बच्चा बिक्री केंद्र
(वर्ष 3000 की विस्तृत कहानी)
लेखक : राज फुलवरे
---
प्रस्तावना
मेरे प्रिय पाठको,
यह कहानी एक काल्पनिक भविष्य की है।
यह किसी व्यक्ति, समाज या व्यवस्था का अपमान करने के लिए नहीं लिखी गई है।
कृपया इसे एक कल्पना-यात्रा मानकर पढ़ें और आनंद लें।
---
भाग 1 – वर्ष 3000 : जहाँ दुनिया ने अपनी पुरानी पहचान खो दी थी
वर्ष 3000।
मनुष्य ने अपने जीवन को इतना बदल दिया था कि पृथ्वी की पुरानी तस्वीरें अब संग्रहालयों की दीवारों पर लटकती थीं।
पहले लोग जो चीजें असंभव मानते थे, वह अब सामान्य थीं।
आसमान में चमचमाती गाड़ियाँ चलतीं।
उनका शोर भी नहीं होता।
नीचे शहरों को बड़े काँच और धातु के टावरों ने जकड़ रखा था—
हर टावर किसी विशाल पेड़ की तरह आसमान को छूता।
सड़कें थीं, पर सिर्फ पैदल चलने वालों के लिए।
वाहन हवा में ही चलते थे।
लोग जमीन पर ट्रैफिक होते थे ये बात सुनकर हँसते थे।
उन्हें यकीन नहीं होता कि कभी गाड़ियाँ धरती पर चलती थीं।
पैसा, लेनदेन, बैंक?
सारी व्यवस्था बदल चुकी थी।
हर इंसान के हाथ में एक चिप लगी थी—जो उसकी पहचान, बैंक, मेडिकल रिपोर्ट, सब कुछ थी।
सिर्फ मशीन के सामने हाथ दिखाओ—और काम पूरा।
बाजार भी खत्म थे।
रोबोट ड्रोन हर चीज घर पहुंचाते थे।
न दूकानें…
न दुकानदार…
डॉक्टर?
इस युग में हर इंसान को एक डिजिटल चिप मिली थी—
जो उसकी बीमारी पहचान लेती थी,
इलाज बताती थी,
और दवाई भी मशीन से निकल कर हाथ में आ जाती थी।
मानव विकास अपने चरम पर पहुंच चुका था।
और इसी प्रगति के बीच एक अनोखा मार्ग बनाया गया था—
“देवलोक—मानवलोक आकाशमार्ग”
इस मार्ग के बीच एक विशाल, चमचमाता भवन था।
जिसका नाम था—
“बच्चा बिक्री केंद्र – Baby Design Centre”
यहाँ बच्चे पैदा नहीं होते थे।
डिज़ाइन किए जाते थे।
जिस तरह मोबाइल का मॉडल चुना जाता है—
उसी तरह लोग “अपने बच्चे के फीचर्स” चुनते थे।
इस केंद्र का काम ही था—
“इंसान को उसके मन का बच्चा प्रदान करना।”
---
भाग 2 – दो पिता, दो दुनिया
इस कहानी की शुरुआत उस दिन से होती है,
जब इस केंद्र में एक साथ दो लोग प्रवेश करते हैं।
दोनों पिता बनने आए थे—
लेकिन दोनों की दुनिया, सोच और हालात बिल्कुल अलग।
पहला—
अमीर।
महंगी हॉलोग्राम जैकेट, ब्रांडेड जूते,
हाथ में कांच जैसा पारदर्शी मोबाइल जो हवा में स्क्रीन बनाता था।
उसके चेहरे पर आत्मविश्वास कम और अहंकार ज्यादा था।
चलते समय उसके कपड़ों से नीली रोशनी निकलती थी—
भविष्य का फैशन।
दूसरा—
गरीब।
साधारण कपड़े, मेहनत से खुरचे हुए हाथ,
चेहरा थका हुआ मगर आँखें ईमानदार।
उसके शरीर पर तकनीक की चमक नहीं थी—
सिर्फ इंसानियत की चमक थी।
दोनों को एक ही काम से बुलाया गया था—
अपना बच्चा चुनने के लिए।
केंद्र का रोबोट रिसेप्शन,
जिसकी आँखें चमकदार नीले LED की थीं,
दोनों को देखकर तुरंत सक्रिय हुआ।
रोबोट रिसेप्शन:
“नमस्कार। आपका स्वागत है Baby Design Centre में।
कृपया बताएं—आप कैसा बच्चा डिज़ाइन करवाना चाहते हैं?”
