Onion Poha in Hindi Women Focused by Raj Phulware books and stories PDF | कांदेपोहे

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कांदेपोहे

कांदेपोहे

लेखक : राज फुलवरे

शहर की भीड़भाड़ भरी जिंदगी में, जहाँ हर कोई अपनी जल्दी में, अपनी चिंताओं में डूबा हुआ भागता रहता है, उसी सड़क के एक कोने पर एक छोटी-सी गाड़ी रोज़ सुबह सज जाती थी।
यह गाड़ी दूर से देखने में आम लगती थी, लेकिन उसके पास पहुँचते ही महसूस होता था कि यह जगह कुछ अलग है… इसमें एक अपनापन है, एक गर्माहट है।

लोग उसे बड़े प्यार से “जुबेन होटल” कहते थे।
नाम भले जुबेन हो, पर यह होटल से भी ज़्यादा घर जैसा लगता था।

गाड़ी पर नीला-सा तिरपाल तना रहता। तिरपाल के नीचे गर्म-गर्म पोहे की खुशबू ऐसे फैलती कि लगता जैसे सुबह की हवा में भी हल्दी और नींबू घुल गया हो।
चाय का उबलता हुआ भगोना, कॉफी की मीठी सोंधी भाप, मिसळ की मसालेदार खुशबू, उपमा की नर्म महक, और साबुदाना खिचड़ी की हल्की सी मीठी ठंडक…
हर खुशबू मिलकर मानो किसी पुराने गाने की धुन बनाती थी।

मेरा भी एक छोटा-सा नियम था।
हर सुबह तो नहीं, पर मौका मिलते ही मैं वहाँ पहुँच जाता।
क्योंकि वहाँ का माहौल बाकी जगहों जैसा नहीं था—वहाँ शोर नहीं था, बनावट नहीं थी।
वहाँ बस सादगी थी… और सुकून था।


---

एक अनोखा चेहरा… रोज़ दिखाई देने लगा

धीरे-धीरे मैंने देखा कि हर दो-तीन दिन में एक चेहरा जरूर दिख जाता—धैया।

धैया का चलना, उसके चेहरे की नर्मी, उसके बालों का हल्का-सा उड़ा हुआ रूप… सब कुछ बेहद साधारण, पर आकर्षक था।
उसकी आँखें बेहद शांत थीं—जैसे किसी नदी की गहराई जिसमें कोई हलचल न हो।

उसके साथ एक छोटा-सा लड़का आता था—स्तंभू।
हमेशा मुस्कुराता हुआ, उत्साह से भरा हुआ।
उसकी मासूमियत में एक ऐसी चमक थी जो हर किसी को अपनी तरफ खींच लेती।

और उनके पीछे-पीछे आता एक और व्यक्ति—कस्तुर।
भारी-भरकम शरीर, पर दिल से सीधा-सादा।
थार गाड़ी से उतरता, दोनो के पास बैठता और फिर तीनों साथ में नाश्ता करते।

पहले मुझे लगा कि शायद ये तीनों एक परिवार होंगे।
औरत–मर्द–बच्चा…
सामान्य-सा संयोजन।

पर धीरे-धीरे समझ आया कि तस्वीर जितनी दिखती है उतनी होती नहीं।
उनके रिश्तों का धागा कुछ और ही था।


---

सिर्फ नज़रें…

धैया और मेरे बीच कभी कोई बात नहीं हुई।
पर हमारी नज़रें कई बार मिलीं।

वह मुझे देखती।
मैं उसे देखता।
और फिर दोनों जैसे झेंपते हुए एकदम से नज़रें हटा लेते।

कभी मुस्कुराहट नहीं, कभी अभिवादन नहीं।
पर उस चुप्पी में भी एक अनकहा रिश्ता था—बहुत हल्का, बहुत नाज़ुक।

उस दिन तक…


---

स्तंभू से शुरू हुई बातचीत

एक सुबह भीड़ कम थी।
मैं तवे के पास खड़ा होकर अपना कांदेपोहे लेने वाला था कि अचानक स्तंभू दौड़ते हुए मेरे पास आया।

स्तंभू (उत्साह में):
“अरे भैया! आप रोज़ आते हो क्या यहाँ?”

मैं उसकी मासूमियत पर मुस्कुरा दिया।

मैं :
“रोज़ तो नहीं, पर कोशिश करता हूँ कि आऊँ।”

बस, वहीं से बातें खुलने लगीं।
स्तंभू अब मुझे देखते ही हाथ हिलाता।
कभी कहता, “आज पोहे खाओ ना!”
कभी कहता, “अंकल आप ऑफिस जाते हो क्या?”

और धीरे-धीरे कस्तुर भी दो चार बातें करने लगा।
और सबसे अनोखी बात—अब धैया भी हल्का-सा मुस्कुरा देती।
जैसे कह रही हो—"मैं जानती हूँ… आप भी जान चुके हैं कि हम एक-दूसरे को रोज़ देखते हैं।”

हम चारों के बीच एक छोटी-सी, लेकिन प्यारी-सी दोस्ती बनने लगी।


---

पहला गंभीर सवाल

एक दिन भीड़ बहुत कम थी।
धैया अकेली चाय पीते हुए खड़ी थी।
उस दिन जाने क्यों मेरे मन में हिम्मत आ गई।
मैं धीरे-धीरे उसके पास चला गया।

मैं :
“आपसे एक बात पूछूँ?”

