भाग – 4
गाँव की बस सुबह-सुबह शहर पहुँची।
अंकित प्लेटफॉर्म पर खड़ा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसे पता था—आज सिर्फ़ माँ नहीं आ रही हैं,
आज पूरा समाज उसके साथ आने वाला है।
बस से उतरते ही माँ की नज़र सबसे पहले उसी पर पड़ी।
वही माँ, जिनके चेहरे की झुर्रियों में उसकी पूरी परवरिश छुपी थी।
वही आँखें, जिनमें चिंता आज डर बनकर उतर आई थी।
मां ने कहा
“अंकित…”
लेकिन आवाज़ में पहले जैसा अपनापन नहीं था।
“माँ,”
अंकित ने पैर छुए।
माँ ने सिर पर हाथ रखा,
लेकिन हाथ काँप रहा था।
उन्होंने ने कहा “चल,”
“बहुत बातें करनी हैं।”
रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोला।
कमरे में पहुँचकर माँ बैठ गईं।
अंकित सामने खड़ा रहा—
जैसे कोई अपराधी फैसला सुनने का इंतज़ार कर रहा हो।
“सच है क्या?”
माँ ने सीधे पूछा।
अंकित ने नज़र नहीं झुकाई।
“अगर आप वही पूछ रही हैं,
जो लोग कह रहे हैं—
तो हाँ, मैं एक विधवा औरत को जानता हूँ।”
माँ की साँस अटक गई।
“नाम?”
“सृष्टि।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
“क्या रिश्ता है?”
माँ ने पूछा।
अंकित कुछ पल चुप रहा,
फिर बोला—
“इंसानियत का।”
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहा,
“बेटा,”
“दुनिया इतनी सीधी नहीं होती।
तेरी बहन की शादी है।
तेरा भाई अभी छोटा है।
लोग हमें चैन से जीने नहीं देंगे।”
अंकित पहली बार टूटा।
“तो क्या माँ,”
“किसी का अकेलापन
हमारी इज़्ज़त से कम कीमती होता है?”
माँ के पास जवाब नहीं था।
उसी शाम सृष्टि को ख़बर मिल गई—
“अंकित की माँ आई हैं।”
उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह जानती थी—
अब कहानी सिर्फ़ दो लोगों की नहीं रही।
अगले दिन माँ ने सृष्टि को बुलवाया।
मंदिर के पीछे का छोटा सा कमरा।
माँ कुर्सी पर बैठीं थीं,
सृष्टि सामने खड़ी थी—
सर झुका हुआ, हाथ जुड़े हुए।
“बैठो,”
माँ ने कहा।
सृष्टि बैठ गई,
लेकिन उसकी उँगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं।
“तुम जानती हो,”
“लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते हैं?”
सृष्टि ने धीरे से सिर हिलाया।
“तो फिर मेरे बेटे की ज़िंदगी में क्यों आई?”
यह सवाल तीर की तरह लगा।
सृष्टि की आँखें भर आईं।
उसने काँपती आवाज़ में कहा,
“मैं आई नहीं मैं तो बस…
ज़िंदा रहने की कोशिश कर रही थी।”
माँ उसे गौर से देखने लगीं।
“तुम्हारा कोई नहीं?”
“डर नहीं लगता?”
“हर पल।”
माँ चुप हो गईं।
थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा—
“मेरे बेटे से क्या चाहती हो?”
सृष्टि ने सिर उठा लिया।
“कुछ नहीं,”
उसने साफ़ कहा,
“न नाम, न रिश्ता, न सहारा।
मैं बस इतना चाहती हूँ
कि उसे मेरे कारण नुकसान न हो।”
यह सुनकर माँ का दिल हिल गया।
शाम को माँ ने अंकित को बुलाया।
उन्होंने पूछा।
“अगर मैं मना कर दूँ?”
अंकित ने जवाब देने में देर नहीं की।
“तो भी मैं गलत नहीं करूँगा, माँ।
मैं बस किसी को अकेला नहीं छोड़ सकता।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
“समाज बहुत ज़ालिम होता है,”
उन्होंने कहा।
अंकित बोला,“और माँ,”
“हम भी उसी समाज का हिस्सा हैं।”
उस रात माँ बहुत देर तक जागती रहीं।
सुबह उन्होंने फैसला सुनाया—
“अभी कुछ मत करो।
न रिश्ता बढ़ाओ,
न तोड़ो।
वक़्त को बोलने दो।”
यह आधी सहमति थी,
आधी चेतावनी।
सृष्टि ने जब यह सुना,
तो उसकी आँखों में राहत नहीं,
डर और बढ़ गया।
उसने अंकित से कहा।
“यह चुप्पी ज़्यादा देर नहीं चलेगी,”
अंकित जानता था—
यह तूफ़ान से पहले की शांति है।
और हर तूफ़ान
कुछ न कुछ उजाड़ कर ही जाता है।
भाग–5 में कहानी वहाँ पहुँचेगी
जहाँ चुप्पी टूटेगी
और समाज खुलकर सामने आएगा।
इस भाग में सामने आएगा—
गाँव और शहर में फैलती बातें
सृष्टि पर लगाया जाने वाला पहला बड़ा आरोप
और अंकित का वह फैसला
जो यह तय करेगा कि
रिश्ता छुपकर जिएगा या खुलकर लड़ेगा।
आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए।
. By............Vikram kori.. .