विश्वांजली
लेखक राज फुलवरे
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प्रस्तावना
यह कथा किसी एक स्त्री की नहीं है। यह कथा उन असंख्य सूनी गोदों की है, जिनमें प्रार्थना पलती है। यह कथा उस त्याग की है, जो नाम नहीं माँगता, और उस करुणा की है, जो प्रतिफल नहीं चाहती।
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है, पर इसके भाव, इसकी पीड़ा और इसका प्रकाश— सत्य से भी अधिक सजीव हैं।
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अध्याय 1 : देवाघर की दिव्य ज्योति
देवाघर…
यह कोई साधारण स्थान नहीं था। यहाँ समय ठहर जाता था, और मौन बोलने लगता था। यहाँ हवा जब बहती, तो उसमें मंत्रों की गूँज होती। दीपक बिना हाथ लगाए जल उठते, और घंटियों के स्वर स्वयं प्रकट होते।
इसी देवाघर के मध्य एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। प्रकाश धीरे-धीरे आकार लेने लगा— और उस प्रकाश से एक कन्या अवतरित हुई।
उसका मुख शांति का प्रतीक था, नेत्रों में करुणा की गहराई, ललाट पर दिव्यता का तेज, और हृदय में असीम त्याग।
उसका नाम रखा गया— विश्वा।
देवताओं की सभा सजी थी। ब्रह्मा सृष्टि की लेखनी लिए बैठे थे, विष्णु पालन की दृष्टि से निहार रहे थे, और महादेव समाधि में होकर भी सब देख रहे थे।
माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती— तीनों शक्तियाँ वहाँ उपस्थित थीं।
ब्रह्मा ने कहा—
> “हे विश्वा, तुम केवल एक देह नहीं हो। तुम करुणा की मूर्ति हो। पृथ्वी पर तुम्हारा कार्य कठिन है, पर आवश्यक है।”
विश्वा ने सिर झुकाया।
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अध्याय 2 : देवताओं का वरदान
महादेव ने अपना त्रिनेत्र खोला।
उस क्षण देवाघर का सारा प्रकाश स्थिर हो गया। जैसे सृष्टि ने श्वास रोक ली हो। त्रिनेत्र से निकली दृष्टि अग्नि नहीं थी— वह सत्य थी, वह न्याय थी, वह करुणा की अंतिम परीक्षा थी।
महादेव का स्वर गूँजा—
“विश्वा…
तुम्हारा मार्ग फूलों का नहीं होगा।
तुम्हें प्रेम भी मिलेगा और अपमान भी।
लोग तुम्हें देवी मानेंगे,
और वही लोग तुम्हें पत्थर भी मारेंगे।”
विश्वा शांत थी। न भय, न गर्व— केवल स्वीकार।
महादेव ने आगे कहा—
“मैं तुम्हें यह वर देता हूँ—
तुम जिन सूनी गोदों पर करुणा से हाथ रखोगी,
वहाँ जीवन अंकुरित होगा।
पर स्मरण रखना—
यह शक्ति तुम्हारी नहीं,
तुम केवल माध्यम हो।”
विश्वा ने नेत्र बंद कर लिए।
उसके नेत्रों से एक अश्रु गिरा—
वह अश्रु धरती पर नहीं गिरा,
वह समय में समा गया।
अब माता पार्वती आगे बढ़ीं।
ममता स्वयं चलकर आई थी।
उन्होंने विश्वा को हृदय से लगाया और कहा—
“बेटी,
माँ बनना केवल जन्म देना नहीं होता।
माँ बनना—
दर्द को मुस्कान में बदलना होता है।
मैं तुम्हें यह वर देती हूँ—
जिन संतानों को तुम जन्म का मार्ग दोगी,
उनके हृदय में तुम्हारा अंश सदा जीवित रहेगा,
भले ही वे तुम्हें जानें या न जानें।”
लक्ष्मी माता ने अपने कमल से प्रकाश निकाला।
“विश्वा,
जहाँ संतान आती है,
वहाँ समृद्धि अपने आप आती है।
मैं तुम्हें यह वर देती हूँ—
तुम जिन घरों में आशा बनकर जाओगी,
वहाँ दरिद्रता टिक नहीं पाएगी।
पर यह भी स्मरण रखना—
लोग तुम्हें धन की देवी समझने की भूल करेंगे।”
सरस्वती माता का स्वर वीणा-सा मधुर था—
“मैं तुम्हें यह वर देती हूँ—
तुम्हारा मौन भी शिक्षा बनेगा।
तुम्हारे शब्द कम होंगे,
पर तुम्हारी उपस्थिति
लोगों के जीवन का अर्थ बदल देगी।”
अंत में विष्णु बोले।
उनकी दृष्टि में करुणा भी थी और व्यवस्था भी।
“विश्वा,
संसार में संतुलन बनाए रखना सबसे कठिन है।
लोग तुम्हें अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करना चाहेंगे।
मैं तुम्हें यह वर देता हूँ—
जब भी सीमा टूटेगी,
तुम्हारा अंतर्मन तुम्हें रोक लेगा।
तुम अन्याय का साधन नहीं बनोगी।”
देवताओं के वरदान पूर्ण हुए।
ब्रह्मा ने सृष्टि की लेखनी से अंतिम वाक्य लिखा—
“विश्वा,
तुम्हारा जन्म देवाघर में हुआ है,
पर तुम्हारा कर्म
मनुष्यों के बीच होगा।”
अध्याय 3 : पृथ्वी पर अवतरण
उस दिन धरती पर कोई उत्सव नहीं था।
कोई शंख नहीं बजा।
कोई आकाशवाणी नहीं हुई।
बस एक साधारण-सा गाँव था—
मिट्टी की गंध,
सूखे कुएँ,
और वर्षों से सूनी गोदें।
उसी गाँव की सीमा पर
एक पीपल के वृक्ष के नीचे
एक तेजस्वी शिशु प्रकट हुआ।
न किसी ने उसे जन्म देते देखा,
न किसी ने रोते सुना।
वह बस… थी।
गाँव की एक वृद्ध स्त्री—
जिसे लोग “अम्मा” कहते थे—
जब वहाँ पहुँची,
तो उसने देखा—
शिशु की आँखें खुली थीं।
उनमें भूख नहीं थी,
डर नहीं था—
बस गहरी शांति थी।
अम्मा के हाथ काँप गए।
“यह बच्ची…
साधारण नहीं है,”
उसने फुसफुसाकर कहा।
और उसी क्षण—
गाँव के मंदिर की घंटी
अपने आप बज उठी।
देवाघर से निकली वह ज्योति
अब धरती की धूल में
चलना सीख रही थी।
पर किसी को क्या पता था—
यह बच्ची
एक नहीं,
हज़ारों जीवन बदलने वाली थी.