धैया ने बिना झिझके सिर उठाया।
धैया :
“हाँ पूछिए।”

मैं :
“जो आदमी आपके साथ थार में आता है… कस्तुर… वह आपके लिए क्या है?”

वह कुछ पल तक गहरी साँस लेकर मेरी तरफ देखती रही।
फिर एकदम शांत स्वर में बोली—

धैया :
“वह? वह सिर्फ एक दोस्त है।
बस दोस्त।
उससे आगे कुछ नहीं… और आगे कुछ होगा भी नहीं।”

उसकी बात सुनकर मेरे मन में हल्की-सी राहत आई।
लेकिन उसके बाद उसने जो कहा… उसने मुझे बिल्कुल शांत कर दिया।


---

धैया की सच्चाई

धैया :
“शंखुल…
मैं अब किसी भी रिश्ते के पीछे नहीं भागती।
न प्यार चाहिए…
न कोई नया बंधन…
न कोई उम्मीद।

मेरे लिए मेरा बच्चा ही काफी है।
ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा है मैंने।
बहुत उतार-चढ़ाव, बहुत दर्द, बहुत उम्मीदें…
अब मैं और कुछ नहीं चाहती।
मैं बस शांति चाहती हूँ।
और किसी नए रिश्ते में वह शांति नहीं है।”

मैंने सिर्फ इतना कहा—

मैं :
“मैं आपकी बात समझ सकता हूँ।
और आपका फैसला सही है।”

उसने मेरी तरफ देखा।
उसकी आँखों में दृढ़ता थी—लेकिन उस दृढ़ता के पीछे एक अदृश्य थकान भी थी।
जैसे वह बहुत लड़ चुकी हो और अब बस सुकून चाहती हो।


---

मेरी दूरी… उसकी समझदारी

उस दिन के बाद मैंने वहाँ जाना कम कर दिया।
कुछ चीजें दूर से खूबसूरत लगती हैं…
पर पास जाते ही टूट जाती हैं।

मैं धैया को उससे ज्यादा परेशान नहीं करना चाहता था जितना जिंदगी ने पहले ही कर रखा था।

पर कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई।


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कस्तुर का सच

एक सुबह कस्तुर अकेला आया।
चारों तरफ नज़रें दौड़ाकर उसने मुझे ढूँढा।
और आते ही बोला—

कस्तुर :
“शंखुल भाई… धैया ने मुझसे भी दूरी बना ली है।”

मैं चौंक गया।

मैं :
“क्यों? क्या हुआ?”

कस्तुर ने गहरी साँस छोड़ी और बोला—

कस्तुर :
“वह कहती है—
‘किसी से ज्यादा मिलो, तो उसके मन में भावनाएँ पैदा हो सकती हैं…
और मैं किसी को गलत उम्मीद नहीं देना चाहती।’

इसलिए उसने कहा कि हम सिर्फ दूर से जान-पहचान वाले रहें।”

कस्तुर के चेहरे पर दर्द था…
पर उसकी आँखों में धैया के फैसले का सम्मान भी।


---

धैया का अपना नज़रिया

बाद में मुझे पता चला कि धैया ने साफ कहा था—

धैया :
“कस्तुर अच्छा इंसान है।
पर अगर मैं उससे ज्यादा घुल-मिल गई, तो शायद वह मुझे पसंद करने लगे।
और मैं किसी को ऐसे रास्ते पर ले जाना नहीं चाहती, जहाँ मैं खुद जाने की इच्छुक नहीं हूँ।”

धैया रिश्तों से नहीं डरती थी।
वह सिर्फ किसी को भी अनजाने में आहत नहीं करना चाहती थी।
वह अपने और दूसरों दोनों के दिल की सुरक्षा कर रही थी।


---

अंत… पर दिल में यादें

अब भी वह गाड़ी वहीं लगती है।
वही चाय, वही कांदेपोहे, वही खुशबू…
सब कुछ वैसा ही है।

पर मैं?

मैं वहाँ नहीं जाता।

क्योंकि धैया के साथ मेरी जो छोटी-सी दोस्ती थी—
वह शब्दों में नहीं,
नज़रों में थी।
और वह नज़रें भी खो देने का डर था।

धैया ने मुझे कभी कुछ सीधे तौर पर नहीं दिया…
पर फिर भी बहुत कुछ दे गई—

• सीमाओं का महत्व
• भावनाओं की समझ
• और सबसे जरूरी—
किसी के फैसले का सम्मान करना

कहानी शायद ख़त्म हो गई…
पर उन सुबहों की चाय, पोहे की महक,
और धैया की शांत आँखें—

अब भी मेरे दिल के कोने में गर्म चाय की भाप की तरह तैरती रहती हैं।