Samarpan se Aange - 10 in Hindi Love Stories by vikram kori books and stories PDF | समर्पण से आंगे - 10

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समर्पण से आंगे - 10


‎भाग – 10
‎शाम का समय था।
‎सृष्टि की सिलाई मशीन आज कुछ ज़्यादा देर तक चलती रही।
‎काम अब बढ़ने लगा था,
‎लोग भरोसा करने लगे थे—
‎लेकिन भरोसे के साथ
‎सवाल भी लौट आए थे।
‎“अब आगे क्या?”
‎यह सवाल
‎हर दूसरे दिन
‎किसी न किसी रूप में
‎उसके सामने आ जाता।
‎आज यह सवाल
‎अंकित की आँखों में था।
सृष्टिऔर अंकित ‎वे दोनों छत पर बैठे थे।
‎आसमान में हल्की-हल्की लालिमा थी,
‎जैसे दिन और रात
‎एक-दूसरे से समझौता कर रहे हों।
‎अंकित ने धीरे से कहा, सृष्टि
‎“क्या तुम्हें लगता है
‎हम हमेशा ऐसे ही रह सकते हैं?”
‎सृष्टि समझ गई—
की अंकित क्या कहना चाहता है
‎यह सवाल सिर्फ़ साथ रहने का नहीं,
‎नाम का है।
‎वह कुछ पल चुप रही।
‎उसने सीधे और साफ शब्दों में पूछा।
‎“तुम शादी की बात कर रहे हो?”
‎अंकित ने सिर हिला दिया।
‎और बोला हां।
‎हवा में एक अजीब सी बेचैनी फैल गई।
‎सृष्टि कहा,
‎“मैं डरती हूँ,”
‎“शादी से नहीं…
‎खो देने से।”
‎अंकित चुप रहा।
‎वह आगे बोली,
‎“पहली शादी में,”
‎“मैंने अपनी पहचान
‎किसी और के नाम पर रख दी थी।
‎फिर जब वह चला गया,
‎तो लगा मैं भी चली गई।”
‎अंकित की आँखें भर आईं।
‎“मैं तुम्हें बाँधना नहीं चाहता,”
‎अंकित ने कहा,
‎“मैं बस तुम्हारे साथ
‎चलना चाहता हूँ।”
‎सृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा।
‎और कहा
‎“क्या तुम वाक़ई
‎समाज से लड़ पाओगे?”
‎अंकित बोला,
‎“अगर ज़रूरत पड़ी,”
‎“तो समाज छोड़ दूँगा।”
‎यह सुनकर
‎सृष्टि डर गई।
‎उसने तुरंत जवाब दिया ।
नहीं, नहीं
‎“मैं नहीं चाहती
‎कि कोई मेरी वजह से
‎सब कुछ खो दे।”
‎अंकित ने जवाब दिया,
‎“और मैं नहीं चाहता,”
‎“कि तुम डर की वजह से
‎सब कुछ छोड़ दो।”
‎दोनों चुप हो गए।
‎नीचे गली में
‎कुछ औरतें खुसर फुसर कर रही थीं—
‎“अब तो शादी करनी चाहिए…”
‎“ऐसे रहना ठीक नहीं…”
‎ये आवाज़ें
‎फिर लौट आई थीं।
‎रात को अंकित की माँ ने
‎अंकित को बुलाया।
‎माँ ने कहा,
‎“अगर तू शादी करना चाहता है,”
‎“तो मुझे ऐतराज़ नहीं।”
‎अंकित चौंक गया।
‎“लेकिन,”
‎माँ ने आगे कहा,
‎“फ़ैसला सृष्टि का होना चाहिए—
‎डर से नहीं,
‎ख़ुशी से।”
‎अंकित समझ गया—
‎यह सिर्फ़ माँ की इजाज़त नहीं थी,
‎यह ज़िम्मेदारी थी।
‎अगले दिन
‎अंकित सृष्टि के पास गया।
‎“मैं तुमसे कोई जवाब नहीं माँग रहा,”
‎उसने कहा,
‎“बस यह जानना चाहता हूँ—
‎अगर हम शादी न भी करें,
‎तो क्या तुम मुझे
‎अपनी ज़िंदगी का हिस्सा मानती हो?”
‎सृष्टि की आँखें नम हो गईं।
‎“मैं तुम्हें
‎अपनी ज़िंदगी की वजह मानती हूँ,”
‎उसने कहा,
‎“लेकिन मैं फिर से
‎खुद को खोना नहीं चाहती।”
‎अंकित ने मुस्कुराया।
‎ और कहा,
‎“तो फिर ऐसा करते हैं,”
‎“हम शादी नहीं,
‎साथ चुनेंगे।”
‎सृष्टि चौंक गई।
‎“मतलब?”
‎“मतलब,”
‎अंकित बोला,
‎“हम पहले यह तय करेंगे
‎कि हम दोनों
‎एक दूसरे के लिए परफेक्ट हैं या नहीं।
‎अगर इसके बाद
‎शादी हुई—
‎तो वह मजबूरी नहीं,
‎चुनाव होगी।”
‎सृष्टि को पहली बार
‎इस शब्द से डर नहीं लगा—
‎चुनाव।
‎लेकिन समाज
‎इस ‘बीच के रास्ते’ को
‎मानने वाला नहीं था।
‎तीसरे ही दिन
‎गाँव से संदेश आया—
‎“अगर शादी करनी है
‎तो साफ़ करो,
‎वरना
‎दोनों का बहिष्कार होगा।”
‎यह समाज की आख़िरी चाल थी।
‎सृष्टि ने वह संदेश पढ़ा
‎और काँप गई।
‎“अब क्या?”
‎उसने पूछा।
‎अंकित ने गहरी साँस ली।
‎“अब,”
‎वह बोला,
‎“तुम फैसला करोगी—
‎डर के साथ समझौता,
‎या
‎खुद के साथ ईमानदारी।”
‎सृष्टि खिड़की के पास खड़ी हो गई।
‎बाहर
‎वही दुनिया थी
‎जो उसे पहले भी जज कर चुकी थी।
‎लेकिन अब
‎उसके अंदर
‎वही लड़की नहीं थी।
‎फैसला
‎पास आ रहा था।
‎और यह फैसला
‎सिर्फ़ रिश्ते का नहीं,
‎उसकी पहचान का था।
‎भाग–11 में कहानी सबसे संवेदनशील मोड़ पर पहुँचेगी, जहाँ
‎सृष्टि को पहली बार
‎खुलकर हाँ या ना कहना होगा।
‎इस भाग में सामने आएगा—
‎सृष्टि का अंतिम डर और उसकी जड़
‎समाज के बहिष्कार की घोषणा
‎और वह फैसला
‎जो इस कहानी को प्रेम-कथा बनाएगा
‎या आत्मसम्मान की मिसाल।
‎ आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ।
              ‎BY...............Vikram kori.         .