हमशकल
लेखक राज फुलवरे
शहर की शामें हमेशा भीड़, भागदौड़ और शोर से भरी होती हैं। लेकिन इसी शहर के एक कोने में दो ज़िंदगियाँ चुपचाप एक-दूसरे से टकराने वाली थीं—सुंदर और परम।
दोनों की शक्ल एकदम मिलती-जुलती… जैसे किसी ने एक ही साँचे में ढालकर दो चेहरे बना दिए हों।
लेकिन ज़िंदगी—दोनों की बिल्कुल अलग।
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अध्याय 1 – पहली मुलाक़ात
सुंदर, एक सादा-सी ज़िंदगी जीने वाला सीधा-सादा लड़का।
और सामने… परम—शहर का कुख्यात विलन।
जिसका नाम सुनकर ही लोग कांपते थे। उसके साथ हमेशा रहते थे उसके तीन आदमी—युवराज, सद्दाम और परम का दाहिना हाथ अब्दुल।
एक दिन सुंदर को खबर लगती है कि शहर में एक ऐसा बदमाश है जिसकी शक्ल बिलकुल उसकी जैसी है।
वो सीधे उसके सामने पहुचंता है।
परम पास से गुजरते हुए अचानक रुक जाता है।
उसकी आँखें फैल जाती हैं—
“ए… ये क्या? ये तो बिलकुल मेरी शक्ल—!”
सुंदर गुस्से में बोलता है,
“देखो… तुम्हारी और मेरी सिर्फ शक्ल मिलती है! इसके अलावा हमारा कोई नाता नहीं है… समझे?
तुम्हारे किसी भी मैटर में मुझे मत खींचना। वरना अच्छा नहीं होगा।”
परम की नज़रें उस पर टिकी रहती हैं…
वो अंदर ही अंदर जल उठता है।
लेकिन मुस्कुराता है।
परम धीरे से अपने फंटरों से कहता है,
“इसे देखो! अकड़ देख इसकी… इसे पता ही नहीं मैं किस खेत की मूली हूँ। खींचेंगे इसे अपने मैटर में… ज़रूर खींचेंगे!”
युवराज हंसता है,
“बॉस, इसकी शक्ल तो आपकी डुप्लीकेट लगती है।”
सद्दाम चुटकी लेता है,
“अरे बॉस, ये तो आपकी B-grade कॉपी है!”
तीनों जोर से हंसते हैं।
सुंदर गुस्से में वहां से निकल जाता है, लेकिन परम की आँखों में अब नफ़रत जम चुकी होती है।
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अध्याय 2 – प्यार और साज़िश
अगले दिन सुंदर अपनी गर्लफ्रेंड साखी के साथ गार्डन में घूम रहा होता है।
दोनों हंसते-मुस्कुराते, खेलते हुए चलते हैं।
साखी उसकी आंखों पर पट्टी बांधती है।
“चलो… गेम खेलते हैं। पकड़ के दिखाओ मुझे।”
सुंदर हंसता है,
“अरे पकड़ लूंगा, कहीं भागना मत!”
लेकिन दूर खड़े अब्दुल के हाथ में कैमरा होता है।
वो दोनों की तस्वीरें छिपकर लेता है।
अब्दुल फोटो परम को दिखाता है।
परम फोटो देखकर मुस्कुराता है।
“ओहो… ये रही इसकी कमज़ोरी। लड़की को उठा लो! देखते हैं इसके अंदर कितनी आग है।”
युवराज पूछता है,
“बॉस कब करना है?”
परम:
“अभी! अभी जाओ। लड़की को लाओ!”
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अध्याय 3 – अपहरण
साखी खेलते-खेलते पट्टी बांधे सुंदर का हाथ पकड़ने ही वाली होती है कि अचानक पीछे से तीन गुंडे दबे पाँव आते हैं।
एक गुंडा उसकी नाक पर केरोसीन की रूई रख देता है।
साखी एक झटके में बेहोश।
सुंदर पट्टी उतारता है—
“साखी!! साखी!!”
लेकिन तब तक गुंडे उसे उठाकर कार में डालकर ले जाते हैं।
सुंदर कार के पीछे भागता है लेकिन कार दूर निकल जाती है।
वो हांफते हुए चिल्लाता है,
“साखी!!!”
उसे मालूम था कि परम का अड्डा शहर के बाहर एक सूने गोदाम में है।
वो वहीं दौड़ता हुआ पहुँचता है।
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अध्याय 4 – खूनी मंजर
गोदाम का बड़ा दरवाज़ा चरमराता है।
अंदर अंधेरा और सिर्फ एक लाइट।
उस रोशनी के नीचे…
साखी बंधी हुई खड़ी है।
परम उसके सामने।
और गुंडों के हाथों में बंदूकें।
परम मुस्कुराता है,
“आ गया तू? असली हीरो!”
