Antarnihit - 28 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 28

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अन्तर्निहित - 28

[28]

“तो अब आप पदयात्रा पर जाना चाहते हो श्रीमान शैल?” अधिकारी ने व्यंग रचा। शैल ने उस व्यंग को समझा, मौन रहा। 

“और साथ में उस पाकिस्तानी लड़की को भी ले जाना चाहते हो?” 

“वह कोई लड़की नहीं है। इंस्पेक्टर सारा उलफ़त नाम है उनका।” शैल के प्रत्युत्तर से अधिकारी लज्जित हो गया। 

“हाँ, वही।” अधिकारी ने स्वयं को संभाला, “और उस मृत अनामी लड़की को अपनी तरफ से एक नाम देना चाहते हो।”

“हमारे यहाँ मृत व्यक्ति को स्वर्गस्थ कहा करते हैं, महाशय।” शैल ने अधिकारी को पुन: विचलित कर दिया। 

“क्या नाम देना है उस स्वर्गस्थ को?”

“मीरा।”

“और कितने दिनों तक चलेगी आप दोनों की पदयात्रा?”

“जब तक मूल घटना स्थल नहीं मिल जाता।” 

“तब तक इस घटना पर कोई कार्य नहीं होगा? कोई प्रगति नहीं होगी?”

“कार्य के लिए ही जा रहे हैं।” अधिकारी के पास अब कोई तर्क नहीं था। उसने कहा, “ठीक है। कुछ समय बाहर प्रतीक्षा करो। मैं उचित कार्यवाही करता हूँ।”

शैल कक्ष से बाहर चल गया। जाते जाते नाम पट पर लिखा अधिकारी का नाम शैल के मुख से निकाल गया, “नदीम पठान, IAS।”

शैल के बाहर जाते ही नदीम ने फोन लगाया, “हमारे लिए एक अवसर अपने आप चलकर आया है।”

“कैसा अवसर?” सामने से उसने पूछा। 

“वह दोनों नदी के उद्गम की दीशा में पैदल चलते हुए मूल घटना स्थल तक जाना चाहते हैं।”

“तुमसे अनुमति मांगी है उसने?”

“वह तो अनिवार्य है।”

“कितने समय तक जाएंगे?”

“अनिश्चित काल तक।” नदीम कुटिल हास्य कर बैठा। 

“वाह, यह तो सुंदर अवसर है। दे दो, उन्हें अनुमति दे दो। दोनों को अनुमति दे दो। ध्यान रहे कि अनुमति निश्चित समय के लिए ही देना किन्तु थोड़े अधिक दिनों के लिए देना। वे जब यहाँ से दूर रहेंगे तब ही हम अपनी योजना पर काम कर सकेंगे।”

“ठीक है, पंद्रह दिनों के लिए अनुमति दे देता हूँ। तब तक अपनी योजना काम कर लेगी। न बजेगा बांस, न बजेगी बाँसुरी।”

नदीम का हास्य अधिक कुटिल हो गया। 

“इसी प्रकार काम करते रहो, तुम्हारा लाभ होगा।”

“सपन को भेज देना। उसकी आवश्यकता रहेगी। और अपनी चेनल पर यह ब्रेकिंग न्यूज भी चल देना।”

“हमारा चेला सपन कल ही तुम्हारे पास आ जाएगा। एक और बात सुन लो नदीम, तुम अभी कच्चे खीलाड़ी हो। रविश राठी को क्या करना है, कब करना है, क्यों करना है वह तुमसे मुझे नहीं सीखना है। स्मरण रहे कि तुम और सपन केवल मेरे प्यादे हो। खेल तुम नहीं मैं खेलता हूँ।” रविश राठी ने फोन काट दिया। 

रविश के शब्दों ने नदीम को क्रोधित और लज्जित कर दिया। उसने दो चार घूंट पानी पिया और अनुमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। शैल को बुलाकर कहा, “मैंने अनुमति दे दी है। प्रयास करना कि पंद्रह दिनों में कोई ठोस प्रमाण प्राप्त हो जाए और रहस्य प्रकट हो जाए।”

“जी।”

“तुम इन पंद्रह दिनों तक सारा के साथ जितना चाहो, प्रकृति का पूरा आनंद ले लेना।”

