Antarnihit 41 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 41

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अन्तर्निहित - 41

[41]

राहुल, नदीम, सोनिया, कपिल, सपन, निहारिका। सभी एक कक्ष में बैठकर न्यायालय द्वारा दिए गए तीन दिनों के समय में क्या करना है उसकी गंभीर चर्चा में लग गए। 

“इन तीन दिनों में कौन सा प्रमाण प्रस्तुत करेंगे, कपिल जी?” नदिम ने चिंता से पूछा। 

“वैसे तो कोई प्रमाण है ही कहाँ?” कपिल ने कहा। 

“राहुल और सोनिया। कुछ करो और कोई ठोस प्रमाण कपिल जी को दो।”

“किन्तु कोई प्रमाण मिले तो न?” सोनिया ने कहा। 

“बिना प्रमाण के मैं कुछ नहीं कर सकता।”

“आपको पैसे दिए गए है, आपने मांगे थे उतने सारे दिए हैं। तो आपको ही इसमें कुछ करना होगा।” नदीम ने पैसों का प्रभाव प्रकट किया। 

“न्यायालय में मुझे आपकी बात और आपके तर्क रखने के लिए पैसे दिए गए हैं। अधिवक्ता हूँ मैं, खोजी पुलिसकर्मी नहीं। न ही अन्वेषण मेरा काम है। प्रमाण लाना मेरा काम नहीं है।”

“किन्तु आप ...।?”

“यदि आप मुझ पर अनावश्यक दबाव डालोगे तो मैं सबको बता दूंगा कि आपने मुझे जो पैसा दिया है वह कहाँ से आया है और किसने दिया है। और इस अभियोग को भी छोड़ दूंगा।”

“कपिल जी, आप तो अप्रसन्न हो गए। हम सबके हाथ रंगे हुए हैं। इसलिए ऐसे आपस में लड़ते नहीं हैं। बैठिए न?” नदीम के कहने पर कपिल बैठ गया।  

“कपिल जी, अब क्या कर सकते हैं उस पर विचार करते हैं।” निहारिका ने कक्ष के तंग वातावरण को बदलने का प्रयास किया। 

“मुझे कुछ समय दीजिए। कुछ सोचता हूँ।” कपिल ने वातायन खोल दिया। हवा के कुछ टुकड़ों ने कक्ष में प्रवेश कर शीतलता प्रदान की। 

कपिल कुछ समय तक एक चित्त से दूर कहीं देखता रहा। किसी ने उसमें व्यवधान नहीं डाला। समय के एक अंश के व्यतीत होने पर वह बोला, “चलो, सब कुछ प्रारंभ से सोचते हैं, प्रारंभ से देखते हैं – चित्र, चलचित्र, रिपोर्ट आदि जो कुछ भी है। कदाचित वहीं से कोई प्रमाण प्राप्त हो जाए।”

“यह ठीक रहेगा।” सभी ने सम्मति और उत्साह प्रकट किया। 

सभी उस कक्ष में गए जहां मीरा घटना के सभी कागज – पत्र, अभिलेख आदि रखे थे। एक एक कर सब कुछ देखा गया, बार बार देखा गया। अंतत: कुछ भी कड़ी, कोई दिशा, कोई प्रमाण; कुछ भी नहीं मिला। 

“एक बार वत्सर के मंदिर के चित्र और चलचित्र पुन: देख लेते हैं।” कपिल ने सुझाया। 

सभी ने उन्हें पुन: देखा। कुछ हाथ न लगा। 

“मुझे एक युक्ति सूझ रही है, कपिल जी।” नदीम ने कहा। 

“कैसी युक्ति?”

