Antarnihit - 29 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 29

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अन्तर्निहित - 29

29]

“आप?” दोनों ने एक साथ पूछा। 

“हाँ, मैं। इतने दिनों के समय में आप के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं है। अत: ...।”

“किन्तु हमारा प्रयास चल रह है।”

“प्रयास नहीं, परिणाम चाहिए हमें। शीघ्र ही।”

“और अभी भी पाँच दिन शेष हैं।”

“नहीं, सारा जी। इनसे कोई तर्क वितर्क न करें। हाँ तो नदीम महाशय, जो भी स्थिति है आपको विदित ही है। कहो, हमारे लिए क्या आदेश है?” शैल ने स्थिति को संभालने के लिए प्रयास किया। 

“अब आप दोनों को हम कोई आदेश नहीं देंगे।”

“अर्थात?” सारा ने संशय प्रकट किया। 

“इस घटना का अन्वेषण अब किसी अन्य को सौंप दिया गया है। आप दोनों को इससे मुक्त किया गया है। यह रहे आदेश।” नदीम ने एक पत्र दोनों को धर दिया। उस पत्र का तात्पर्य सारा और शैल भली भांति जानते थे। सारा ने चिंतित मुद्रा में शैल की तरफ देखा। शैल ने संकेतों से कहा, ‘शांत रहकर स्थिति को स्वीकार कर लो।’

सारा ने नदीम से पत्र ले लिया। 

“अब आप दोनों मुक्त हो। प्रकृति भी आपके साथ है। जितना चाहो आनंद प्रमोद कर लो। सारा, शैल का पूरा ध्यान रखना।”

नदीम के शब्दों में व्यंग के साथ ईर्ष्या भी थी। सारा उन शब्दों से उत्तेजित हो गई, नदीम की तरफ दौड़ गई, “क्या कहा? श्रीमान नदीम, अपनी विकृति का प्रदर्शन करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आ रही? ऐसे विकृत पुरुषों को केवल पाकिस्तान में ही देखे थे, अब यहाँ भी देख लिया। चाहूँ तो अभी इसी क्षण तुम्हें इन हाथों से पीट डालूँ, पुलिसवाली का हाथ है यह, आईएएस नदीम! एक बार पड गया तो उठने के योग्य भी नहीं रहोगे।” सारा का रौद्र रूप देखकर नदीम भयभीत हो गया। क्षण भर गहन श्वास लिया और पलटवार किया, “तुम इसी उद्देश्य से तो आई हो यहाँ। इसी काम के लिए तुम्हें तुम्हारी सरकार ने भेजा है। भारत के पुलिस और सेना के जवानों को अपने रूप की जाल में फँसाकर यहाँ से संवेदनशील एवं गोपनीय रहस्यों को अपने देश में भेज सको।”

नदीम की बात सुनकर सारा की सारी उत्तेजना ठंडी पड गई। कुछ बोल ही न पाई। 

“सीधे सीधे अपने देश चली जाओ, इसी में तुम्हारा हित है।” नदीम ने स्पष्ट कह दिया और वहाँ से चला गया। 

शैल इन बातों को सुनकर आघात में पड गया। सारा ने शैल की तरफ देखा। शैल ने अप्रसन्नता से मुंह घुमा लिया। वहाँ से वह चलने लगा। 

“शैल मेरी बात सुनो, मेरा विश्वास करो। मैंने ऐसा...।” सारा के शब्द हवा में विलीन हो गए। नदी के घोष में सारा का शब्दघोष लुप्त हो गया। शैल कहीं दूर चला गया। नदी के तट पर बैठकर सारा रोने लगी। तभी किसी ने रुमाल धर दिया। सारा ने उन हाथों को देखा, हाथवाले को देखा। 

“निहारिका जी, आप यहाँ?”

