य व्यक्तियों के साथ साथ अपनी पत्नी एवं पुत्री को भूपेन्द्र ने देखा। उसने अपने मन को प्रश्न किया, ‘इन सबको झेल पाएगा वत्सर?’ 

उसने वत्सर को देखा। 

‘कितना शांत, स्थिर और निश्चिंत प्रतीत होता है! कितनी श्रद्धा, कितना विश्वास होगा उसे अपने तर्क पर, अपने कृष्ण पर?’

भूपेन्द्र ने स्थान ग्रहण किया। कार्यारंभ का संकेत किया। 

“महाशय, आज मैं देश के प्रखर भागवत कथाकार और प्रकांड ज्ञानी प. पु. श्री चेतन महाराज को प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हु।” कपिल ने कहा। 

“अनुमति है।”

“महाशय, मेरा नाम चेतन महाराज है। मैं सत्ताईस वर्षों से भागवत कथा करता रहा हूँ। अब तक मैंने आठ सौ से अधिक कथा की है। भागवत के एक एक श्लोक, एक एक शब्द मुझे पूर्ण कंठस्थ है। प्रश्न यह है न कि श्रीमद भागवत में राधा रानी का उल्लेख है कि नहीं। हैं न वत्सर?”

“महाराज, यह प्रश्न नहीं है, सत्य है कि राधा जी का उल्लेख कहीं नहीं है।”

“मैं प्रमाण देता हूँ, भागवत के ही एक श्लोक से। भागवत के अष्टम स्कन्ध के दसवें अध्याय का चालीसवाँ श्लोक है कि ...।” 

महाराज उस श्लोक को बोले उससे पूर्व ही वत्सर उस श्लोक का उच्चारण करने लगा, 

“कबंधास्तत्र चोत्पेतु: पतितस्वशिरोक्षीभि: । 

उध्यतायुधदोरडंडैराधावंतों भटान मृधे ।। 

यही श्लोक न महाराज?”

अचंभित होकर महाराज बोले, “हां, हां। वही श्लोक। उसमें द्वितीय पंक्ति में राधावंतों शब्द है। वत्सर ने भी यही पाठ किया है। आप सभी ने भी उसे सुना है। इस प्रकार राधारानी का नाम होने का प्रमाण स्वयं वत्सर ने ही दे दिया है। इससे सिद्ध होता है कि श्रीमद भागवत में राधारानी का अस्तित्व है।” महाराज प्रसन्न होकर बोले। उसे देखकर कपिल भी प्रसन्नता से उत्साहित हो गए। 

“सत्य है, महाराज कि इस श्लोक में राधावंतो शब्द है।”

“तो अब क्या प्रमाण चाहिए?”

“प्रमाण का निर्णय करने से पूर्व एक प्रश्न पुछ सकता हूँ आपको, महाराज?”

“पूछो बालक।” महाराज स्वयं को गुरु होने का, ज्ञानी होने का अनुभव करने लगे। 

“क्या आप व्याकरण जानते हो?”

“कथाकार को व्याकरण की क्या आवश्यकता, बालक?”

“क्या आप व्याकरण जानते हैं?” वत्सर ने प्रश्न दोहराया। 

“नहीं।”

“कोई बात नहीं। क्या आप इस श्लोक का पूरा अर्थ जानते हैं?”

“भागवतकार हूँ। अर्थ जानता हूँ। सुनो, राधावन्त होकर कबंध ने आयुध उठाए। यही अर्थ है, वत्सर।”

“यह अर्थ नहीं, अनर्थ है। वहाँ राधावन्त शब्द से पूर्व दोरदंडै शब्द है। अत: व्याकरण की दृष्टि से शब्द दोरदंडै: अधोवन्त बनता है। जिसका अर्थ होता है – धोवन्त अर्थात दौड़कर । और तब पूरे श्लोक का अर्थ स्पष्ट होता है।”

“कैसा अर्थ?”

“जिस अध्याय का यह श्लोक है वह अष्टम स्कन्ध का दशम अध्याय है। उस अध्याय का नाम है – देवासुर संग्राम। देव और असुरों के मध्य हुए भीषण युद्ध की बात है उस अध्याय में। और इस श्लोक का अर्थ होता है – तब वहाँ बहुत से धड़, अपने कटकर गिरे हुए सिरों के नेत्रों से देखकर हाथों में शस्त्र उठाकर वीरों की ओर दौड़ने और उछलने लगे। - यही अर्थ है न महाराज?”

“मैं इतना गहन अध्ययन नहीं कर पाया, महाशय।” चेतन महाराज ने न्यायाधीश को कहा। 

“कोई बात नहीं, महाराज। इतना तो बता दो कि अष्टम स्कन्ध के दसवें अध्याय में देवासुर संग्राम की ही कथा है न?”