“वत्सर के घर और मंदिर पर राहुल और सोनिया को भेज देते हैं। वहाँ कुछ ड्रग्स और हथियार रखवा देते हैं। राहुल-सोनिया उसे प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करेंगे। आप न्यायालय में कहना कि वत्सर का चरित्र ही ऐसा है। वह अवैध कार्य भी करता है तो उसके लिए किसी की हत्या करना कोई बड़ी बात नहीं है। बस सिद्ध हो जाएगा कि वत्सर ही अपराधी है।”

“असत्य प्रमाण उत्पन्न करना, उसे प्रस्तुत करना और न्याय प्रक्रिया को न्याय से विमुख करना हमारा चरित्र है यह मान लिया। हमने ऐसा अनेकों घटनाओं में किया है। किन्तु इस घटना में ऐसा करना हमारे काम नहीं आएगा। हो सकता है कि उलटा वह हमारे ही विरुद्ध प्रयुक्त हो। क्यों कि हरीश इसे शीघ्र ही  पहचान लेगा।”

“कैसे पहचान लेगा?” सपन ने पूछा। 

“यह बताओ कि राहुल और सोनिया वत्सर के मंदिर कब और कैसे जाएंगे?”

“हवाई यात्रा से। तीन दिनों में यही एक मार्ग है।”

“हरीश और उसके साथी हमारी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखे हुए हैं। जैसे ही यह दोनों यहाँ से निकलेंगे, हरीश सतर्क हो जाएगा। उसका साथी राहुल-सोनिया के पीछे लग जाएगा। वह सिद्ध कर देगा कि यह दोनों वहाँ कब गए थे? क्यों गए थे? क्या क्या किया था वहाँ जाकर?”

“उसे कैसे ज्ञात होगा?”

“आप लोग शैल और सारा का विस्मरण कर रहे हो।”

“उन्हें तो इस घटना से हटा दिया है।”

“वे दोनों मुक्त हैं। उनके अनेक साथी वत्सर के घर – गाँव-मंदिर के समीप घूम रहे हैं। स्मरण है न? क्या उन लोगों से यह दोनों बच पाएंगे? यदि उन्होंने राहुल – सोनिया का चलचित्र बनाकर न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया तो हम सब फँसेंगे।”

“न्यायाधीश भूपेन्द्र को हम मना लेंगे।” निहारिका ने कहा। 

“कैसे मनाओगे?”

“सरकार किसी की भी हो, तंत्र तो हमारा ही है।” नदीम ने अट्टहास्य किया। 

“तंत्र भले ही आपका हो, भूपेन्द्र आपके नहीं है, न कभी हो सकते हैं। उसकी प्रतिष्ठा, उसकी कार्यशैली भिन्न है।” कपिल ने कहा। 

“तो क्या करें?” क्षणभर पूर्व अट्टहास्य करनेवाले नदीम ने चिंतित होकर कहा। 

“अब कोई भी ऐसी किसी युक्ति नहीं बताएगा जिसे न्यायालय में प्रस्तुत करने पर हम सब फंस जाएँ।” कपिल ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया.

“तो?” सब एक साथ बोल पड़े।

“एक बार पुन: वत्सर के घर और मंदिर को देखते हैं।” कपिल ने कुछ सोचकर कहा। 

वत्सर के घर और मंदिर के चित्र- चलचित्र सब देखने लगे। एक बिन्दु पर कपिल ने कहा, “रुको। यहाँ पर रुको।” चलचित्र रुक गया। सब उत्साह और अपेक्षा से कपिल को देखने लगे। 

“यह देखो। यह कृष्ण का मंदिर है।” कपिल ने कहा। 

“वह तो सब जानते हैं।”

“ठीक है। देखो, उसमें क्या दिख रहा है?”

“कृष्ण की प्रतिमा।”

“बस, केवल कृष्ण की प्रतिमा, हैं न?” कपिल ने पूछा। 

“इस पर मैं कुछ युक्ति करूंगा। चलचित्र का यह भाग विशेष रूप से रख लो। इसकी अनेक प्रतियां बनाकर रखो। न्यायालय में इसे ही प्रस्तुत करेंगे।”

“किन्तु क्या होगा इससे?”

“एक तर्क लगाएंगे। हो सकता है काम बन जाए।”

“कैसा तर्क? कैसा काम?”

“वह न्यायालय में देख लेना, सुन लेना। भूपेन्द्र जैसा सनातनी न्यायाधीश भी मान जाएगा।”

“अभी बता दो न?” सोनिया ने नयन के कटाक्ष भरे भाव से कपिल को लिपटकर कहा। 

“अभी नहीं सोनिया जी। दीवारों को भी कान होते हैं, आँख भी। थोड़ी प्रतीक्षा करो।” कपिल ने कहा। सब बिखर गए।