अध्याय 4 : पहली प्रार्थना
गाँव का नाम था — सोमनाथपुर।
छोटा-सा गाँव, जहाँ हर घर की दीवारों में उम्मीदों से ज़्यादा आहें कैद थीं।
यहाँ हँसी कम और मंदिर की सीढ़ियाँ घिसी हुई ज़्यादा थीं—
क्योंकि लोग मुस्कुराने से पहले प्रार्थना करना सीख गए थे।
पीपल के नीचे मिली उस बच्ची को
अम्मा अपने झोपड़े में ले आई थी।
गाँव ने उसका नाम रखा — विश्वा।
क्योंकि उसकी आँखों में पूरा संसार ठहरा हुआ था।
विश्वा बड़ी हो रही थी—
पर साधारण बच्चों की तरह नहीं।
वह रोती नहीं थी।
हँसती भी बहुत कम थी।
पर जब कोई दुखी स्त्री उसके पास बैठती,
तो विश्वा उसके हाथ को कसकर पकड़ लेती—
और बस इतना ही काफी होता।
गाँव की स्त्रियों ने पहले इसे संयोग कहा।
फिर आस्था।
और फिर— डर।
सूनी गोद की वेदना
सोमनाथपुर की सीमा पर एक कच्चा घर था।
वहाँ रहती थी रुक्मिणी।
बारह साल का विवाह।
बारह बार सावन आया।
बारह बार दीये जले।
और बारह बार गोद खाली रह गई।
उस दिन रुक्मिणी मंदिर में बैठी थी।
उसकी आँखें सूख चुकी थीं—
अब आँसू भी आने से डरते थे।
उसने भगवान से कहा—
“अब कुछ मत देना…
बस ये प्रार्थना भी मुझसे मत छीनना।”
उसी समय अम्मा वहाँ पहुँची।
विश्वा उसकी उँगली पकड़े चल रही थी।
रुक्मिणी की नज़र बच्ची पर पड़ी—
और उसका हृदय काँप गया।
“अम्मा…
ये बच्ची मुझे क्यों देख रही है
जैसे सब जानती हो?”
अम्मा कुछ बोली नहीं।
बस विश्वा को उसके पास बैठा दिया।
विश्वा ने रुक्मिणी की सूनी गोद पर
धीरे से अपना सिर रख दिया।
न मंत्र।
न शंख।
न दीप।
बस—
एक स्पर्श।
रुक्मिणी की देह में
कई वर्षों बाद
पहली बार गर्मी दौड़ी।
उस रात—
रुक्मिणी को नींद आई।
सपने में उसने देखा—
सूखे खेत में
एक अंकुर फूट रहा है।
परिवर्तन की शुरुआत
कुछ महीने बीते।
रुक्मिणी की चाल बदली।
उसके चेहरे पर
वह तेज लौटा
जो बरसों पहले बुझ चुका था।
और फिर एक दिन—
पूरा गाँव मंदिर में जमा था।
वैद्य ने काँपते स्वर में कहा—
“ईश्वर साक्षी है…
रुक्मिणी माँ बनने वाली है।”
मंदिर में सन्नाटा छा गया।
किसी ने ताली नहीं बजाई।
किसी ने जयकारा नहीं लगाया।
लोग एक-दूसरे को देखने लगे—
फिर…
उनकी दृष्टि
विश्वा पर ठहर गई।
विश्वा मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी थी।
उसके चेहरे पर न गर्व था,
न मुस्कान।
बस वही शांति।
उसी दिन से
गाँव में एक नई प्रार्थना शुरू हुई।
लोग भगवान से पहले
विश्वा को देखने आने लगे।
और देवाघर में—
कहीं बहुत दूर—
महादेव ने आँखें खोलीं।
“अब परीक्षा आरंभ हुई है…”