Antarnihit 42 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 42

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अन्तर्निहित - 42

[42]

“कपिल महोदय, क्या प्रमाण लेकर आज ऊपस्थित हुए हो?” न्यायाधीश ने पूछा। 

“महाशय, कभी कभी व्यक्ति का चरित्र ही स्वयं प्रमाण होता है। तब अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।”

“क्या कहना चाहते हो?”

“मैं कुछ दिखाना चाहता हूँ।” कपिल ने वत्सर के मंदिर के भीतरी भाग का चलचित्र प्रस्तुत किया। कृष्ण की प्रतिमा पर उसे रोक दिया। 

“यह वत्सर के मंदिर का दृश्य है। इस मंदिर को स्वयं वत्सर ने अपने हाथों से बनाया है। शिल्पकार वत्सर ने! मैं सत्य कह रहा हूँ न वत्सर?”

“जी।”

“महाशय, समग्र भारत में और अन्य देशों में कृष्ण के सेंकड़ों हजारों मंदिर हैं। आपने भी अनेक मंदिर देखे होंगे।”

“महोदय, रुकिए। कृष्ण नहीं कहते, श्री कृष्ण कहते हैं।”

“जी महाशय। श्री कृष्ण के मंदिरों की एक विशेषता रही है जो सभी मंदिरों में बराबर से देखी जाती है।”

“कौन सी विशेषता?”

“उन सभी मंदिरों में श्रीकृष्ण कभी अकेले नहीं होते हैं। श्रीकृष्ण के साथ सदैव कोई होता है। किसी की प्रतिमा होती है।”

“हाँ, देखा है।”

“वह प्रतिमा राधा जी की होती है। अब इस मंदिर में स्थित श्रीकृष्ण की प्रतिमा को देखिए। यहाँ श्रीकृष्ण अकेले हैं, राधा जी कहीं नहीं है। राधा जी की प्रतिमा क्यों नहीं है?”

“हो सकता है कि यह मंदिर अभी अपूर्ण हो। पूर्ण होने पर वह प्रतिमा भी लग जाएगी।” हरीश ने वत्सर की तरफ से तर्क दिया। 

“नहीं महोदय। यह मंदिर पूर्ण हो चुका है। और राधा जी की प्रतिमा सर्जन का कार्य कहीं नहीं चल रहा। उपरांत इस मंदिर में श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समीप किसी प्रतिमा के लिए कोई स्थान भी नहीं छोड़ गया है।”

“वत्सर, क्या यह सत्य है?” भूपेन्द्र ने पूछा। 

“जी, सत्य है महाशय।”

“किन्तु इससे क्या सिद्ध करना चाहते हो, महोदय?”

“यही कि वत्सर को स्त्रीयों से घृणा है। इसी कारण राधा जी की प्रतिमा इस मंदिर में नहीं है। यही इसका चरित्र है। यही कारण है कि वत्सर ने मीरा की हत्या की है।”

“यह कोई तर्क नहीं है, महोदय।” हरीश ने कपिल की बात काट दी। 

“तो राधा जी की प्रतिमा न होने का अन्य क्या तात्पर्य हो सकता है?” कपिल ने कहा। 

“तात्पर्य तो हो सकता है कि ...।” हरीश की बात को रोकते हिए वत्सर ने कहा, “क्षमा चाहता हूँ, महोदय। इस प्रश्न का, इस तर्क का उत्तर मैं ही दूंगा। यह बात मेरे श्रीकृष्ण की है।”

हरीश मौन हो गए। स्थान पर बैठ गए। 

“कहिए वत्सर। क्या कारण है कि आपने राधा जी की प्रतिमा क्यों नहीं रची? क्यों उसे मंदिर में नहीं लगाई? क्यों मीरा की हत्या की?” कपिल ने एकसाथ अनेक प्रश्न वत्सर पर छोड़ दिए। मन ही मन अपने प्रश्नों पर प्रसन्न होने लगा, ‘अब इसके पास कोई उत्तर नहीं होगा। यहीं फंस गया। मेरी जीत हो गई है।’ उसने विजयी मुद्रा से नदीम को देखा। 

तभी वत्सर ने कहा, “महाशय। मैं एक प्रश्न कपिल महोदय से पूछना चाहता हूँ।”

न्यायाधीश ने अनुमति दे दी। 

“महोदय, आपकी जेब में सदैव एक चित्र रहता है। उसे न्यायालय को दिखाएंगे?” कपिल ने एक क्षण तीव्र दृष्टि वत्सर पर डाली और डिगमूढ़ सा खड़ा रहा। 

“महोदय, वत्सर ने जो कहा वह चित्र न्यायालय को दिखाइए।” 

कपिल ने विवश होकर वह चित्र न्यायाधिश को दिखाया। 

“वत्सर, क्या है इस चित्र में? इस चित्र का क्या तर्क है? क्या औचित्य है?” न्यायाधीश ने पूछा।  

“महोदय, इस चित्र में आपके साथ कौन है?” वत्सर ने पूछा। 

“मेरी पत्नी है।”

“अर्थात आप विवाहित हैं। कितना समय हो गया आपके विवाह को?”

