भाग – 8
बस की खिड़की से बाहर भागती सड़क
सृष्टि की आँखों के अंदर भी भाग रही थी।
नया शहर।
नई जगह।
और एक ऐसा खालीपन
जो हर मोड़ पर
उसे अंकित की याद दिला रहा था।
मौसी का घर छोटा था,
लेकिन अपनापन था।
मौसी ने बिना सवाल किए
उसे अपने पास रख लिया।
मौसी ने सृष्टि से कहा,
“कुछ दिन रुक जा,”
“फिर आगे देखा जाएगा।”
लेकिन सृष्टि जानती थी—
उसके दिल में हमेशा एक डर बना रहता था ।
उसे पता था।
ज़िंदगी कभी “कुछ दिन” में नहीं चलती।
सृष्टि को मौसी के यहां
खाली बैठना पसंद नहीं था
यहाँ उसे काम ढूँढना पड़ा।
उसने पहले घरों में बर्तन धोए ,
फिर सिलाई सीखने की कोशिश की ।
और हर दिन उसका थकान के साथ भरा
हुआ था।
और यह सब सोचते हुए उसके दिल
में एक सवाल और जुड़ जाता—
क्या दूरी सही फैसला थी?
उधर अंकित की ज़िंदगी
और सख़्त हो गई थी।
नौकरी की छुट्टी
अब अंकित के लिए अनिश्चित हो चुकी थी।
घर से पैसे भेजने में देरी हुई
तो माँ ने पहली बार कुछ नहीं कहा—
बस चुप रहीं।
अंकित समझ गया—
चुप्पी फिर लौट आई है।
अब अंकित की रातें और भी
मुश्किल होती थीं।
बह बार बार मोबाइल हाथ में लेकर
सृष्टि को कॉल करने की कोशिश करता ,
फिर काट देता।
और उधर सृष्टि अपनी
“ नई ज़िंदगी शुरू कर रही है,”
यहां अंकित खुद से कहता,
“मुझे बीच में नहीं आना चाहिए।”
लेकिन दिल कभी मन की नहीं मानता।
एक रात सृष्टि ने खुद अंकित को कॉल किया।
उसने पूछा
“आप ठीक हैं?”
बस यही एक सवाल—
और अंकित के मन को
सुकून सा मिल गया हो
और दोनों रो पड़े।
सृष्टि ने कहा,
“यह दूरी…”
“मुझे कमज़ोर नहीं,
ज़्यादा मज़बूत बना रही है।”
अंकित ने पहली बार मुस्कुराया।
और श्रष्टि ने कहा,
“और मुझे,”
“यह समझा रही है
कि इंतज़ार भी
एक तरह का साथ होता है।”
कुछ हफ्तों बाद
गाँव में पंचायत बैठी।
अंकित को बुलाया गया।
सरपंच ने अंकित से कहा
“या तो उस औरत से रिश्ता तोड़ो,”
“या फिर गाँव छोड़ो।”
अंकित ने सिर उठाकर देखा।
और वह बोला,
“मैंने कोई रिश्ता बनाया ही नहीं,”
“मैंने बस किसी को
अकेला नहीं छोड़ा।”
सरपंच बोला।
“समाज को इससे फर्क नहीं पड़ता,”
अंकित ने शांत स्वर में कहा—
“मुझे भी अब
समाज से फर्क नहीं पड़ता।”
यह कहकर वह उठ गया।
यह सब सुनने के बाद गांव वाले
लोग उसे गुस्से की नजरों से देख रहे थे।
यह बग़ावत नहीं थी—
यह थकान थी।
उधर सृष्टि को भी
अपने अतीत से सामना करना पड़ा।
मौसी की पड़ोसन ने एक दिन श्रृष्टि से पूछ लिया—
“पति क्या करते है और वो कहा रहते है।
यह सब सुनने के बाद सृष्टि चुप रही।
पड़ोसन ने बोला
“मर गए क्या?”
सीधा सवाल।
उस रात सृष्टि बहुत रोई।
पहली बार उसे लगा—
भागने से सवाल खत्म नहीं होते।
उसने फैसला लिया—
अब वह सिर्फ़ बचेगी नहीं,
जिएगी और हर उस सवाल का
जवाब देगी जो उसे कमजोर बनाते है।
उसने सिलाई का छोटा सा काम शुरू किया।
धीरे-धीरे लोग काम देने लगे।
नाम नहीं,
काम बोलने लगा।
और उसी के साथ
उसके अंदर
खुद पर भरोसा लौटने लगा।
एक दिन
अंकित का फोन आया।
“मुझे वापस नौकरी मिल गई है,”
सृष्टि की आँखें भर आईं।
वह बोली,
“देखा,”
“सब खत्म नहीं होता।”
अंकित कुछ पल चुप रहा।
“लेकिन एक बात है,”
उसने कहा,
“अब मैं आधा नहीं जी सकता।”
सृष्टि समझ गई।
वह बोली,
“जब लौटूँ,”
“तो डर के साथ नहीं लौटूँगी।”
अंकित ने गहरी साँस ली।
उसने कहा,
“और मैं,”
“अब किसी को छुपाकर
कोई काम नहीं करूँगा।”
दूरी ने
दोनों को तोड़ा नहीं—
तराश दिया था।
लेकिन समाज
अब भी वहीं खड़ा था।
और अगला टकराव
और भी सीधा होने वाला था।
भाग–9 में कहानी वापसी के मोड़ पर पहुँचेगी, जहाँ
सृष्टि अपने नए आत्मविश्वास के साथ
फिर उसी समाज में कदम रखेगी
जिसने उसे ठुकराया था।
इस भाग में सामने आएगा—
सृष्टि की वापसी और उसका बदला हुआ रूप
अंकित का खुला स्टैंड
और वह सवाल
क्या समाज बदले हुए इंसान को स्वीकार करेगा,
या पुराने डर फिर जीतेंगे?
आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ...
BY.............. Vikram kori..