Four hands, two eyes in Hindi Horror Stories by Raj Phulware books and stories PDF | चार हाथ, दो आँखें

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चार हाथ, दो आँखें

चार हाथ, दो आँखें

लेखक राज फुलवरे 

(एक आत्मा, एक शहर और एक छिपा हुआ अपराध)
अध्याय 1 : वह जगह जहाँ शहर साँस लेना भूल जाता है
हर शहर में एक जगह होती है
जिसे लोग नक्शे में नहीं ढूँढते
लेकिन डर में ज़रूर याद रखते हैं।
यह जगह शहर के आख़िरी छोर पर थी।
जहाँ सड़क अचानक खत्म हो जाती थी
और आगे सिर्फ़ वीरान ज़मीन, झाड़ियाँ और सन्नाटा था।
उसी सन्नाटे के बीच
खड़ा था एक पुराना सुलभ शौचालय।
उसकी दीवारें इतनी सीली थीं
कि हाथ लगाने पर उँगलियाँ भीग जातीं।
छत से लगातार पानी टपकता रहता,
जैसे कोई अदृश्य घड़ी
समय नहीं,
गिनती कर रही हो।
रात होते ही
हवा वहाँ रुक जाती।
कुत्ते उस तरफ़ नहीं जाते।
पंछी उस पर बैठते नहीं।
लोग कहते थे—
“वहाँ कुछ है…
जो अभी तक गया नहीं।”
अध्याय 2 : अफ़वाहें, जो कभी मरती नहीं
शाम को रामू की चाय की दुकान पर
हर दिन भीड़ लगती।
एक दिन रिक्शावाले शंकर ने कहा—
“कल रात मैंने देखा…
शौचालय के अंदर लाइट जल रही थी।”
रामू हँसा—
“अरे मूर्ख, वहाँ बिजली ही नहीं है।”
एक बूढ़ी औरत, जो अब तक चुप थी,
धीरे से बोली—
“वहाँ सफ़ाई करने वाली लड़की थी…
कावेरी…
वो कभी घर नहीं लौटी।”
सन्नाटा छा गया।
किसी ने पूछा—
“पुलिस?”
बूढ़ी औरत ने कड़वी हँसी हँसी—
“पुलिस भी तो उन्हीं की थी…”
अध्याय 3 : रवि – एक मामूली आदमी, एक बड़ी भूल
रवि को इन बातों से कोई मतलब नहीं था।
उसकी दुनिया बस
रिक्शा, किराया और घर तक सीमित थी।
उस रात
बारह बजे के आसपास
उसके पेट में भयानक मरोड़ उठा।
रवि (खुद से झुंझलाकर):
“आज ही होना था क्या?”
चारों तरफ़ देखा—
दुकानें बंद।
सड़क सुनसान।
नज़र गई उसी शौचालय पर।
रवि ने खुद को समझाया—
“भूत-वूत कुछ नहीं होता…
सब दिमाग का खेल है।”
वह अंदर गया।
अध्याय 4 : भीतर का अंधेरा
दरवाज़ा खोलते ही
एक अजीब सी ठंडक
उसके शरीर में उतर गई।
बल्ब टिमटिमाया
और फिर स्थिर हो गया।
टप… टप…
पानी की आवाज़
अब उसके दिल की धड़कन जैसी लग रही थी।
जैसे ही उसने दरवाज़ा बंद किया—
धड़ाम!
रवि उछल पड़ा।
रवि:
“ये क्या बकवास है!”
तभी उसने नीचे देखा।
अध्याय 5 : चार हाथ
फर्श से
धीरे-धीरे
चार हाथ बाहर आए।
हाथों की चमड़ी सड़ी हुई थी।
नाख़ून इतने लंबे
कि फर्श पर खरोंच पड़ रही थी।
रवि चीख पड़ा—
“क…कौन है वहाँ?”
कोई जवाब नहीं।
हाथ रुक गए।
फिर दीवार पर—
अध्याय 6 : दो आँखें
दीवार की सीलन के बीच
दो आँखें उभरीं।
न चेहरा।
न शरीर।
सिर्फ़ आँखें।
आवाज़ आई—
भारी, टूटी हुई—
“तू भी चला जाएगा?”
