samarpan se aange - 9 in Hindi Love Stories by vikram kori books and stories PDF | समर्पण से आंगे - 9

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समर्पण से आंगे - 9


‎भाग – 9
‎स्टेशन पर उतरते ही सृष्टि ने गहरी साँस ली।
‎वही शहर,
‎वही सड़कें,
‎लेकिन अब उसकी चाल में झिझक नहीं थी।
‎यह वही जगह थी
‎जहाँ से वह टूटकर गई थी,
‎और अब खुद को जोड़कर लौट रही थी।
‎मौसी ने जाते वक्त सिर्फ़ इतना कहा था—
‎“अब तू झुकी हुई नहीं लगती।”
‎सृष्टि जानती थी—
‎यह सफ़र वापस आने का नहीं,
‎खुद को सामने रखने का है।
‎उधर अंकित स्टेशन के बाहर खड़ा था।
‎उसे देखते ही सृष्टि रुक गई।
‎कुछ पल दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
‎न आँसू,
‎न मुस्कान—
‎बस एक गहरा भरोसा।
‎अंकित ने पूछा।
‎“कैसी हो?”
‎सृष्टि ने जवाब दिया।
‎“पहले से ज़्यादा ज़िंदा,”
‎यह सुनकर अंकित की आँखें भर आईं।
‎रास्ते भर वे कम बोले।
‎कुछ बातें दूरी में ही पूरी हो चुकी थीं।
‎शहर में खबर फैलने में देर नहीं लगी—
‎“वह विधवा लौट आई है।”
‎लेकिन इस बार सृष्टि ने
‎सिर नहीं झुकाया ।
‎उसने वही कमरा दोबारा लिया,
‎लेकिन इस बार फूलों की टोकरी नहीं लगाई।
‎उसने सिलाई का बोर्ड लगाया—
‎“सृष्टि टेलरिंग वर्क”
‎पहले दिन कोई नहीं आया।
‎दूसरे दिन भी नहीं।
‎तीसरे दिन
‎एक छोटी बच्ची अपनी फटी फ्रॉक लेकर आई।
‎ बच्ची बोली।
‎“मम्मी ने कहा है सिल दो,”
‎सृष्टि ने मुस्कुराकर फ्रॉक ली।
‎यहीं से
‎नया सफ़र शुरू हुआ।
‎अंकित ने भी
‎अब चीज़ें छुपानी बंद कर दी थीं।
‎ऑफिस में,
‎पड़ोस में,
‎हर जगह
‎वह साफ़ कहता—
‎“मैं किसी गलत रिश्ते में नहीं हूँ।
‎मैं एक इंसान के साथ खड़ा हूँ।”
‎कुछ लोग हँसे।
‎कुछ नाराज़ हुए।
‎कुछ चुप रहे।
‎लेकिन चुप्पी अब
‎उसे डराती नहीं थी।
‎एक शाम
‎माँ सृष्टि के पास आईं।
‎बिना सूचना।
‎बिना तैयारी।
‎सृष्टि घबरा गई।
‎“बैठो,”
‎माँ ने कहा।
‎आज उनकी आवाज़ में
‎सवाल नहीं था।
‎“काम चल रहा है?”
‎उन्होंने पूछा।
‎“हाँ,”
‎सृष्टि बोली,
‎“धीरे-धीरे।”
‎माँ ने चारों तरफ़ देखा—
‎सादा कमरा,
‎सिलाई मशीन,
‎कुछ अधूरे कपड़े।
‎माँ ने पूछा।
‎“तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं?”
‎सृष्टि ने सिर हिलाया।
‎“अब नहीं।”
‎माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
‎उन्होंने कहा,
‎“मैं डरती थी,”
‎“समाज से।
‎लोगों से।
‎लेकिन सबसे ज़्यादा
‎अपने बेटे के भविष्य से।”
‎सृष्टि चुप रही।
‎माँ बोलीं,
‎“आज मैं देख रही हूँ,”
‎“तुम किसी का भविष्य नहीं छीन रहीं।
‎तुम तो अपना बना रही हो।”
‎सृष्टि की आँखें भर आईं।
‎यह पहली स्वीकृति थी—
‎खामोश,
‎लेकिन सच्ची।
‎लेकिन समाज
‎इतनी आसानी से नहीं बदलता।
‎एक दिन
‎पड़ोस के कुछ लोग
‎सृष्टि के काम पर उँगली उठाने लगे।
‎“अकेली औरत,
‎लोग आते-जाते हैं…”
‎“कपड़े के बहाने…”
‎यह बातें
‎फिर हवा में फैलने लगीं।
‎इस बार
‎अंकित ने इंतज़ार नहीं किया।
‎उसने सबको बुलाया—
‎पड़ोसी,
‎मंदिर समिति,
‎कुछ जान-पहचान वाले।
‎सृष्टि डर गई।
‎उसने कहा।
‎“फिर से तमाशा होगा,”
‎अंकित ने शांत स्वर में कहा—
‎“नहीं।
‎इस बार आईना दिखेगा।”
‎सबके सामने
‎अंकित बोला—
‎“अगर इस औरत का काम
‎आपको गलत लगता है,
‎तो साफ़ कहिए।
‎लेकिन अगर आपकी नज़र गलत है,
‎तो उसे बदलिए।”
‎सन्नाटा छा गया।
‎“आज तक,”
‎वह आगे बोला,
‎“किसी ने इसके काम में
‎कोई कमी नहीं निकाली।
‎बस इसके होने पर सवाल उठाए।”
‎माँ भी वहाँ थीं।
‎उन्होंने भी पहली बार
‎साफ़ कहा—
‎“अगर किसी ने
‎मेरे बेटे या इस औरत पर
‎और उँगली उठाई,
‎तो वह जवाब मुझे देगा।”
‎यह बात
‎धीरे-धीरे
‎पूरे इलाके में फैल गई।
‎डर अब
‎दूसरी तरफ़ था।
‎लेकिन हर कहानी
‎एकदम से नहीं बदलती।
‎कुछ रातों बाद
‎सृष्टि अकेली बैठी थी।
‎उसने अंकित से पूछा।
‎“क्या हम कभी
‎सामान्य हो पाएँगे?”
‎अंकित ने जवाब दिया—
‎“सामान्य वही होता है
‎जो समाज तय करे।
‎और हमें
‎वह नहीं बनना।”
‎सृष्टि मुस्कुराई।
‎उसने पूछा।
‎“तो फिर?”
‎“तो फिर
‎हमें सही बनना है,”
‎अंकित बोला।
‎यह रिश्ता
‎अब प्रेम से आगे बढ़ चुका था—
‎यह साझेदारी बन चुका था।
‎लेकिन एक सवाल
‎अब भी अनकहा था—
‎क्या यह साथ
‎नाम पाएगा?
‎या बस साहस बनकर रह जाएगा?
‎क्योंकि
‎अगला कदम
‎सबसे मुश्किल होता है।
‎भाग–10 में कहानी निर्णायक मोड़ पर पहुँचेगी, जहाँ
‎अंकित और सृष्टि को
‎अपने रिश्ते को नाम देने या न देने का फैसला करना होगा।
‎इस भाग में सामने आएगा—
‎शादी के सवाल पर पहला टकराव
‎समाज की आख़िरी चाल
‎और सृष्टि का वह फैसला
‎क्या वह फिर किसी रिश्ते में बंधने का साहस करेगी,
‎या अपनी स्वतंत्र पहचान को चुनेगी?
‎ आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ।
‎.          BY..................Vikram Kori..