---
भाग 3 – अमीर की मांग : एक परफ़ेक्ट बच्चा
एक मानव विक्रेता आगे आया—
दिखने में बिल्कुल भविष्य का आदमी।
उसके कपड़ों में भी चिप लगी थी।
उसकी आवाज मशीन जैसी शुद्ध और स्थिर।
विक्रेता:
“सर, बताइए आपको कैसा बच्चा चाहिए?”
अमीर बड़ी मुस्कान के साथ बोला—
अमीर:
“देखो, मुझे अपना बच्चा परफेक्ट चाहिए।
थोड़ा सा सुंदर…
थोड़ा सा तेज दिमाग वाला…
थोड़ा सा मज़बूत…
थोड़ा चालाक भी…
सभी गुण थोड़ा-थोड़ा डाल दो।
और हाँ, भविष्य में उसका अपग्रेड पैकेज भी चाहिए।”
विक्रेता के चेहरे पर व्यावसायिक मुस्कान आई।
विक्रेता:
“सर, ये पैकेज हमारे सबसे प्रीमियम पैकेज में आता है—
‘Premium Mix Feature Baby’.
इसमें आप बच्चा अपनी पसंद के फीचर्स से डिजाइन कर सकते हैं और भविष्य में उन्हें अपडेट भी कर सकते हैं।
कुल कीमत: 25 करोड़ रुपये।”
अमीर ने हाथ आगे किया—
स्कैनर चमका—
और उसके खाते से 25 करोड़ कट गए।
टिंग!
भुगतान पूरा।
---
भाग 4 – गरीब की मांग : सिर्फ दो गुण
अब गरीब आदमी की बारी थी।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसकी चाल में संकोच था—
शायद उसे लग रहा था कि यह जगह केवल अमीरों के लिए है।
विक्रेता:
“सर, आप बताएं। आपको कैसा बच्चा चाहिए?”
गरीब ने हिम्मत जुटाई।
उसने अपनी फटी जेब को दबाया और कहा—
गरीब:
“मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।
मेरे बच्चे में सिर्फ दो गुण डाल दो—
दया और प्रेम।”
विक्रेता चौंक गया।
विक्रेता:
“सिर्फ दो?
आजकल ऐसा कोई विकल्प नहीं चुनता।
सब अमीर लोग बच्चा एकदम परफेक्ट बनवाते हैं।”
गरीब मुस्कुराया—
चुपचाप बोला—
गरीब:
“मुझे अपने बच्चे को परफेक्ट नहीं बनाना है…
बस अच्छा इंसान बनाना है।
बाकी दुनिया उसे खुद सिखा देगी।”
उसकी बात सुनकर वहाँ मौजूद कुछ रोबोट भी एक क्षण के लिए रुक गए—
मानो भावनाएँ समझ गए हों।
विक्रेता ने स्कैनर बढ़ाया।
कीमत: 1.5 लाख रुपये।
गरीब ने काँपते हाथों से भुगतान किया—
उसके बैंक बैलेंस का लगभग अंत हो चुका था।
लेकिन चेहरे पर संतोष था।
---
भाग 5 – अमीर का Future Plan
अमीर को अभी और चाहिए था।
अमीर:
“एक काम और करो। मुझे अपने बच्चे का भविष्य जानने का प्लान दो।”
विक्रेता:
“जी सर।
आपको भविष्य की सिर्फ एक जानकारी मिलेगी।
किंमत: 50,000 रुपये।”
अमीर ने तुरंत स्कैन कर दिया।
कुछ सेकंड बाद उसे एक डिजिटल स्लिप मिली—
“आपका बच्चा भविष्य में डॉक्टर बनेगा।”
अमीर गर्व से मुस्कुराया और बाहर निकल गया।
---
भाग 6 – गरीब की सोच
गरीब को भी पूछा गया—
रिसेप्शनिस्ट:
“सर, आप Future Plan लेना चाहेंगे?”