रवि रोने लगा—
“मुझे जाने दो…
मैंने कुछ नहीं किया…”
आवाज़ में कड़वाहट थी—
“मैंने भी कुछ नहीं किया था…”
अध्याय 7 : कावेरी
आँखें बंद हुईं
और आवाज़ बदली।
“मेरा नाम कावेरी था…
मैं इसी शौचालय में सफ़ाई करती थी…”
रवि काँप रहा था।
“एक रात तीन लोग आए…
नशे में…
हँसते हुए…”
चार हाथ काँपने लगे।
“उन्होंने दरवाज़ा बंद किया…
मैं चिल्लाई…
लेकिन शहर सो रहा था…”
अध्याय 8 : बेहोशी
हाथ अचानक तेज़ी से बढ़े।
रवि ने आख़िरी बार चीखा—
“बचाओ!”
और सब अंधेरा।
अध्याय 9 : सुबह का डर
सुबह लोग जमा थे।
रवि बाहर पड़ा था।
आँखें खुली,
लेकिन आत्मा जैसे अंदर से टूट चुकी थी।
रवि बुदबुदाया—
“वहाँ…
चार हाथ हैं…
और दो आँखें…”
डर अब अफ़वाह नहीं रहा।
अध्याय 10 : सुष्मिता का प्रवेश
सुष्मिता ने खबर पढ़ी
और फाइल बंद की।
सुष्मिता:
“यह भूत की कहानी नहीं है…
यह सिस्टम की लाश है।”
उस रात
वह शौचालय पहुँची।
हवा ठंडी थी।
लेकिन डर नहीं था।
अध्याय 11 : आत्मा और सच
दरवाज़ा बंद होते ही—
“तू भी आई है?”
सुष्मिता:
“हाँ।
और मैं डरकर नहीं जाऊँगी।”
आँखें उभरीं।
कावेरी बोली—
“अगर सच बाहर आया…
तो मैं मुक्त हो जाऊँगी।”
अध्याय 12 : अपराध का जाल
सुष्मिता ने रिकॉर्ड निकाले।
तीन नाम।
एक नेता।
एक ठेकेदार।
एक पुलिस अफ़सर।
सुष्मिता:
“शहर की गंदगी
सिर्फ़ नालियों में नहीं होती…”
अध्याय 13 : आख़िरी रात
तीनों में से दो ज़िंदा थे।
शौचालय के अंदर—
कावेरी गरजी—
“अब पहचानो मुझे!”
एक आदमी रो पड़ा—
“हमसे गलती हो गई…”
कावेरी चिल्लाई—
“गलती नहीं…
जुर्म!”
अध्याय 14 : इंसाफ़
सब रिकॉर्ड हुआ।
शहर हिल गया।
दोषी जेल गए।
चार हाथ धीरे-धीरे मिट गए।
अध्याय 15 : आख़िरी दृश्य
नई इमारत बनी।
पहली रात
गार्ड बोला—
“दीवार पर
दो आँखें दिखीं…”
क्योंकि
कुछ आत्माएँ जाती नहीं…
वे बस देखती रहती हैं।
अध्याय 16 : इंसाफ़ के बाद भी सन्नाटा क्यों?
दोषियों की गिरफ़्तारी के बाद
शहर ने राहत की साँस ली।
अख़बारों में हेडलाइन थी—
“सुलभ शौचालय हत्या कांड का खुलासा”
सुष्मिता को पुरस्कार मिला।
लोगों ने उसे बहादुर कहा।
लेकिन…
हर रात
जब वह सोती,
उसे वही दो आँखें दिखतीं।
सुष्मिता (नींद में बड़बड़ाते हुए):
“अब तो सब खत्म हो गया…
फिर क्यों दिख रही हो?”
नींद टूट जाती।
कमरा ठंडा हो जाता।
अध्याय 17 : रवि का बदलता व्यवहार
रवि ज़िंदा तो था,
पर पहले जैसा नहीं।
वह बोलता कम,
घूरता ज़्यादा।
एक दिन उसकी पत्नी बोली—
पत्नी:
“तुम अब बच्चों से भी नहीं बोलते…
वो जगह तुम्हें अब भी पकड़े हुए है क्या?”
रवि ने धीरे से कहा—
“वो गई नहीं है…”
पत्नी काँप गई—
“क…कौन?”