“छबीस वर्ष।”

“इस चित्र में आपकी पत्नी तो है ही किन्तु कोई संतान क्यों नहीं है?”

आघात से कपिल क्षणभर विचलित हो गया। दो चार घूंट पानी पिया, स्वस्थ हुआ और बोला, “ईस चित्र में मेरी संतान का चित्र नहीं है क्यों कि मेरी कोई संतान नहीं है। मैं संतान हीन हूँ। जो नहीं है उसे मैं कहाँ से लाऊँ? जो नहीं है उसका चित्र नहीं होता है इतनी सी बात वत्सर जानता ही होगा।” कहते कहते कपिल टूट गया, रो पडा। संतानहीन होने की पीड़ा से आज वर्षों के पश्चात वह आहत हो गया। अपने स्थान पर बैठ गया। दीर्घ श्वास लेते हुए पानी पीने लगा। 

“वत्सर, जो नहीं है उसका चित्र नहीं हो सकता। यह स्पष्ट बात है। इससे क्या कहना चाहते हो?” न्यायाधीश ने वत्सर से पूछा। 

“मेरा भी कहना यही है जो कपिल जी ने कहा, जैसे कि आपने भी अभी अभी पुष्टि की है। जो नहीं है उसका चित्र नहीं होता है। इसी प्रकार जो नहीं है उसकी प्रतिमा भी नहीं होती है।” वत्सर ने कहा।

“क्या? क्या कह रहे हो वत्सर?” नयाधीश ने व्याकुल होकर पूछा। 

“यही महाशय कि राधा नाम की कोई व्यक्ति है ही नहीं जिसकी प्रतिमा श्रीकृष्ण के साथ रखी जाए।”

“महाशय, वत्सर अब कुछ भी कहे जा रहा है। हमारे शास्त्र, हमारी साहित्य रचनाएं, कविताएं, चित्र, गीत-संगीत, सभी का अपमान कर रहा है वत्सर।” कपिल उत्तेजित हो गया। 

“कपिल जी, आप तो स्वयं श्रीकृष्ण जी के अस्तित्व को भी सर्वोच्च न्यायालय में अस्वीकार कर चुके हो। आपके अनुसार श्री कृष्ण तो काल्पनिक हैं। तो अब राधा जी के नाम पर इतना तर्क क्यों कर रहे हो?” हरीश ने अवसर देखकर कपिल पर प्रहार कर दिया।

“वह भिन्न बात है, हरीश महोदय। अभी तो हम इस पर ही बात करें?” कपिल ने आगे बात रखी, “राधा जी की अनेक कथाएं हैं। अनेक शास्त्रों में राधा कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है। अनगिनत कवीयों की हजारों कविताओं और गीतों में राधा जी का वर्णन है। श्रीकृष्ण की कथा करने वाले प्रत्येक कथाकार व्यासपीठ से राधा जी का श्रीकृष्ण के साथ जो संबंध है उसकी कथा कहते हैं। व्रज क्षेत्र में, वृंदावन में अनेक स्थानों पर राधा जी के प्रमाण हैं। इतना सब होने के उपरांत भी तुम कह रहे हो कि राधा जी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। क्या वह सब असत्य है? यदि राधा जी का अस्तित्व नहीं है तो श्रीकृष्ण का भी कोई औचित्य नहीं हो सकता। राधा विण कृष्ण के उपासक हो तुम?

महाशय, मुझे तो प्रतीत हो रहा है कि वत्सर वास्तव में पागल हो गया है या पागल होने का नाटक कर रहा है। मीरा के हत्या कांड से न्यायालय को भटका रहा है। इस पर किसी प्रकार की दया न रखते हुए कडे से कडा दंड दिया जाए।” कपिल ने उत्साह में सबकुछ कह डाला। अपने विजय को निश्चित मानने लगा। उसके मुख पर कटु स्मित आ गया। तिरछी दृष्टि से हरीश को देखने लगा। 

“वत्सर, तुम राधा जी के अस्तित्व का अस्वीकार करते हुए सनातन इतिहास की अवगणना कर रहे हो। शास्त्रों का और स्वयं श्रीकृष्ण का अपमान कर रहे हो। यह बात आघातपूर्ण है। राधा जी के होने के हजारों प्रमाण हैं, तो उनके न होने की बात कैसे मान ली जाए?” स्वयं नयाधीश भी वत्सर से क्रुद्ध हो गए तथापि बड़े संयम से उसने पूछा। 

“यह केवल तर्क का विषय नहीं है महाशय। वास्तव में राधा जी का कोई अस्तित्व नहीं है।”

“क्या प्रमाण है तुम्हारे पास?”

“स्वयं श्रीमद भागवत महापुरण इस बात का प्रमाण है।”

“वह कैसे?”