गरीब ने शांत मुस्कान दी—
गरीब:
“नहीं।
मुझे अपने बच्चे का भविष्य मशीन से नहीं जानना।
मैं उसे अच्छा इंसान बनाऊँगा…
बाकी रास्ता वह खुद चुन लेगा।
उसका भविष्य उसका है—
मेरे पैसे का नहीं।”
उसकी ये बात सुनकर रिसेप्शनिस्ट रोबोट कुछ क्षण के लिए चुप हो गई—
मानो उसके सिस्टम में कोई नई भावना घुस गई हो।
गरीब बाहर चला गया—
हाथ खाली, लेकिन दिल भरा हुआ।
---
भाग 7 – समय बीता… दोनों बच्चे बड़े हुए
समय नदी की तरह बह गया।
अमीर का बच्चा—
डॉक्टर बन गया।
लेकिन वह डॉक्टर नहीं,
माफिया बन गया।
वह गुप्त रूप से अंगों की तस्करी करता,
गरीब मरीजों को धोखा देता,
और अमीरों की जेब भरता।
उसके अंदर दया या नैतिकता नाम की कोई चीज़ नहीं थी—
क्योंकि उसने अपने डिजाइन में वह फीचर लिया ही नहीं था।
दूसरी तरफ—
गरीब का बच्चा—
धीरे-धीरे मेहनत करके पुलिस इंस्पेक्टर बना।
निडर, ईमानदार और दयालु।
उसे देखकर लोग कहते—
“इंसानियत आज भी जिंदा है।”
गरीब पिता का गर्व अब बूढ़ा होकर भी सीधा खड़ा था।
---
भाग 8 – टकराव : सच और झूठ की लड़ाई
एक दिन पुलिस मुख्यालय में एक बड़ा केस आया—
अवैध ऑर्गन व्यापार।
इंस्पेक्टर को यह केस दिया गया।
तफसील से खोजबीन में उसने पाया कि पूरा नेटवर्क बेहद संगठित है।
पैसों का जाल, तकनीक का उपयोग,
और बेहद पेशेवर अपराधी…
वह लगातार सुराग खोजता गया।
लेकिन उसे अंदाजा भी नहीं था—
कि जिस डॉक्टर को वह ढूँढ रहा है,
वही कभी उसके बराबर खड़ा था
Baby Design Centre में।
---
भाग 9 – आमने–सामने : एक रात जिसने सब बदल दिया
एक रात एक गुप्त सूचना मिली।
इंस्पेक्टर अपनी टीम के साथ गया।
एक भूमिगत प्रयोगशाला मिली—
जहाँ मशीनों पर इंसानी अंग रखे थे।
और कमरे के बीच में—
अमीर का बेटा, वही डॉक्टर।
दोनों की नजरें मिलीं—
इंस्पेक्टर:
“तू ये सब करता है?
लोगों के अंग चुराता है?
शर्म नहीं आती?”
डॉक्टर (व्यंग्य हँसी से):
“शर्म?
अरे पुलिस वाले…
इस दुनिया में पैसा सबसे बड़ा है।
तुम्हारे जैसे लोग हमेशा गरीब रहेंगे—
क्योंकि तुमने दया और इंसानियत जैसे फालतू फीचर चुने हैं।”
इंस्पेक्टर:
“फालतू?
यही फीचर इंसान को इंसान बनाते हैं।”
डॉक्टर हँसकर बोला—
डॉक्टर:
“मैंने तो अपने डिजाइन में इंसानियत का फीचर लिया ही नहीं था।”
इंस्पेक्टर का चेहरा शांत हो गया।
उसने धीरे से कहा—
इंस्पेक्टर:
“लेकिन मेरे पिता ने लिया था।”
डॉक्टर का चेहरा उतर गया।
वह कुछ बोल नहीं पाया।
---
भाग 10 – इंसानियत की जीत
इंस्पेक्टर ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
कोर्ट में सुनवाई हुई—
और कठोर सज़ा मिली।
लोग अदालत के बाहर तालियाँ बजाते खड़े थे।
क्योंकि इतने आधुनिक जमाने में पहली बार—
किसी ने पैसे को नहीं,
इंसानियत को जीतते देखा था।
---
समाप्ति – संदेश
दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए—
गाड़ियाँ आसमान में उड़ जाएँ…
पैसा हवा में बहने लगे…
डॉक्टर मशीन बन जाएँ…
देवलोक का मार्ग खुल जाए…
लेकिन एक चीज कभी नहीं बदलेगी—
“दया और प्रेम से भरा इंसान ही सबसे आधुनिक है।”