शैल ने अनुमति पत्र ले लिया, “श्रीमान नदीम, आप अपने मन की विकृति प्रकट कर रहे हो। अपनी गंदगी अपने पास ही रखो।” शैल ने एक तीव्र दृष्टि नदीम पर डाली, नदीम विचलित हो गया। 

“पुलिसवाला हूँ, स्मरण में रखना।” कहते हुए शैल कक्ष से चला गया। नदीम क्षणभर शैल के शब्दों के आघात से घिरा रहा। उसे प्रस्वेद होने लगा। उठकर एसी के सामने खडा हो गया। जब आघात से उभरा तब पानी पिया और खुरसी पर बैठ कर अपने आप बोला, “यह अपमान का प्रतिशोध लेकर रहूँगा, शैल।”

^^^^^^^

“शैल, दस दिन बित गए, अभी तक हमें ऐसा कोई स्थान नहीं मिला जो घटना का मुल स्थल हो और न ही ऐसे कोई संकेत मिल रहे हैं।”

“साराजी, इन दस दिनों में हम 272 किलो मीटर की पैदल यात्रा कर चुके हैं तथापि कोई कड़ी नहीं मिल रही है।”

“कहाँ होगा वह घटना स्थान?”

“शेष 1200 किलो मीटर में कहीं होगा।”

“इस प्रकार चलते रहने पर अभी भी चालीस पचास दिनों के पश्चात शेष बारह सौ किलोमीटर की यात्रा सम्पन्न होगी।”

“और तभी ही हम कैलास पर्वत तक जा पहुंचेंगे।”

“शैल, हम पुलिसवाले हैं, कोई पर्वतारोही नहीं। इस बात का विस्मरण कैसे हो गया तुम्हें?”

“स्मरण है, मुझे सब स्मरण है, किन्तु इसके अतिरिक्त कोई उपाय भी नहीं है।”

“यह कैसा रहस्य है? यह कैसी घटना है? अपने भीतर न जाने क्या क्या छिपा के बैठी है!” कहते हुए सारा नदी के प्रवाह के समीप जाकर बैठ गई। नदी के बहाव को अनिमेष देखती रही। नदी में कुछ क्षण पूर्व उगे सूर्य का प्रतिबिंब पड रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे प्रवाह के साथ सूर्य भी स्वयं बह जाना चाहता हो। सारा के मन में भी विचारों का प्रवाह बहने लगा। 

‘हम भी तो समय नाम की नदी के प्रवाह में बहते जा रहे हैं, इस सूर्य के प्रतिबिंब की भांति।’

‘किन्तु वास्तव में सूर्य तो बह नहीं जा रहा।’

‘हमें तो दिख रहा है कि वह भी प्रवाह के साथ बह रहा है।’

‘यह भ्रमणा है। बह तो पानी रहा है, सूर्य नहीं। गगन में देखो, सूर्य कितना स्थिर, कितना निश्चल है, कितना निर्लेप भी। पानी के बहाव का उस पर कोई प्रभाव नहीं है।’

‘तो आँखें जो देख रही है वह क्या है?’

‘छलना, केवल छलना। तुम्हें छलना से बचना होगा। स्थिर रहना होगा। सूर्य की भांति।’

“मैं ..., मैं ...।”

“क्या बात है साराजी?”

“हं हं ...।” सारा अपने विचारों से जागी। 

“सारा जी आप स्वयं से कुछ बातें कर रही थीं?”

“बस यूँ ही। नदी के इस प्रवाह को देखकर मन विचारों में उलझ गया।”

“होता है, मन कभी कभी भटक जाता है।”

“नहीं, नहीं।”

“ऐसा भटकाव भी उपकारक होता है। कभी कभी यह हमें नई दीशा देता है। नया उत्साह प्रदान करता है।”

“तुम्हारी यह बात को मैं स्मरण में रखूंगी।” सारा ने आँखें बंद की और मनोमन सूर्य को वंदन किया। 

“आज ग्यारहवाँ दिन है, सारा जी। हमें दी गई अवधि पाँच दिनों में पूर्ण हो जाएगी। तब हमें लौटना पड़ेगा।”

“तभी नहीं, आप दोनों को अभी ही लौटना होगा।” किसी अज्ञात स्वर ने दोनों को चौंका दिया। दोनों ने स्वर की दिशा में मुंह घुमाया, सम्मुख उनके नदीम खड़ा था!