“जहां आप, वहाँ हम। लीजिए इस रुमाल से अश्रुओं को पोंछ डालिए।” 

सारा ने रुमाल के बिना ही अपने अश्रुओं को रोक लिया। मन को साहस दिया, स्वस्थ हो गई। समग्र घटना क्रम के पीछे के रहस्य को सारा ने क्षणभर में समज लिया। 

“सारा जी, हम आपकी सहायता कर सकते हैं। आप चाहो तो अभी भी मीरा की घटना के अन्वेषण से जुड़ी रह सकती हो।”

“इतनी बड़ी बात हो जाने पर ...।”

“बात हमने ही बिगाड़ी है, हम ही बना देंगे।”

“मुझ पर इतना घृणित आरोप?”

“क्या यह आरोप सत्य नहीं है?”

“सत्य था, अब नहीं है।”

“पुलिसवाले कभी भी अपनी योजना को छोड़ते नहीं है। कुछ समय तक भूल सकते हैं किन्तु समय आने पर उस योजना को पार लगा ही देते हैं।” सपन ने घाव पर नामक छिडा। सारा ने मौन रहना ही उचित समझा। 

“तो क्या बात बना दें? यहाँ के गुप्त दस्तावेजों एवं माहिती हम आप तक पहुँचा देंगे। आप उसे अपने देश भेज देना। स्वीकार है क्या?”

सपन के इस प्रस्ताव पर सारा ने क्रोध करना चाहा किन्तु वह शांत रही। 

“आपका मौन हमारा उत्साह बढ़ा रहा है।” निहारिका के इन शब्दों पर भी सारा मौन ही रही। 

“इसके लिए आपको छोटी सी कीमत चुकनी पड़ेगी। नदीम और कभी कभी मुझे प्रसन्न कर देना। तुम्हारा सारा काम हो जाएगा।” सपन के इन शब्दों से सारा की आँखों में तीव्र अग्नि और मुख पर तीव्र क्रोध प्रकट हो गया। उसे देख सपन और निहारिका वहाँ से चलने लगे। 

“इस पर विचार अवश्य करना।” जाते जाते निहारिका ने कहा। 

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“विजेंदर, मीरा घटना की सारी सामग्री लेकर आपको नदीम महाशय ने बुलाया है।” नदीम के इस संदेश को सुन विजेंदर सारी योजना को समझ गया। उसने शीघ्र ही शैल को फोन जोड़ा। फोन बंद पाया। विजेंदर ने पुन: लगाया, पुन: बंद पाया। 

विजेंदर ने सारा से संपर्क किया। “क्या बात है, विजेंदर?” सारा ने पूछा। 

“कुछ ठीक नहीं है। मुझे मीरा की सारी सामग्री के साथ नदीम महाशय ने बुलाया है। मेरा मन आशंकित हो रहा है।”

“तुम्हारी आशंका सत्य है। मीरा घटना से हम दोनों को हटा दिया है।”

“क्या?” 

“हं।”

“किसने बताया?”

“आज प्रात: स्वयं नदीम यहाँ आए थे। हमें हटाने का पत्र वह स्वयं दे गए हैं।”

“शैल महाशय कहाँ हैं? मैं उनसे बात करने का प्रयास कर रहा हूँ। उसका फोन बंद आ रहा है। उसे फोन दो, मेरी बात कराओ उससे।”

सारा ने पूरा प्रयास किया तथापि वह फोन पर ही रो पड़ी। 

“सारा जी, शैल महाशय कहाँ है?”

“मैं नहीं जानती।” 

“क्या?”

“कुछ बात पर मुझसे अप्रसन्न होकर कहीं चल गया है।” सारा निर्बाध रो पड़ी। विजेंदर ने उसे आश्वस्त करने का प्रयास किया किन्तु विफल। 

“अभी मध्याह्न हो गया है और अभी तक वह लौटा नहीं है। वह अब कभी नहीं लौटेगा।” 

“धैर्य रखो। मुझे अब जाना होगा। नदीम महाशय का दूसरी बार बुलावा आ गया है।” विजेंदर ने फोन रख दिया।