सुंदर दहाड़ता है,
“साखी को छोड़ दे हरामी!”
परम उसकी तरफ बढ़ता है,
“तुम्हारी शक्ल मुझसे मिलती है… ये मज़ाक भी मुझे पसंद नहीं है।
आज इसे खत्म कर देते हैं।”
तभी पीछे से दो गुंडे आते हैं।
पहला लोहे की मोटी पट्टी से वार करता है—
सीधे सुंदर के पैरों के बीच।
दूसरा वार—
उसके सर पर।
सुंदर ज़मीन पर गिर जाता है।
खून बहता है।
और परम… साखी के पेट पर तीन गोलियां चला देता है।
धड़ाम!
साखी जमीन पर गिरती है।
सुंदर उसकी तरफ रेंगता है—
“साखी… साखी…”
लेकिन उसकी आँखें घूम जाती हैं।
और वो बेहोश हो जाता है।
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अध्याय 5 – पागलपन की शुरुआत
अगली सुबह।
सुंदर एक गार्डन की बेंच पर बैठा जागता है।
उसका दिमाग सदमे से पागल हो चुका है।
वो खोया हुआ-सा घूमता है।
एक कपल उसके पास आता है।
लड़की उसे दया से दस रुपये देती है।
“ले भाई, कुछ खा लेना।”
वो अपना मोबाइल वहीं भूल जाती है।
सुंदर मोबाइल लेकर उनके पीछे चलता है।
“मैडम… मोबाइल…”
लेकिन वो लोग आगे निकल चुके होते हैं।
सुंदर कुछ कदम चलकर रुकता है…
मोबाइल दूर फेंक देता है।
अचानक…
उसकी नजर पास खड़े दूसरे कपल पर जाती है।
और उसके सामने वही दृश्य दोहराया जा रहा होता है।
पहला गुंडा—
लड़के के पैरों के बीच लोहे की रॉड से वार करता है।
दूसरा—
उसके सिर पर।
उसी पल—
सुंदर की आँखें फैल जाती हैं।
पूरी घटना उसके दिमाग में तेज़ी से चमकती है—
साखी…
गोदाम…
गोलियां…
खून…
परम की हँसी…
सब कुछ।
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अध्याय 6 – खूनी बदला
सुंदर की आँखों में एक नई आग जलती है।
वो चिल्लाता है—
“साखी!!!”
वो भागता हुआ परम के पीछे दौड़ता है।
परम डरकर भागता है, लेकिन सुंदर उससे भी तेज़।
परम की बंदूक गिरती है—
सुंदर झपटकर उठा लेता है।
और बिना सोचे—
धायं! धायं! धायं!
तीन गोलियां—
उसी जगह, उसके पेट के अंदर—
जहाँ उसने साखी को मारी थीं।
परम जमीन पर गिरता है…
खून बह रहा है…
वो अंतिम सांस में बड़बड़ाता है—
“तू… तू पागल हो चुका है…”
सुंदर ठंडे स्वर में कहता है,
“पागल नहीं… इंसाफ।”
इसके बाद वो युवराज और सद्दाम की तलाश में जाता है।
दोनों भाग रहे होते हैं।
सुंदर धीरे-धीरे उनके पीछे चलता है।
बिना किसी डर के।
वो पास आता है…
एक-एक गोली—
पीठ के बीचोंबीच।
दोनों वही ढेर।
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अध्याय 7 – अंत और समर्पण
दूसरे कपल को वो बचा लेता है।
लड़की रोते हुए कहती है—
“भाई, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!”
लेकिन सुंदर की आंखों में सिर्फ एक ही चेहरा—
साखी।
वो घुटनों पर गिर जाता है।
आसमान की तरफ देखते हुए दहाड़ता है—
“साआआख़ी!!!”
पूरा गार्डन उसकी आवाज़ से गूंज उठता है।
कुछ देर बाद वो उठता है, खुद को संभालता है, और शांत स्वर में पास खड़े लोगों से कहता है—
“मैंने जो किया है… उसका फैसला अब कानून करेगा।
मुझे पुलिस बुलाओ।”
पुलिस आती है।
वो बिना किसी विरोध के उनके सामने हाथ आगे कर देता है।
सुंदर—जिसकी शक्ल जिसने उसकी ज़िंदगी छीन ली…
अब उसी नफ़रत ने उसे इंसाफ दिलाया।
और कहानी वहीं खत्म होती है—
सुंदर पुलिस की जीप में बैठता है…
आंखें बंद कर लेता है…
और उसके आखिरी शब्द होते हैं—
“साखी… मैं आ रहा हूँ।”