रवि की आँखें भर आईं—
“कावेरी…”
अध्याय 18 : नई इमारत, पुराना डर
पुराना शौचालय गिरा दिया गया।
वहाँ एक नई, चमचमाती इमारत बनी।
नगरपालिका ने दावा किया—
“अब वहाँ कुछ नहीं है।”
पहली रात
गार्ड मोहन ड्यूटी पर था।
रात 2:17 बजे
उसने दीवार पर देखा—
दो गीली आँखें।
मोहन चिल्लाया—
“कौन है?!”
आवाज़ आई—
“मैं गई नहीं हूँ…”
मोहन बेहोश हो गया।
अध्याय 19 : आत्मा का दूसरा सच
सुष्मिता फिर उस जगह पहुँची।
दीवार पर हाथ रखा।
ठंडक…
लेकिन इस बार गुस्सा नहीं था।
आवाज़ आई—
“मुझे इंसाफ़ मिला…
पर शांति नहीं।”
सुष्मिता:
“क्यों?”
कावेरी:
“क्योंकि सच अधूरा है…”
अध्याय 20 : चौथा आदमी
कावेरी की आवाज़ और भारी हो गई—
“तीन नहीं…
चार थे।”
सुष्मिता चौंक गई—
“चार?”
कावेरी:
“चौथा वो था…
जो आज भी कुर्सी पर बैठा है…”
“जिसने फाइल दबाई…
जिसने मुझे मरने दिया…”
सुष्मिता समझ गई —
यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
अध्याय 21 : सिस्टम का चेहरा
चौथा आदमी
अब बड़ा अफ़सर था।
सुष्मिता उससे मिलने गई।
अफ़सर (मुस्कुराते हुए):
“आप बहुत बहादुर हैं…
पर कुछ सच्चाइयाँ
दबाकर रखना ही बेहतर होता है।”
सुष्मिता:
“जैसे कावेरी की मौत?”
अफ़सर की मुस्कान जम गई।
अध्याय 22 : आत्मा का टूटना
उस रात
कावेरी की आवाज़ बदल गई।
अब उसमें दर्द कम,
गुस्सा ज़्यादा था।
“अगर इंसाफ़ नहीं मिला…
तो मैं सबको यहाँ बुलाऊँगी…”
चार हाथ फिर उभर आए।
इस बार
ज़्यादा काले,
ज़्यादा भयानक।
अध्याय 23 : रवि का बलिदान
रवि खुद उस जगह पहुँचा।
सुष्मिता ने रोका—
“तुम क्यों जा रहे हो?!”
रवि:
“क्योंकि उसने मुझे छोड़ा नहीं…
और शायद
मुझे ही उसे छोड़ना होगा…”
अंदर जाकर
रवि बोला—
“कावेरी…
अब बस…”
आँखें रुकीं।
कावेरी फुसफुसाई—
“तू मुझे देख सकता है…
इसलिए तू चुना गया है…”
अध्याय 24 : आख़िरी सामना
सुष्मिता ने सबूत मीडिया को दे दिए।
चौथा आदमी बेनक़ाब हुआ।
गिरफ़्तारी हुई।
उसी रात
चार हाथ पिघलने लगे।
आँखें रो पड़ीं।
“अब…
अब मैं थक गई हूँ…”
अध्याय 25 : मुक्ति या अंत?
सुबह
रवि की लाश मिली।
चेहरे पर शांति थी।
सुष्मिता रो पड़ी—
“उसने तुम्हें आज़ाद कर दिया…”
हवा हल्की हो गई।
पहली बार
वह जगह
सामान्य लगी।
अध्याय 26 : आख़िरी ट्विस्ट
कई महीने बाद
सुष्मिता ने नया लेख लिखा—
“आत्माएँ क्यों लौटती हैं?”
लेख छपते ही
उसके लैपटॉप की स्क्रीन काली हो गई।
स्क्रीन पर उभरीं—
दो आँखें।
आवाज़ आई—
“कहानी लिखने वालों को
हम कभी नहीं छोड़ते…”
अध्याय 27 : अंत… या शुरुआत
सुष्मिता मुस्कुराई।
धीरे से बोली—
“तो लिखते रहेंगे…”
स्क्रीन बंद हो गई।
लेकिन कमरे की दीवार पर
नमी टपक रही थी।
टप…
टप…
समाप्त