महाराज ने श्रीमद भागवत की बड़ी सी पुस्तक खोली, पन्ने पलटकर खोजने लगे। कुछ समय पश्चात बोले, “हाँ महाशय। वह देवासुर संग्राम का ही अध्याय है।”

“देवासुर संग्राम में राधा जी का क्या काम? उस भीषण संग्राम से राधारानी का क्या संबंध है महाराज?”

“वह तो महाशय, ऐसा, संबंध तो ...।” महाराज की वाणी ने उसका साथ छोड़ दिया। मौन होकर वह बैठ गए। 

“महाशय, पूरे भागवत ग्रंथ में केवल एकबार राधावंतो शब्द प्रयोग हुआ है जो संधि के नियम अनुसार राधा नहीं किन्तु आधावंतो है। और यह शब्द देवासुर संग्राम के वर्णन में प्रयुक्त हुआ है। क्या इससे किसी राधा के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है?” 

“महाराज, वत्सर के प्रश्न का उत्तर दीजिए।” न्यायाधीश की बात का ऊतर देते हुए चेतन महाराज ने कहा, “मैं अनुत्तर हूँ।” 

“तो कपिल महोदय, क्या यह मान लिया जाए कि वत्सर का तर्क सत्य है और राधा नाम के किसी व्यक्ति का अस्तित्व नहीं है और न ही उसका श्री कृष्ण से कोई संबंध है?”

“इस समय तो मेरे पास कोई तर्क नहीं है, महाशय।” कपिल ने चेतन महाराज की तरफ तिरस्कार दृष्टि से देखा। 

“तो यह सिद्ध होता है कि राधा का अस्तित्व ...।”

“रुकिए महाशय। अभी किसी निर्णय पर नहीं आ सकते हैं।” कपिल ने सहसा स्वामी सम्पूर्ण गोविंददास जी को देखकर उसे अपना तर्क रखने के लिए संकेत किया। 

स्वामीजी उठे और कहा, “गीताजी में स्वयं श्रीकृष्ण ने अपने मुख से राधा जी के होने का प्रमाण दिया है। अनुमति हो तो वह श्लोक पढ़ूँ?” 

न्यायाधिश ने वत्सर की तरफ देखा। संकेतों में वत्सर ने सम्मति प्रदान की। 

“कहो स्वामी जी।”

“गीताजी के नवें अध्याय के तेरहवें श्लोक में भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं कि – 

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता: । 

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम । । 

जिसका अर्थ है, ही पार्थ ! महान आत्माएं जो मेरी दिव्य शक्ति का आश्रय लेती हैं वे मुझे समस्त सृष्टि के उद्गम के रूप में जान लेती हैं। वे अपने मन को केवल मुझ में स्थिर कर अनन्य भक्ति करते हैं।”

“स्वामीजी, इसमें राधारानी का उल्लेख कहाँ है?”

“है, महाशय है। श्रीकृष्ण स्वयं जिस दिव्य शक्ति की बात कर रहे हैं वह शक्ति कोई और नहीं स्वयं योगमाया है। जो गोपनीय रूप से राधा का ही संकेत है।”

“स्वामीजी, यह योगमाया, यह दिव्य शक्ति जिसकी महिमा स्वयं कृष्णजी कर रहे हैं वह शक्ति साकार है या निराकार?” वत्सर ने पूछा। 

“बालक वत्सर, शक्तियां कभी साकार नहीं होती। वह तो चेतन होती है। निराकार ही होती है।”

“सहमत हूँ, स्वामीजी। यदि यह शक्ति के द्वारा राधारानी का संकेत कृष्ण करते हैं तो वह राधारानी तो निराकार हुई ना?”

“अवश्य, वत्सर।”

“तो वह राधारानी देहधारी बनकर श्री कृष्ण की प्रेयसी, विरहिणी स्त्री कैसे बन गई?”

स्वामीजी इस प्रश्न की अपेक्षा में नहीं थे। अत: मौन हो गए। कपिल ने उसकी तरफ देखा जिसमें स्पष्ट आदेश था कि वत्सर के तर्क को काटकर कोई उत्तर दिया जाए। 

‘मेरे पास कोई उत्तर नहीं है, मैं क्या कहूँ?’ स्वामीजी ने मौन ही कपिल को संकेत कर दिया। 

“स्वामीजी, कुछ कहना चाहोगे वत्सर की बात के उत्तर में?” 

“नहीं महाशय।” स्वामीजी ने स्वयं को उस चर्चा से पृथक करते हुए कहा।